‘मिस्ट्री गर्ल’... साधनाः सस्पेंस की रानी और स्वर्ण युग की चमकती सितारा
भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग की सबसे चमकती सितारों में से एक, साधना 1941 में पैदा हुई थीं। कराची में जन्मी साधना का परिवार विभाजन के बाद मुंबई आकर बस गया था। उनके पिता, प्रसिद्ध अभिनेत्री साधना बोस के प्रशंसक थे, उन्हीं के नाम पर उन्होंने अपनी बेटी का नाम ‘साधना’ रखा।
साधना ने अपने अभिनय सफर की शुरुआत 1955 में राज कपूर की फिल्म ‘श्री 420’ के एक गाने ‘मुड़ मुड़ के ना देख’ में एक कोरस डांसर के रूप में की थी। इसके बाद उन्होंने भारत की पहली सिंधी फिल्म ‘अबाना’ (1958) में काम किया, जिसके लिए उन्हें मात्र एक रुपया पारिश्रमिक मिला था।
मुख्य अभिनेत्री के रूप में उनकी पहली फिल्म ‘लव इन शिमला’ (1960) थी। इसी फिल्म के दौरान उनके माथे को ढकने के लिए हॉलीवुड अभिनेत्री ऑड्रे हेपबर्न से प्रेरित ‘फ्रिंज’ हेयरस्टाइल अपनाया गया, जो आगे चलकर पूरे भारत में ‘साधना कट’ के नाम से मशहूर हो गया।
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साधना को हिंदी सिनेमा की ‘मिस्ट्री गर्ल’ कहा जाता था। निर्देशक राज खोसला के साथ उनकी सस्पेंस थ्रिलर फिल्मों-’वो कौन थी?’, ‘मेरा साया’ और ‘अनीता’ ने उन्हें इस खिताब से नवाजा। उनकी अन्य यादगार फिल्मों में शामिल हैं, 1965) में आई वक्त, जिसमें उन्होंने ग्लैमर और अभिनय का बेहतरीन संतुलन पेश किया। 1963 में आई मेरे महबूब फिल्म में उनकी मुस्लिम लड़की की भूमिका और ‘मुस्लिम सोशल’ अंदाज बेहद सराहा गया। हम दोनों (1961) फिल्म में देव आनंद के साथ उनकी केमिस्ट्री और फिल्म के गाने आज भी याद किए जाते हैं। 1965 में आई आरजू और 1969 में आई एक फूल दो माली फिल्में उनके करियर की बड़ी हिट्स साबित हुईं।
60 के दशक में साधना सबसे अधिक फीस लेने वाली अभिनेत्रियों में से एक थीं। थायराइड की बीमारी के कारण उनकी आंखों की बनावट में बदलाव आया, जिसके चलते उन्होंने समय से पहले ही फिल्मों से दूरी बना ली। 1974 में फिल्म ‘गीता मेरा नाम’ के निर्देशन और अभिनय के बाद उन्होंने पूरी तरह से संन्यास ले लिया, क्योंकि वह अपनी ‘ग्लैमरस’ छवि को बरकरार रखना चाहती थीं और मां या भाभी के सहायक रोल नहीं करना चाहती थीं।
25 दिसंबर 2015 को साधना का निधन हो गया। साधना न केवल अपनी खूबसूरती और फैशन सेंस के लिए याद की जाती हैं, बल्कि अपनी गंभीर और प्रभावशाली भूमिकाओं के कारण भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर रहेंगी।
