कैंपस में पहला दिन: जीवन को सोचने व समझने की यात्रा
आज भी स्मृतियों में किसी ताजी सुबह की तरह कॉलेज का पहला दिन चमकता है। स्कूल की सुरक्षित और जानी-पहचानी दुनिया से निकलकर बीएससी की छात्रा के रूप में कॉलेज की देहरी पर कदम रखना मेरे लिए उत्साह और संकोच दोनों का मिला-जुला अनुभव था। हाथ में नई फाइल, कंधे पर बैग और मन में अनगिनत सवाल, क्या मैं यहां अपने सपनों के करीब पहुंच पाऊंगी?
कॉलेज का विशाल परिसर देखते ही मन आश्चर्य से भर उठा। ऊंची इमारतें, हरे-भरे पेड़, भागते हुए छात्र, कहीं हंसी की आवाजें तो कहीं गंभीर चेहरों पर किताबों का बोझ, सब कुछ नया था। विभाग की ओर बढ़ते कदमों के साथ दिल की धड़कनें तेज होती जा रही थीं। बीएससी की छात्रा होने का गर्व तो था, लेकिन साथ ही यह डर भी कि विज्ञान जैसे गंभीर विषय को संभाल पाऊंगी या नहीं। पहली कक्षा का अनुभव कभी नहीं भूल सकती।
प्रयोगशाला में रखे चमकते उपकरण, रसायनों की हल्की गंध और दीवारों पर टंगे वैज्ञानिकों के चित्र मुझे एक अलग ही दुनिया में ले गए। जब पहली बार अध्यापक ने अपना परिचय दिया और विषय की महत्ता समझाई, तब महसूस हुआ कि यह सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि जीवन के सोचने और समझने की एक नई यात्रा है। सबसे सुकून देने वाला पल तब आया, जब कुछ अनजान चेहरे मुस्कान में बदल गए। पास बैठी छात्रा से हुई छोटी-सी बातचीत दोस्ती की शुरुआत बन गई। लगा जैसे डर धीरे-धीरे आत्मविश्वास में बदल रहा हो। कैंटीन की पहली चाय और हल्की-फुल्की बातचीत ने उस दिन को और यादगार बना दिया।
शाम को कॉलेज से लौटते समय मन में थकान नहीं, बल्कि एक अजीब-सी खुशी थी। लगा, जैसे जीवन का नया अध्याय शुरू हो चुका है। आज जब पीछे मुड़कर देखती हूं, तो समझ में आता है कि वह पहला दिन सिर्फ कॉलेज का नहीं था, बल्कि मेरे आत्मनिर्भर बनने की दिशा में पहला कदम था, जो आज भी मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। -कृष्णा चौहान
