संपादकीय: समझौते के संदेश

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Published By Monis Khan
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भारत और ब्राजील के बीच हाल में हुए महत्वपूर्ण समझौते वैश्विक भू-राजनीति में भारत की रणनीतिक पुनर्स्थापना का संकेत हैं। विशेषकर क्रिटिकल और रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर समझौता अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा के बीच हुई वार्ता में द्विपक्षीय व्यापार को 20 अरब डॉलर से आगे ले जाने, एआई और सेमीकंडक्टर सहयोग बढ़ाने तथा महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने पर सहमति बनी है। इस समझौते का सबसे अहम पक्ष क्रिटिकल मिनरल्स- लिथियम, निकेल, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ तत्व पर सहयोग है। वर्तमान में इन खनिजों की वैश्विक आपूर्ति पर चीन का प्रभुत्व है। 

भारत, जो इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी स्टोरेज, रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर उद्योग को विस्तार देना चाहता है, उसके लिए कच्चे माल की स्थिर और विविधीकृत आपूर्ति अनिवार्य है। ब्राजील, जो खनिज संसाधनों से समृद्ध है, भारत के लिए एक स्वाभाविक साझेदार बन सकता है। इस दृष्टि से यह समझौता ‘आत्मनिर्भर भारत’ की रणनीति को अंतरdराष्ट्रीय आधार देता है। समझौते का पहला लाभ आपूर्ति शृंखला का विविधीकरण है। यदि भारत ब्राजील के साथ दीर्घकालिक खनन और प्रसंस्करण समझौते स्थापित करता है, तो वह चीन पर निर्भरता कम कर सकेगा। दूसरा लाभ प्रौद्योगिकी सहयोग है। 

एआई, ग्रीन एनर्जी और सेमीकंडक्टर में संयुक्त अनुसंधान। तीसरा, सहयोग की सुदृढ़ता; यह करार दिखाता है कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं परस्पर साझेदारी से वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं, हालांकि चुनौतियां भी हैं। जैसे- लॉजिस्टिक्स और परिवहन लागत। दक्षिण अमेरिका से भारत तक खनिजों का आयात भौगोलिक दूरी के कारण महंगा हो सकता है। खनिजों का केवल आयात पर्याप्त नहीं, उनका घरेलू प्रसंस्करण और वैल्यू एडिशन भी जरूरी है। यदि भारत केवल कच्चा माल आयात करता है और उच्च-तकनीकी उत्पाद विदेशों में निर्मित होते हैं, तो लाभ सीमित रहेगा। खनन परियोजनाओं से जुड़े स्थानीय विरोध और पारिस्थितिक चिंताएं इस सहयोग की गति को प्रभावित कर सकती हैं।

 यह समझौता चीन के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि भारत रणनीतिक संसाधनों के मामले में वैकल्पिक मार्ग तलाश रहा है, हालांकि इसे ‘चीन-विरोधी’ कदम के रूप में देखना अतिशयोक्ति होगी। अधिक उचित यह कहना होगा कि भारत बहुध्रुवीय आपूर्ति तंत्र की ओर बढ़ रहा है। पाकिस्तान जैसे देशों पर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव सीमित होगा, पर क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में भारत की स्थिति मजबूत होगी। वर्तमान संदर्भ में यह करार भारत की औद्योगिक नीति को गति दे सकता है, विशेषकर इलेक्ट्रिक वाहन, अक्षय ऊर्जा, रक्षा निर्माण और डिजिटल अवसंरचना में। भविष्य में यदि दोनों देश संयुक्त निवेश कोष, अनुसंधान केंद्र और विनिर्माण इकाइयां स्थापित करते हैं, तो यह साझेदारी 20 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य से कहीं आगे जा सकती है। अंततः, भारत–ब्राजील समझौता केवल खनिजों का सौदा नहीं, बल्कि रणनीतिक आत्मनिर्भरता और ग्लोबल साउथ की साझी आकांक्षाओं का प्रतीक है।