हाई कोर्ट सख्त : घाघराघाट पुल की मरम्मत में देरी पर बहराइच, बाराबंकी और गोंडा के DM को कड़ी फटकार
लखनऊ, अमृत विचार : इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंड पीठ ने जनहित के एक मामले में राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जाहिर की है। साथ ही कहा है कि जनहित से जुड़े ऐसे गंभीर मामलों में आवश्यक निर्देश प्रस्तुत न करना कतई स्वीकार्य नहीं है। न्यायालय ने घाघराघाट पुल की जर्जर स्थित का जिक्र करते हुये पुल की मरम्मत और पुनर्वास में हो रही देरी पर तीन जिलों के डीएम को अंतिम अवसर देते हुये निर्देश जारी किया है।
दरअसल, पूरा मामला घाघरा नदी के खस्ताहाल 'घाघराघाट पुल' से जुड़ा हुआ है। बीते दिनों इस पूल की जर्जर हालत और संभावित खतरों को देखते हुये हाईकोर्ट के एडवोकेट आशीष कुमार सिंह ने एक जनहित याचिका दायर की थी। जिस पर हाईकोर्ट ने (नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI), मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाईवे और उत्तर प्रदेश राज्य ब्रिज कॉरपोरेशन) संबंधित तीनों विभागों के अधिकारियों को 18 मार्च को पुल की विस्तृत रिपोर्ट के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया था। जिस पर 18 मार्च को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा पुल की मरम्मत का ठेका पहले ही दिया जा चुका है। इसके अलावा राज्य सरकार की तरफ से इस परियोजना के लिए लगभग 826.45 लाख रुपये का अनुमानित बजट भी प्रस्तुत किया गया है, लेकिन बाजजूद इसके प्रशासनिक स्तर पर हो उचित कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे जनता की जान जोखिम में बनी हुई है। हाई कोर्ट ने इस मामले में विशेष रूप से बहराइच, बाराबंकी और गोंडा के जिला मजिस्ट्रेट की कार्यप्रणाली पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि जनहित से जुड़े ऐसे गंभीर मामलों में आवश्यक निर्देश प्रस्तुत न करना स्वीकार्य नहीं है।
अधिकारियों को व्यक्तिगत पेशी की चेतावनी
हाई कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई की तारीख निर्धारित करते हुये कहा है कि तय तिथि पर आवश्यक निर्देश की पूरी रिपोर्ट प्रस्तुत की जाये, अन्यथा तीनों जिला मजिस्ट्रेट को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होना पड़ेगा। मामले की अगली सुनवाई 9 अप्रैल 2026 मुकर्रर की गई है। हाई कोर्ट का यह आदेश सार्वजनिक सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
