संपादकीय : स्वागत योग्य निर्णय
भारत के सामाजिक न्याय ढांचे के केंद्र में धर्म और जाति के अंतर्संबंधों का प्रश्न अत्यंत संवेदनशील है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय दूरगामी प्रभावों वाला साबित हो सकता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म, जैसे इस्लाम या ईसाई धर्म को अपनाने पर व्यक्ति का अनुसूचित जाति का स्वत: दर्जा समाप्त हो जाता है। यह व्यवस्था मूलतः 1950 के राष्ट्रपति आदेश पर आधारित है, जिसे 1956 में संशोधित कर सिख और 1990 में बौद्ध धर्म को भी शामिल किया गया।
यह फैसला इस मामले में एक ओर संवैधानिक स्पष्टता लाता है, तो दूसरी ओर सामाजिक यथार्थ के कई जटिल प्रश्नों को भी उजागर करता है। स्वागत योग्य पहलू यह है कि न्यायालय ने “धर्म-आधारित आरक्षण” की अवधारणा को सीमित करते हुए यह स्पष्ट करती है कि अनुसूचित जाति की पहचान ऐतिहासिक रूप से हिंदू सामाजिक संरचना में निहित अस्पृश्यता से जुड़ी है। इस दृष्टि से यह फैसला उन वर्गों के लिए लाभकारी है, जो मानते हैं कि आरक्षण का आधार सामाजिक-ऐतिहासिक उत्पीड़न होना चाहिए, न कि केवल आर्थिक या सामान्य पिछड़ापन। किंतु इसके सामाजिक और राजनीतिक फलितार्थ किंचित अधिक जटिल हैं।
भारत में धर्म परिवर्तन के बावजूद जातिगत पहचान का पूर्ण लोप कभी नहीं होता, यह एक स्थापित सामाजिक सत्य है। इस्लाम में पसमांदा, अशरफ, अंसारी जैसे वर्ग और ईसाई समाज में भी दलित ईसाइयों की अलग पहचान, यह दर्शाती है कि सामाजिक भेदभाव धर्म बदलने से स्वतः समाप्त नहीं होती। ऐसे में, अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त होने से इन समुदायों के कमजोर वर्गों को कानूनी सुरक्षा, विशेषकर अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 और आरक्षण लाभ से वंचित होना पड़ेगा। यह उनके लिए एक वास्तविक नुकसान है, जहां तक अनुसूचित जनजाति का प्रश्न है, वे इस संदर्भ में अलग स्थिति में हैं। इनकी पहचान धर्म से नहीं, बल्कि जनजातीय-भौगोलिक और सांस्कृतिक विशेषताओं से जुड़ी है।
इसलिए धर्म परिवर्तन के बाद भी उनका दर्जा सामान्यतः बना रहता है। यही कारण है कि यह निर्णय अनुसूचित जाति पर तो लागू होता है, पर अनुसूचित जनजाति पर नहीं। यह एक विवेक सम्मत निर्णय है। इस फैसले से अत्याचार संबंधी मामलों में कमी नहीं आएगी, बल्कि यह संभव है कि पीड़ित वर्गों के पास कानूनी संरक्षण के सीमित विकल्प रह जाएं, जिससे न्याय तक पहुंच और कठिन हो। “घर वापसी” या पुनर्परिवर्तन के मामलों में न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि व्यक्ति को यह प्रमाणित करना होगा कि उसका पुनः धर्मांतरण वास्तविक और स्वैच्छिक है, न कि केवल आरक्षण लाभ पाने के उद्देश्य से।
इसके लिए सामाजिक स्वीकृति, समुदाय में पुनः समावेश और व्यावहारिक परिवर्तन जैसे मानदंड देखे जाएंगे, जो सर्वथा उचित है। यह निर्णय भारत के सामाजिक न्याय विमर्श को एक नए मोड़ पर ले जाता है। अब आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और समाज मिलकर उन कमजोर वर्गों के लिए वैकल्पिक सुरक्षा तंत्र विकसित करें, जो धर्म परिवर्तन के बाद भी भेदभाव का सामना करते हैं। न्याय केवल विधिक परिभाषाओं से नहीं, बल्कि सामाजिक वास्तविकताओं के संतुलन से सुनिश्चित होता है।
