UP में पंचायत चुनाव तक प्रधान ही संभालेंगे गांवों की कमान : CM योगी ने दी मंजूरी, कल खत्म हो रहा पंचायतों का कार्यकाल
लखनऊ, अमृत विचार। उत्तर प्रदेश में सामान्य पंचायत निर्वाचन 2021 के बाद गठित ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो रहा है। पंचायती राज विभाग ने इस संबंध में एक आदेश जारी किया है जिसके अनुसार नई ग्राम पंचायतों के गठन तक या अधिकतम छह महीने की अवधि के लिए निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में नियुक्त किया जाएगा।
दरअसल, उप्र पंचायत राज अधिनियम 1947 की धारा-12 की उपधारा 3 के अनुसार कोई ग्राम पंचायत अपनी प्रथम बैठक के लिए नियत दिनांक से 5 वर्ष तक ही बनी रह सकती है। इसी धारा की उपधारा 4 में प्रावधान है कि ग्राम पंचायत के सदस्य का कार्यकाल ग्राम पंचायत के कार्यकाल के साथ समाप्त हो जाएगा।
सरकार की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि अधिनियम की धारा 12 की उपधारा 3-क में प्रावधान है कि अपरिहार्य परिस्थितियों या लोकहित में यदि कार्यकाल अवसान से पहले निर्वाचन कराना संभव नहीं है, तो राज्य सरकार प्रशासनिक समिति या प्रशासक नियुक्त कर सकती है। प्रशासक छह माह से अनधिक अवधि के लिए पद धारण करेगा और ग्राम पंचायत, प्रधान एवं समितियों की समस्त शक्तियां उसके पास होंगी।
आदेश के अनुसार ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद 27 मई निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ग्राम पंचायतों में प्रशासक के रूप में नामित किया जाएगा। इसके लिए संबंधित जिले के जिलाधिकारी को अधिकृत किया गया है। यह व्यवस्था नई ग्राम पंचायतों की प्रथम बैठक तक अथवा अधिकतम छह माह, जो भी पहले हो, तक लागू रहेगी।
ज्ञाप में स्पष्ट किया गया है कि प्रशासक द्वारा कोई नीति विषयक निर्णय नहीं लिया जाएगा। प्रशासक केवल सामान्य रूटीन कार्यों का निर्वहन करेंगे। अत्यावश्यक एवं विशेष स्थितियों में नीति विषयक निर्णय का प्रस्ताव जिला पंचायत राज अधिकारी के माध्यम से जिलाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत कर स्वीकृति प्राप्त की जाएगी।
इतिहास में पहली बार प्रधानों को कमान
यह पहली बार होगा जब पंचायत चुनाव तक प्रशासनिक समिति के रूप में मौजूदा प्रधानों को जिम्मेदारी दी जाएगी। इससे गांवों में चल रहे विकास कार्यों की निरंतरता बनी रहेगी और योजनाओं पर असर नहीं पड़ेगा। माना जा रहा है कि ओबीसी आरक्षण और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने तक पंचायत चुनाव में कुछ समय लग सकता है।
अब चुनाव के लिए ओबीसी आरक्षण का इंतजार
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से अब त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के लिए ओबीसी आरक्षण तय होने तक इंतजार करना होगा। राज्य सरकार ने पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करके इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राम औतार सिंह की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय आयोग बनाकर छह माह के भीतर रिपोर्ट मांगी है। आयोग पंचायत चुनावों में पिछड़ा वर्ग आरक्षण से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन कर अपनी संस्तुति सरकार को देगा।
भाजपा सरकार ने प्रधानों को जिम्मेदारी देकर साधे कई निशाने
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंचायत चुनाव तक मौजूदा प्रधानों को प्रशासनिक जिम्मेदारी देने से गांवों में सत्तारूढ़ दल की पकड़ मजबूत बनी रहेगी। प्रधान सीधे तौर पर गांवों में सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों से जुड़े रहते हैं। ऐसे में चुनाव पूर्व यह फैसला भाजपा के ग्रामीण वोटबैंक को साधने की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है। पंचायत प्रतिनिधियों के सक्रिय बने रहने से संगठनात्मक नेटवर्क भी मजबूत रहेगा। यह फैसला विरोधी दलों के लिए बड़ा झटका साबित होगा।
कब-कब पंचायतें प्रशासकों के हवाले हुईं
• वर्ष 1995 में पंचायत चुनाव में देरी के दौरान प्रशासनिक समितियां बनाई गई थीं
• वर्ष 2000 में परिसीमन और आरक्षण प्रक्रिया के चलते कुछ समय तक प्रशासनिक व्यवस्था लागू रही
• वर्ष 2015 में भी चुनाव प्रक्रिया लंबी होने पर प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ाया गया
• वर्ष 2026 में पहली बार मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक की जिम्मेदारी देने का फैसला लिया गया
