किसे कहा जा सकता है गुरुबी, शिवानंद मिश्रा आध्यात्मिक लेखक

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Published By Anjali Singh
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गुरु मूल रूप से वह शिक्षक नहीं है, जैसा कि हम आमतौर पर इस शब्द का प्रयोग करते हैं-यानी वह व्यक्ति जो अपने मन से ज्ञान को आप तक पहुंचाता है। ज्ञान पुस्तकों में मिल सकता है। अवधारणाएं एक ही दोपहर में समझी जा सकती हैं। गुरु के पास जो ज्ञान है, उसे न तो समझाया जा सकता है, न ही सिखाया जा सकता है। यह केवल संचारित होता है, ठीक वैसे ही जैसे एक लौ बुझी हुई मोमबत्ती को अग्नि प्रदान करती है। मोमबत्ती लौ नहीं बन जाती, बल्कि वह स्वयं ही उसी अग्नि से भीतर से प्रज्वलित हो जाती है। यही शक्तिपात है।

गुरु उपायः-

गुरु ही साधन हैं। एक विशेष प्रकार का अंधकार होता है, जो प्रकाश की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि प्रकाश के अस्तित्व को ही भूल जाना है। आप  इसमें वर्षों, दशकों तक भी रह सकते हैं-संसार में कुशलतापूर्वक, बुद्धिमानी से, यहां तक कि कुछ क्षणों के लिए प्रसन्नतापूर्वक भी आगे बढ़ सकते हैं-फिर भी भीतर ही भीतर एक शांत, अनकहा दर्द लिए रहते हैं। एक अनुभूति कि कुछ आवश्यक चीज़ गायब है। कि आप अपने आप की सतही अवस्था में जी रहे हैं। कि आपके भीतर की गहराई को कभी छुआ ही नहीं गया है। यदि आप भाग्यशाली हैं, यदि ब्रह्मांड में कोई असाधारण कृपा से आपकी ओर मुड़ता है, तो एक व्यक्ति प्रकट होता है। सहमेशा वस्त्रों में नहीं।

हमेशा औपचारिकता के साथ नहीं। कभी-कभी सबसे साधारण परिस्थितियों में-एक आकस्मिक मुलाकात में, सही समय पर बोले गए एक वाक्य में, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा आपके हाथों में रखी गई पुस्तक में, जिसने बस इतना कहा हो-इसे पढ़ो। लेकिन उस मुलाकात में कुछ ऐसा होता है, जो आपकी अब तक की सभी मुलाकातों से अलग होता है। उसमें कुछ ऐसा होता है, जो आपको केवल जानकारी नहीं देता, आपका मनोरंजन नहीं करता या आपको सांत्वना नहीं देता-वह आपको बदल देता है। वही व्यक्ति गुरु है। और यह सूत्र-मात्र दो शब्द-'गुरु उपायः', उस बात की घोषणा करता है जिसे तर्कसंगत मन गंभीरता से लेने के लिए लगभग बहुत सरल पाता है-गुरु साधन हैं।

केवल साधन नहीं। आध्यात्मिक उपकरणों के अनेक साधनों में से एक नहीं-साधन। वह स्वयं साधन। वह माध्यम, जिसके द्वारा सोई हुई आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को जागृत करती है। गुरु की आवश्यकता क्यों है? आपमें ऐसी कई बातें हैं, जिन्हें आप स्वयं नहीं देख सकते, लेकिन दूसरे उन्हें स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। आंख स्वयं को नहीं देख सकती। मन अपनी कमियों को पूरी तरह से नहीं देख सकता।

चेतना में एक विशेष प्रकार की गांठ होती है-वह है अपने आप को केंद्रीय मानने वाली छोटी-सी ‘स्व’ की गांठ, जिसे उसी हाथ से खोलना असंभव है जिसने उसे बांधा है। आपको एक दूसरे हाथ की आवश्यकता है। ऐसा हाथ नहीं, जो आपको नियंत्रित करे। ऐसा हाथ नहीं, जो आपको छोटा करे। बल्कि एक ऐसा हाथ, जो आपके विस्मृति के अंधकार में इतनी स्थिरता, इतने प्रेम और सत्य में इतनी अटूट दृढ़ता के साथ पहुंचे कि उनकी उपस्थिति में वह गांठ स्वतः ही खुलने लगे। वही हाथ गुरु है।