रोचक फैक्ट: इंसान के भीतर छिपे दूसरे जीवों के जीन का रहस्य

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Published By Anjali Singh
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मनुष्य स्वयं को पृथ्वी की सबसे विकसित और श्रेष्ठ प्रजाति मानता है, लेकिन आधुनिक आनुवंशिक विज्ञान इस धारणा को एक नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित कर रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, मानव जीनोम पूरी तरह “शुद्ध” नहीं है, बल्कि इसमें लगभग 145 ऐसे जीन पाए गए हैं, जो बैक्टीरिया, कवक, अन्य एककोशिकीय जीवों और यहां तक कि वायरस से आए हैं। यह रोचक तथ्य जीनोम बायोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में सामने आया है, जिसने विकासवाद की पारंपरिक समझ को चुनौती दी है।

इन जीनों का आदान-प्रदान “क्षैतिज जीन स्थानांतरण” (Horizontal Gene Transfer) नामक प्रक्रिया के माध्यम से हुआ है। सामान्यतः हम यह मानते हैं कि जीन माता-पिता से संतानों में ही स्थानांतरित होते हैं, जिसे “ऊर्ध्वाधर जीन स्थानांतरण” कहा जाता है, लेकिन क्षैतिज जीन स्थानांतरण में जीन एक जीव से दूसरे, पूरी तरह भिन्न प्रजाति में भी पहुंच सकते हैं। यह प्रक्रिया विशेष रूप से सूक्ष्मजीवों में सामान्य है, परंतु अब इसके प्रमाण मनुष्यों और अन्य जटिल जीवों में भी मिल रहे हैं।

नई शोधों के अनुसार, ये “विदेशी” जीन मानव शरीर के कई महत्वपूर्ण कार्यों में भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के लिए कुछ जीन प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाने, संक्रमणों से लड़ने और पाचन क्रिया को सुचारु रखने में सहायक होते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्राचीन काल में जब हमारे पूर्वज लगातार विभिन्न सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आए, तब यह जीन स्थानांतरण संभव हुआ होगा, जिसने उन्हें नए वातावरण के अनुरूप ढलने में मदद की।
हाल के अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि मानव शरीर में मौजूद माइक्रोबायोम यानी अरबों सूक्ष्मजीवों का समूह इस जीन आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आंतों में रहने वाले बैक्टीरिया न केवल पाचन में मदद करते हैं, बल्कि वे जीन के आदान-प्रदान के माध्यम से हमारे स्वास्थ्य और रोग-प्रतिरोधक क्षमता को भी प्रभावित कर सकते हैं।

इसके अलावा, वायरस भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण “वाहक” के रूप में कार्य करते हैं। वे अपने जीन को मानव कोशिकाओं में सम्मिलित कर सकते हैं, जिससे कभी-कभी नई आनुवंशिक विशेषताएं विकसित हो जाती हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मानव जीनोम का एक छोटा हिस्सा प्राचीन वायरसों के अवशेषों से भी बना है, जिन्हें “एंडोजीनस रेट्रोवायरस” कहा जाता है।

इस प्रकार, यह स्पष्ट होता है कि मानव विकास एक सीधी रेखा में नहीं, बल्कि जटिल और परस्पर जुड़े हुए जैविक आदान-प्रदान का परिणाम है। क्षैतिज जीन स्थानांतरण की यह अवधारणा न केवल विकासवाद की हमारी समझ को विस्तृत करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि जीवन के विभिन्न रूप एक-दूसरे से कितने गहरे जुड़े हुए हैं। मनुष्य की “श्रेष्ठता” का विचार अब एक नई वैज्ञानिक विनम्रता में बदलता दिखाई देता है, जहां हम खुद को प्रकृति की विशाल जैविक श्रृंखला का एक हिस्सा मानने लगते हैं।