लघुकथा : अपना-अपना हिस्सा
राम नरेश ‘उज्ज्वल’/ लखनऊ
यह बात बहुत पुरानी है। एक गरीब किसान खेती-बारी करके अपना गुजर-बसर करता था। उसके खेत की मिट्टी बहुत उर्वर थी। उसमें सब कुछ उगाया जा सकता था। खेत में हरी-भरी फसल लहरा रही थी। किसान रोज खेत की रखवाली करता था। एक दिन अचानक पता नहीं कहां से एक दैत्य आ गया। वह पौधे उखाड़-उखाड़ कर फेंकने लगा। किसान चिल्लाता रहा, किंतु उसने कुछ न सुना। कुछ ही देर में पूरी फसल नष्ट कर दी।
किसान ने पूछा, “तुम ऐसा क्यों कर रहे हो!” उसने कहा, “इस खेत की फसल में मुझे आधा हिस्सा चाहिए।” किसान ने कहा, “अगर आधा हिस्सा न दूंगा तो क्या करोगे?” दैत्य ने कहा, “मैं तुम्हारे खेत की फसल नष्ट कर दूंगा। भलाई इसी में है कि मुझे मेरा हिस्सा देते रहना, वरना।” उसने बड़ा-सा मुंह फैलाकर भयानक गर्जना की।
किसान डर गया। वह थोड़ी देर माथा पकड़कर बैठा रहा। दिल धुक-धुक कर रहा था। पर हिम्मत बांधकर पूछा, “तुम फसल का कौन-सा हिस्सा लोगे?” दैत्य ने कहा, “क्या? क्या मतलब ?” किसान बोला, “ फसल के ऊपर का हिस्सा लोगे या जमीन के नीचे का।” दैत्य बोला, “मुझे ऊपर का हिस्सा चाहिए।” “अपनी बात से फिर बदलोगे तो नहीं।”
किसान ने पूछा। “जुबान पलटने का काम इंसान करते हैं। मैं अपनी बात पर सदैव कायम रहूंगा।” दैत्य ने कहा, “खेत की रखवाली भी करूंगा।” किसान ने कहा, “ठीक है। मैं तुम्हें फसल के ऊपर का हिस्सा दे दूंगा।” “ठीक है।” दैत्य इतना कहकर चला गया।
किसान ने अपने घर में विचार करके खेत में आलू बोने का फैसला किया। पूरे परिवार ने मिलकर आलू बो दिया। फसल तैयार होने पर किसान ने जमीन के नीचे का हिस्सा खोदकर आलू निकाल लिया। आलू घर पर पहुंचा दिया। दैत्य आलू के पत्ते पाकर बहुत क्रोधित हुआ, किंतु उसे अपना वादा याद आ गया।
उसने किसान से कहा, “इस बार मैं फसल के नीचे का हिस्सा लूंगा।” किसान ने कहा, “ठीक है। तुम जमीन के नीचे की फसल ले लेना। मैं ऊपर का हिस्सा ले लूंगा।” अगली फसल किसान ने गेहूं की बो दी। फसल तैयार होने पर किसान ने जमीन के ऊपर की फसल काट ली। दैत्य से कहा, “तुम जमीन के नीचे की फसल ले लो।”
दैत्य ने जमीन खोदी। उसमें सिर्फ जड़ें निकलीं। वह क्रोधित होकर बोला, “सुन इस बार मैं जमीन के नीचे और ऊपर की दोनों फसलें लूंगा। अब तुम्हारी चालाकी नहीं चलेगी।” किसान ने कहा, “ठीक है, जमीन के ऊपर और नीचे की फसल तुम्हारी रहेगी। बीच का हिस्सा मैं ले लूंगा।”
दैत्य ने कहा, “ठीक है।” इस बार फिर किसान ने अपने बच्चों से विचार-विमर्श किया। बच्चों ने मक्का लगाने की सलाह दी। किसान ने मक्का बो दिया। जब मक्का तैयार हुआ, तब किसान ने पौधे के बीच के हिस्से से मक्का यानी भुट्टा तुड़वा लिया। दैत्य से कहा, “तुम नीचे और ऊपर का भाग ले जाओ। मैंने अपना हिस्सा ले लिया।”
दैत्य ने जमीन खोदा, पर उसमें जड़ के सिवा कुछ न निकला। मक्के के ऊपर के हिस्से से भी उसे कुछ न मिला। दैत्य ने किसान को तेज आवाज देकर बुलाया। “जी हां” किसान दैत्य के पास गया। दैत्य बहुत जोर से हंसने लगा, “हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा..” किसान सहम गया। वह डर से कांपने लगा। “हे ईश्वर रक्षा करो।” किसान ने मन ही मन भगवान से विनती की।
“तुम बहुत चालाक हो।” दैत्य ने कड़क आवाज़ में कहा। “जी, नहीं।” किसान ने कहा, “तुम्हें जो चाहिए, वो लेे लो। मैं रोकूंगा नहीं।” दैत्य फिर डरावनी हंसी हंसने लगा। उसने किसान को हाथ से ऊपर टांग दिया। किसान ने सोचा,
“लगता है आज यह मेरी जान ले लेगा।” दैत्य ने कहा, “बहुत अच्छे। बहुत तेज दिमाग है तुम्हारा।” किसान ने सहमकर कहा, “मुझे माफ कर दो। तुम मेरे घर से जो चाहो लेे लो।” “मुझे कुछ नहीं चाहिए।” दैत्य बोला। किसान ने कहा, “तो क्या मेरी जान लोगे?”
दैत्य ने किसान को नीचे उतार दिया। कहा, “मुझे तुम्हारी जान नहीं चाहिए। तुम एक निडर, साहसी एवं समझदार किसान हो। तुमने अपने बच्चों के पालन के लिए सही तरकीब लगाई। मैं तुमसे प्रसन्न हूं।” “क्या!” किसान के मुख से अनायास निकल गया। “हां, अब मैं यहां से जा रहा हूं। तुम आराम से अपनी खेती करो।” इतना कहकर दैत्य चला गया और किसान आश्चर्यचकित खड़ा रह गया।
