क्या मशीन मानव सृजनशीलता का विकल्प बन सकती है!
कुछ पुरातत्वविदों का मानना है कि प्रारंभिक गुफा-चित्र केवल सौंदर्यबोध या धार्मिक अनुष्ठानों के लिए नहीं बनाए गए थे, बल्कि उनका संबंध गिनती, समय-निर्धारण और गणना से भी हो सकता है। फ्रांस और स्पेन की कई प्रागैतिहासिक गुफाओं में पाए गए बिंदु, रेखाएं और प्रतीक इस संभावना की ओर संकेत करते हैं कि आदिम मनुष्य दृश्य संकेतों के माध्यम से मौसम, शिकार या चंद्र चक्र जैसी चीजों को दर्ज करता था।
अर्थात कला और गणित का संबंध मानव सभ्यता के आरंभिक चरण से ही मौजूद रहा है। अब हालिया शोधों ने इस बहस को नए स्तर पर पहुंचा दिया है। वारसा विश्वविद्यालय और यूनिवर्सिटी ऑफ हर्टफोर्डशायर के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में यह दावा किया गया है कि अमूर्त कला के भीतर भी एक प्रकार का गणितीय संतुलन सक्रिय रहता है।
‘पर्सिस्टेंट होमोलॉजी’ नामक गणितीय पद्धति की सहायता से वैज्ञानिकों ने पाया कि प्रसिद्ध कलाकार अपनी रचनाओं में रंगों और आकृतियों को एक विशेष दृश्यात्मक संतुलन के साथ व्यवस्थित करते हैं। यही संतुलन दर्शकों के भीतर सौंदर्यबोध और भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। यह शोध ऐसे समय में सामने आया है, जब पूरी दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर व्यापक चर्चा चल रही है।
पिछले दो वर्षों में एआई आधारित उपकरणों, जैसे- इमेज जनरेटर, चैटबॉट और ऑटोमेटेड डिजाइन सिस्टम ने कला, लेखन, संगीत और फिल्म जैसे क्षेत्रों में तेज़ी से प्रवेश किया है। वैश्विक निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार एआई आने वाले वर्षों में दुनिया भर में लगभग 30 करोड़ नौकरियों को प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर प्राइस वाटर हाउस कूपर्स की रिपोर्ट कहती है कि 2030 तक एआई वैश्विक अर्थव्यवस्था में लगभग 15.7 ट्रिलियन डॉलर का योगदान दे सकता है।
इन आंकड़ों के कारण स्वाभाविक रूप से यह भय भी पैदा हुआ कि क्या मशीनें मनुष्य की रचनात्मकता का स्थान ले लेंगी? और ऐसे में क्या कलाकार, लेखक और डिज़ाइनर अप्रासंगिक हो जाएंगे? इतिहास बताता है कि समय-समय पर आए तकनीकी परिवर्तन के साथ ऐसी आशंकाएं पहले भी उत्पन्न होती रही हैं। 1990 के दशक में जब कंप्यूटर और इंटरनेट का विस्तार हुआ, तब भी व्यापक स्तर पर यह कहा गया कि मशीनें मानव श्रम को समाप्त कर देंगी। परंतु हुआ इसका उल्टा।
विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के अनुसार डिजिटल तकनीक और कंप्यूटर आधारित उद्योगों ने नए प्रकार के रोजगार पैदा किए। अपना देश भारत इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।आंकड़े बत्ताते हैं कि भारत का आईटी उद्योग 1998 में लगभग चार अरब डॉलर का था, जो 2024 तक बढ़कर लगभग 250 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंच गया।
आज भारतीय आईटी और बीपीएम (बिजनेस प्रॉसेस मैनेजमेंट) क्षेत्र में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 5.4 मिलियन लोग कार्यरत हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और नोएडा जैसे शहर वैश्विक तकनीकी केंद्रों में बदल चुके हैं। स्पष्ट है कि कंप्यूटर ने केवल पुराने रोजगार ही समाप्त नहीं किए, बल्कि नई संभावनाएं भी उत्पन्न कीं। संभवतः आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ भी कुछ ऐसा ही होगा, क्योंकि मशीनें दोहराव वाले कार्यों को अधिक गति से कर सकती हैं, लेकिन हमें समझना होगा कि कला केवल तकनीक नहीं है।
कला यहां अनुभव, स्मृति, संवेदना और सांस्कृतिक चेतना का परिणाम होती है। एआई लाखों चित्रों का विश्लेषण कर तुरंत फुरंत में नई छवियां बना सकता है, परंतु वह अभी भी मानवीय जीवनानुभव की जटिलता को पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पाता। यही कारण है कि एआई निर्मित कला कई बार तकनीकी रूप से प्रभावशाली होने के बावजूद भावनात्मक गहराई से रिक्त ही रहती है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
