व्यंग्यः शर्मा जी का अंडरवियर...

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Published By Muskan Dixit
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शर्मा और शर्माइन की जुगलबंदी ऐसी थी कि तेरे संग रहा न जाए और तेरे बिन भी रहा न जाए। दिन भर एक दूसरे के ऊपर तुनकना, कोई रूठ जाए तो फिर मनाना और फिर एक हो जाना। उनकी गृहस्थी की गाड़ी कभी दो पहियों के सहारे तो कभी चार पहियों के सहारे खट्टी मीठी चल रही थी। 

शर्मा जी ठहरे थोड़ा कंजूस प्रवृति के और शर्माइन ठहरी खुलकर खर्च करने वाली और यही वजह थी दोनों की आपसी नोक झोंक की। अक्सर शर्माइन राजधानी एक्सप्रेस की तरह दौड़ने के चक्कर में अपनी बालकनी में जब साड़ियां सूखने के लिए डालती थी, तो चिमटी लगाना भूल जाती थी इसी हड़बड़ी में कई बार साड़ी और दूसरे कपड़े नीचे वाले पड़ोसी की बालकनी मे गिर जाते थे, जिसे लेने के लिए शर्मा जी को अक्सर नीचे जाना पड़ता था। खैर वह भी कोई बात नहीं, परेशानी तो तब होती थी, जब शर्माइन के सूट या साड़ी का कोई जोड़ा आंधी में उड़कर दूर खंबे में लटक जाता था, जिसे पूरा मोहल्ला घूम-घूम कर निहारता था और पूछता था शर्मा जी तुम्हारी पत्नी के कपड़े पैदल चल चलकर कितनी दूरी तय कर लेते हैं।

शर्मा जी द्वारा कपड़े वापस लाने पर शर्माइन बोलती थी अरे यह मेरा नहीं है किसी काम वाली का होगा। शर्मा जी बोलते थे तुम्हारा ही है। वापस क्यों नहीं लेती हो। शर्माइन गुस्से में फट पड़ती कि जब कपड़ा आंधी में उड़कर चला ही गया तो उसे वापस लेने का कोई औचित्य नहीं है। शर्मा जी हम दूसरा ले लेंगे। शर्मा जी बोलते अरे भाग्यवान पैसे क्या पेड़ पर उगते हैं, तो शर्माइन बोली पैसे तो पेड़ पर फिर भी उग जाएंगे क्या इज्जत पेड़ पर उगती है। शर्मा जी शर्माइन के तर्कों के आगे बेबस हो जाते।

खैर एक दिन शर्माइन ने बालकनी में शर्मा जी का अंडरवियर सूखने के लिए डाला, जो चिमटी न लगाए जाने के कारण खो गया। खैर वो शर्मा जी का अंडरवियर ठहरा तो उसकी ढूंढ तो मचनी ही थी। शर्माइन ने कहा अरे दूसरा ले लो, शर्मा जी ने कहा नहीं उसे ही ढूंढना पड़ेगा, पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं। शर्मा जी नीचे पड़ोसन के घर गए और बोले आपकी बालकनी में मेरा अंडरवियर आया है क्या? पड़ोसन बोले शर्मा जी शर्म नहीं आती है आपको, एक तो गलती ऊपर से बेशर्मी। कम से कम मेरे पति के आने का ही इंतजार कर लेते। और आया होता तो मैं क्या दीवार पर नहीं टांग देती? कोई दूसरे का अंडरवियर अपने घर पर रखेगा क्या? 

शर्मा जी का अंडरवियर खो चुका था। हद तो तब हो गई, जब एक दिन पड़ोस मे एक बंदर उनका अंडरवियर पहनकर अलग-अलग बिल्डिंग में कूद फांद करने लगा। मोहल्ले भर के लोगों को अब मुफ्त का तमाशा मिल गया, चलते फिरते लगे टोकते, अरे शर्मा जी आज तक तो आपकी पत्नी के कपड़े उड़कर केवल खंबे तक जाते थे और आज तो आपका अंडरवियर बंदर पहने घूम रहा है। ऐसा कीजिए आप इसे वापस ले लीजिए हम मदद करते है। शर्मा जी बोले क्या इसमें लिखा है यह मेरा अंडरवियर है। 

शर्मा जी मुंह छुपाते-छुपाते घर तक आ गए और सारा वाक्या अपनी पत्नी को बताया तो पत्नी ने तंज कसा की वापस क्यों नहीं लेकर आए, अगर खंबे से मेरी साड़ी उतारकर ला सकते हैं तो ये क्यों नहीं? शर्मा जी बोले भाग्यवान कुछ तो शर्म करो इज्जत का फालूदा निकालोगी क्या?

खैर यह तो एक वाक्या हुआ। एक दिन शर्मा जी रोजमर्रा की दुकान से जो अंडरवियर लाए वो साइज में दो नंबर कम था। शर्मा जी ने अंडरवियर पहन लिया और अंडरवियर मशीन में धुल गया। पहनने के बाद शर्मा जी को लगा यह तो टाइट है, तो उन्होंने उसे पुराने अंडरवियर से नापा जो 2 इंच छोटा था। शर्मा जी ने शर्माइन को बोला चलो इस अंडरवियर को वापस करने।
शर्माइन बोली शर्मा जी अंडरवियर कौन वापिस करता है, वह भी पहना हुआ। शर्मा जी ने बोला हम करेंगे ना वापस। शर्माइन बोली शर्म बाकी है मुझ में। आप चले जाओ मैं नहीं जाऊंगी।

शर्मा जी की दुकान में गए और बिफरते हुए बोले कि आप लोगों को बेवकूफ बनाते हो। अंडरवियर तो टाइट आया है, जो नंबर बोला था आपने उसे दो नंबर कम दिया है। दुकानदार ने समझदारी दिखाते हुए बिना कुछ कहे, उनको नया अंडरवियर दे दिया। खैर शर्मा की खुशी-खुशी घर वापस आ गए जैसे बहुत बड़ा किला फतह कर लिया हो। शर्माइन को बहुत गुस्सा आया। शर्मा इन बोली न वापस करने वाले को शर्म और न लेने वाले को शर्म। अब बच्चे शर्मा जी और शर्माइन की चिलमपो से बहुत परेशान हो चुके थे। बेटा बोला मम्मी तुम्हारी आदत भी गंदी है दौड़-भाग के चक्कर में कपड़ों में चिमटी नहीं लगती हो, जिससे पूरे मोहल्ले में जगहंसाही होती है और पापा आपकी कंजूसी और सामान वापस करने की आदत से हमारा बाहर जाना मुश्किल हो गया है।  शर्मा और शर्माइन अब एक हो गए और बच्चों पर बरसते हुए बोले तुम्हें मालूम नहीं है कि तुम्हारी मां उत्तर भारतीय बिल्कुल बेफिक्र और मैं दक्षिण भारतीय सोच समझकर चलने वाला और तुम हाइब्रिड बच्चे हो तुम्हें भी हमारे रंग में रंग जाना चाहिए था। तुम उल्टा हमें ही सुना रहे हो। घोर कलयुग है। बच्चे मां-बाप को समझाने लग गए हैं। हम लड़ते नहीं हैं। हम यह तो घर के माहौल को हल्का-फुल्का बनाए रखने के लिए खट्टी-मीठी नोकझोंक है।

- बीना नयाल, स्वतंत्र लेखिका

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