वार्ता विफल : क्या थमेगा खाड़ी युद्ध का संकट!

Amrit Vichar Network
Published By Virendra Pandey
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लेखक
विवेक शुक्ला, पूर्व प्रधान सूचना अधिकारी, यूएई एंबेसी
 
अमेरिका-ईरान के बीच चल रही बातचीत फिलहाल विफल हो गई है। इस बातचीत पर पूरी दुनिया की निगाहें थीं। अब अहम सवाल यह है कि इस संकट का हल कैसे निकलेगा?

इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत फिलहाल विफल हो गई है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में हो रही यह वार्ता खाड़ी युद्ध को खत्म करने का आखिरी मौका प्रतीत हो रही थी। फरवरी 2026 में शुरू हुए इस संघर्ष ने पहले ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को प्रभावित कर दिया, हजारों लोगों की जान ले ली और तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं। दो हफ्ते का सीजफायर फिलहाल टिका हुआ है, इस्लामाबाद की बातचीत फिलहाल नाकाम रही है और अब अगर जंग लंबी खिंच गई तो इसका असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, राजनीति और आम लोगों की जिंदगी बुरी तरह हिल जाएगी।

सबसे बड़ा झटका ऊर्जा बाजार को लगेगा। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से दुनिया का करीब 20-25 प्रतिशत तेल गुजरता है। अगर ईरान ने फिर से इसे ब्लॉक किया या हमले बढ़ाए तो रोजाना 15-20 मिलियन बैरल तेल की सप्लाई रुक सकती है। अभी तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुकी हैं। लंबी जंग की स्थिति में ये 130 से 170 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने इसे अब तक का सबसे गंभीर सप्लाई शॉक बताया है। गैस की कीमतें भी दोगुनी हो जाएंगी। नतीजा साफ है– हर जगह महंगाई का कहर। पेट्रोल, डीजल, ट्रांसपोर्ट, खाने-पीने की चीजें– सब कुछ महंगा हो जाएगा।

विकसित देशों में महंगाई की आशंका बढ़ जाएगी, जबकि उभरती अर्थव्यवस्थाएं जैसे भारत, चीन और दक्षिण कोरिया सबसे ज्यादा प्रभावित होंगी, क्योंकि ये तेल के बड़े आयातक हैं। ग्लोबल इकोनॉमी पर असर और भी गहरा होगा। अर्थशास्त्री चेतावनी दे रहे हैं कि अगर युद्ध कुछ महीनों तक चला, तो दुनिया की जीडीपी ग्रोथ 0.2 से 1.2 प्रतिशत तक गिर सकती है। शेयर बाजारों में भारी उथल-पुथल मचेगी, सप्लाई चेन बाधित होंगी और यूरोप तथा एशिया में गैस संकट और गहरा जाएगा। खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था तो बुरी तरह चोट खाएगी। सऊदी अरब, यूएई और कुवैत में बुनियादी ढांचे पर हमले हो चुके हैं।
संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के अनुसार, अरब देशों की जीडीपी पर 120 से 194 बिलियन डॉलर का भारी असर पड़ सकता है। मानवीय संकट भी विकराल रूप ले लेगा। अभी तक हजारों मौतें हो चुकी हैं और लाखों लोग बेघर हो गए हैं।  शरणार्थी संकट यूरोप और एशिया तक फैल सकता है। स्वास्थ्य सुविधाएं पूरी तरह चरमरा जाएंगी। इसके साथ ही पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचेगा, क्योंकि युद्ध में तेल सुविधाओं और रिफाइनरियों पर हमले से प्रदूषण बढ़ेगा।

वैश्विक राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। अमेरिका-ईरान जंग से रूस और चीन को अप्रत्यक्ष फायदा हो सकता है। रूस यूक्रेन मोर्चे पर अपना ध्यान बंटा सकेगा, जबकि चीन सस्ते दामों पर तेल खरीदकर अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करेगा। खाड़ी देश अमेरिका पर अपना भरोसा खो सकते हैं। नाटो गठबंधन में दरारें और गहरी होंगी। मध्य पूर्व में नए गठजोड़ बन सकते हैं। इजराइल-लेबनान फ्रंट एक बार फिर गर्म हो सकता है, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ेगी।

भारत पर इसका सीधा और गहरा असर पड़ेगा। हमारा लगभग 40 प्रतिशत तेल और 80 प्रतिशत गैस मध्य पूर्व से आता है। तेल की कीमतें बढ़ने से आयात बिल आसमान छू जाएगा, रुपया और कमजोर होगा तथा मुद्रास्फीति पर काबू पाना मुश्किल हो जाएगा। सरकार के उच्च अधिकारी भी मान रहे हैं कि जंग लंबी खिंचने से महंगाई बढ़ेगी, आर्थिक ग्रोथ पर दबाव पड़ेगा और विदेशों में रह रहे भारतवंशियों द्वारा भेजे जाने वाले धन की आवक प्रभावित होगी। खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीय मजदूर पहले ही वापस लौट रहे हैं। लंबी जंग का मतलब सिर्फ ऊर्जा संकट नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा पर भी गंभीर खतरा होगा। उर्वरक महंगे होने से फसलें प्रभावित होंगी, जिससे खाद्यान्न की कीमतें बढ़ेंगी।

गरीब देशों में भुखमरी बढ़ेगी और विकासशील दुनिया में आर्थिक अस्थिरता फैल जाएगी। अगर मसले का हल निकलता है, तो पूरी दुनिया को बड़ी राहत मिलेगी, लेकिन अगर बात नहीं बनी, तो अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ चेतावनी दे दी है– फिर से बड़े हमले हो सकते हैं। ईरान भी किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा है। दोनों तरफ से सख्त रुख अपनाया जा रहा है। अगर जंग दोबारा शुरू होती है तो आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर अभूतपूर्व संकट खड़ा हो सकता है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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