ऐसे हुआ माचिस का आविष्कार

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Published By Anjali Singh
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माचिस की खोज मानव इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम थी, क्योंकि इससे आग जलाना बेहद आसान हो गया। पहले के समय में लोग आग जलाने के लिए पत्थरों को आपस में रगड़ते थे या लकड़ी से घर्षण पैदा करते थे, जो काफी कठिन और समय लेने वाला काम था। आधुनिक माचिस का विकास 19 वीं सदी में हुआ। वर्ष 1826 में इंग्लैंड के रसायनज्ञ जॉन वॉकर ने पहली बार ऐसी माचिस बनाई, जिसे रगड़कर जलाया जा सकता था। उन्होंने लकड़ी की छोटी तीली के सिरे पर रसायनों का मिश्रण लगाया, जिसमें एंटिमनी सल्फाइड, पोटैशियम क्लोरेट और गोंद शामिल थे। जब इस तीली को खुरदुरी सतह पर रगड़ा जाता था, तो घर्षण से यह जल उठती थी।

हालांकि वॉकर की माचिस में एक समस्या थी। यह जलते समय तेज गंध और चिंगारियां पैदा करती थी। इसके बाद फ्रांस के रसायनज्ञ चार्ल्स सौरिया ने इसमें सफेद फॉस्फोरस का उपयोग किया, जिससे माचिस आसानी से जलने लगी, लेकिन यह फॉस्फोरस जहरीला था और इससे काम करने वाले मजदूरों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता था। इस समस्या को दूर करने के लिए स्वीडन के वैज्ञानिक गुस्ताफ पास्च और बाद में जोहान लुंडस्ट्रॉम ने “सेफ्टी माचिस” विकसित की। इसमें लाल फॉस्फोरस को तीली पर नहीं, बल्कि माचिस की डिब्बी की साइड पर लगाया गया।

इससे माचिस ज्यादा सुरक्षित हो गई और आज भी हम इसी प्रकार की माचिस का उपयोग करते हैं। इस तरह माचिस की खोज कई वैज्ञानिकों के प्रयासों का परिणाम है, जिसने मानव जीवन को सरल और सुविधाजनक बना दिया। आज माचिस हमारे दैनिक जीवन का एक सामान्य और बेहद उपयोगी साधन बन चुकी है।

वैज्ञानिक के बारे में

जॉन वॉकर का व्यक्तिगत जीवन अत्यंत सरल और सादगीपूर्ण था, लेकिन उनकी खोज ने उन्हें इतिहास में विशेष स्थान दिलाया। उनका जन्म 29 मई 1781 को इंग्लैंड के स्टॉकटन-ऑन-टीज़ में हुआ था। वे पेशे से एक केमिस्ट और दवा विक्रेता थे तथा अपनी दुकान पर दवाइयां बनाते हुए खाली समय में रसायनों के साथ प्रयोग किया करते थे। स्वभाव से वे शांत, जिज्ञासु और मेहनती थे। उन्हें न तो अधिक प्रसिद्धि की चाह थी और न ही धन कमाने की लालसा, यही कारण रहा कि उन्होंने माचिस की खोज का पेटेंट भी नहीं कराया। उनके इस निर्णय का लाभ बाद में अन्य लोगों ने उठाया। जॉन वॉकर ने विवाह नहीं किया और अपना पूरा जीवन अपने काम व प्रयोगों को समर्पित कर दिया। 1 मई 1859 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी खोज आज भी दुनिया भर में उपयोगी बनी हुई है।