नारी सशक्तिकरण के बीच पुरुष संवेदनाओं की अनदेखी सच्चाई

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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देश के विभिन्न हिस्सों विशेषकर दिल्ली, गुरुग्राम और जयपुर से ऐसी खबरें सामने आई हैं, जहां पुरुषों ने मानसिक तनाव, आर्थिक दबाव और वैवाहिक विवादों के कारण कठोर कदम उठाए। ये घटनाएं केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं हैं, बल्कि समाज की उस सोच को दर्शाती हैं, जहां पुरुषों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर नहीं मिलता। वर्तमान समय में भारतीय समाज एक गहरे परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है।

नारी सशक्तिकरण ने महिलाओं को नई पहचान, आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की क्षमता प्रदान की है, जो एक सकारात्मक और आवश्यक सामाजिक बदलाव है, किंतु इस परिवर्तन के साथ एक और पहलू उभर कर सामने आ रहा है, पुरुषों की बदलती सामाजिक और मानसिक स्थिति, जिस पर अपेक्षित गंभीरता से विचार नहीं किया जा रहा।

रिसर्चगेट पर उपलब्ध कई हालिया शोध (2020–2024) बताते हैं कि 25–35% पुरुष मानसिक या भावनात्मक प्रताड़ना का सामना करते हैं। इंडियन फैमिली फाउंडेशन की रिपोर्ट्स में भी पुरुषों के उत्पीड़न और आत्महत्या के मामलों को एक गंभीर सामाजिक मुद्दा बताया गया है। देश में हाल ही में वैवाहिक विवादों और तलाक के मामलों में बढ़ोतरी चर्चा का विषय बनी है। पारिवारिक अदालतों में आने वाले मामलों से यह स्पष्ट होता है कि पति-पत्नी के बीच संवाद की कमी, आर्थिक दबाव और आपसी समझ की कमी रिश्तों को कमजोर कर रही है। तलाक के बाद पुरुषों को न केवल आर्थिक जिम्मेदारियों जैसे गुजारा भत्ता का बोझ उठाना पड़ता है, बल्कि अपने बच्चों से दूर रहने की पीड़ा भी सहनी पड़ती है।

क्या एक समाज सच में इस तरह सशक्त कहलाया जा सकता है, अगर वह केवल एक पक्ष की आवाज़ सुनता हो? नारी सशक्तिकरण का मूल उद्देश्य महिलाओं को समान अधिकार और अवसर प्रदान करना है। आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर रही हैं। यह परिवर्तन समाज के संतुलित विकास के लिए आवश्यक है। महिला और पुरुष, दोनों मिलकर समाज की आधारशिला हैं, लेकिन समानता का वास्तविक अर्थ केवल एक वर्ग को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि दोनों वर्गों के बीच संतुलन स्थापित करना है। यदि समाज केवल महिलाओं के सशक्तिकरण पर ध्यान देगा और पुरुषों की चुनौतियों को नजरअंदाज करेगा, तो यह असंतुलन भविष्य में गंभीर समस्याओं का कारण बन सकता है। 

आज भी समाज में पुरुषों के लिए एक तय छवि बनाई गई है उन्हें मजबूत रहना है, जिम्मेदार बनना है और अपनी भावनाओं को दबाकर रखना है। बचपन से ही उन्हें सिखाया जाता है, ‘मर्द बनो, रोते नहीं।’ यही वाक्य उनके पूरे जीवन की दिशा तय कर देता है। वे अपने दर्द को छुपाना सीख जाते हैं, अपनी कमजोरी को स्वीकार करने से डरते हैं और धीरे-धीरे एक ऐसी खामोशी में जीने लगते हैं, जो बाहर से मजबूती दिखती है, लेकिन अंदर से उन्हें तोड़ती रहती है।

एक उदाहरण के रूप में देखें, एक व्यक्ति का वैवाहिक विवाद तलाक तक पहुंच गया। कानूनी प्रक्रिया के बाद उसे हर महीने आर्थिक सहायता देनी पड़ी और बच्चों से मिलने का समय भी सीमित हो गया। बाहर से वह सामान्य जीवन जीता हुआ दिखाई देता था, लेकिन अंदर से वह अकेलेपन और मानसिक तनाव से जूझ रहा था। उसने अपनी भावनाएं किसी से साझा नहीं कीं, क्योंकि उसे डर था कि समाज उसे कमजोर समझेगा। यह स्थिति केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि हजारों ऐसे पुरुषों की है जो रिश्तों की टूटन के बाद खामोशी में जी रहे हैं। 

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डॉ. नीलू तिवारी (लेखिका)