बोल बरेली:आजादी को 78 साल बीते, आधी आबादी से चेहरे सिर्फ तीन जीते
बरेली। महिला आरक्षण पर पक्ष-विपक्ष की बहस के बीच महिलाओं की राजनीति में भागीदारी पर नजर डालना भी जरूरी है। चुनावी आंकड़े इस बात की साफ गवाही देते हैं कि जीत की जटिलता में उलझीं प्रमुख पार्टियां आधी आबादी पर चुनावी दांव लगाने में बहुत कंजूसी बरतती हैं। यही वजह है कि रुहेलखंड की राजनैतिक धुरी कहे जाने वाले बरेली से अभी तक सिर्फ तीन महिलाएं ही जीतकर दिल्ली पहुंच सकी हैं।
बरेली लोकसभा से पूर्व राष्ट्रपति फकरुद्दीन अली अहमद की पत्नी बेगम आबिदा अहमद, आंवला से नेहरू-गांधी परिवार की बहू मेनका गांधी और सन्हा(अब बिथरी) विधानसभा से दिग्गज खानदान की से ठाकुर सुमनलता सिंह का नाम ही महिला एमपी-एमएलए की सूची में नरजर आता है। मेयर व जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी दिग्गज राजनैतिक परिवारों की 5 धाकड़ महिलाएं जरूर संभाल चुकी हैं मगर लोकसभा-विधानसभा का लंबा खालीपन सच का आइना दिखाने के लिए काफी है।
बरेली में दो लोकसभा व 9 विधानसभा सीट हैं और 2009 के बाद से किसी सीट पर महिला प्रतिनिधित्व नहीं रहा है। जिले की आखिरी महिला सांसद मेनका गांधी थीं, जो गैर जनपद से ही अपनी सीट छोड़कर आंवला के रण में उतरीं थीं और जीत दर्ज कर लोसकभा पहुंची थीं। 2014 में वह आंवला से नहीं लड़ीं। उनकी जगह भाजपा से पूर्व मंत्री धर्मेन्द्र कश्यप लड़े और जीते भी मगर महिला नुमाइंदगी फिर शून्य पर आ गई जो अभी तक कायम है। जिले की पहली महिला सांसद की बात करें तो यह नाम बेगम आबिदा अहमद का रहा है। 1981 में वह कांग्रेस की टिकट पर बरेली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ीं थीं और फतह हासिल कर संसद पहुंची थीं। उन्होंने 1984 में भी जीत का परचम फहराया था, हालांकि तीसरी बार 1989 के चुनाव में भाजपा के संतोष गंगवार के मुकाबले हार गई थीं। उसके बाद बरेली लोकसभा में भी महिला प्रतिनिधित्व नजर नहीं आया है। 2014 में पूर्व विधायक इस्लाम साबिर की बहू और भोजीपुरा से विधायक शहजिल इस्लाम की पत्नी आयशा इस्लाम सपा की टिकट पर मैदान में उतरीं थी, लेकिन पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं वर्तमान में झारखंड राज्यपाल संतोष गंगवार के मुकाबले शिकस्त खा बैठी थीं।
इसी तरह बरेली में अकेली महिला विधायक के तौर पर ठाकुर सुमनलता सिंह का नाम दर्ज है। दिग्गज परिवार की बेटी और बहू सुमनलता सिंह ने सन्हा सीट से भाजपा की टिकट पर जीत का झंडा बुलंद किया था। जिले की राजनीति का बेहद प्रभावशाली नाम मानी जाने वालीं सुमनलता सिंह 2002 में बसपा प्रत्याशी धर्मेन्द्र कश्यप से बहुत कम वोटों के अंतर से मात खा बैठी थीं। उसके बाद से जिले में कोई महिला एमएलए नहीं बन सकी हैं। पूर्व मेयर सुप्रिया ऐरन बरेली कैंट सीट से किस्मत जरूर आजमाती रहीं है मगर जीत की दहलीज तक नहीं पहुंच पाई हैं। फरीदपुर सुरक्षित सीट से पिछली बार महिला चेहरे मैदान में उतरे थे, लेकिन विजय नहीं मिल सकी है। सच ये भी है कि चुनावी मोर्चे पर कम ही सही लेकिन प्रमुख राजनैतिक परिवारों की महिलाओं को ही मौका मिलता दिखता है। खास की जगह आम भागीदारी जैसे शून्य पर ठहरी दिखती है। महिला आरक्षण से आधी आबादी के बीच नई उम्मीद जगी थी, लेकिन वह कहानी भी फिलहाल थम गई है।
नारीशक्ति ने चार बार संभाली जिला पंचायत की कुर्सी
लोकसभा-विधानसभा के विपरीत बरेली में जिला पंचायत की राजनीति कई दशक से महिलाओं के इर्द-गिर्द ही घूम रही है। दिग्गज परिवारों की 4 महिलाएं अध्यक्ष की कुर्सी संभाल चुकी हैं, जिनमें मौजूदा समय में रश्मि पटेल भी हैं। 1995 में पूर्व विधायक महीपाल सिंह यादव की पत्नी सरोज यादव जिला पंचायत अध्यक्ष चुनी गई थीं। उनकी बहू गौरी यादव अभी जिला पंचायत सदस्य हैं। 2000 में तत्कालीन बसपा एमएलसी केसर सिंह गंगवार के भाई की पत्नी ऊषा गंगवार जिला पंचायत अध्यक्ष बनीं। 2011 में तत्कालीन बसपा विधायक बिथरी वीरेन्द्र सिंह के भाई की पत्नी नीरू पटेल ने अध्यक्ष की कुर्सी संभाली। उनके बाद 2021 में पूर्व विधायक-पूर्व मेयर कुंवर सुभाष पटेल की पुत्रबधू रश्मि पटेल अध्यक्ष की कुर्सी पर आसीन हुई और अभी भी जिम्मेदारी संभाल रही हैं।
मेयर सुप्रिया ऐरन, ब्लॉक प्रमुख-पंचायत सदस्य कई
पूर्व सांसद प्रवीण सिंह ऐरन की पत्नी सुप्रिया ऐरन बरेली की महिला मेयर रह चुकी हैं। हालांकि, उनसे पहले और बाद में अभी तक इस सीट पर कोई महिला नहीं पहुंचीं हैं। जिला पंचायत सदस्य और ब्लॉक प्रमुख चुनाव, नगर पालिका-नगर पंचायत चेयरमैन चुनाव में महिलाओं की जीत की कहानी जरूर अच्छी रही है। वर्तमान में ही जिले के अंदर कई महिला प्रतिनिधि हैं। पंचायतों में भी आधी आबादी आंकड़ों में उपस्थिति दर्ज कराती दिखती है मगर बात लखनऊ-दिल्ली की आती है तो अभी तक उम्मीद पर बार-बार नाउम्मीदियों के साए घने होते रहे हैं।
