वक्त आ गया है... रील के मोहल्ले को छोड़कर 'यादों' की गली में जाने का ! सक्रियता से बदलेगी जिंदगी, फैटी लिवर से भी होगा बचाव
लखनऊ, अमृत विचार : मौजदूा जीवनशैली में बहुत विरोधाभास है। आज सभी के पास मनोरंजन के साधन पहले से कहीं ज्यादा हैं, लेकिन सुकून और खुशियां बहुत कम लोगों के पास है। इसके पीछे की एक बड़ी वजह आज के समय में डिजिटल दौर का एकाकी मनोरंजन और आरामतलबी है।
जो लोगों को बीमार और बहुत बीमार बना रहा है। पेट मोटा और लिवर फैटी हो रहा है और शरीर पूरा बीमारियों का घर बन रहा है, कम उम्र में भी आदमी उम्रदराज और नीरस लग रहा है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ वयस्क ही इसकी चपेट में आ रहे हैं, हालात तो यह है कि फैटी लिवर की समस्या से बच्चे भी नहीं बच पा रहे हैं।
हमारे यहां ओपीडी में इलाज के लिए हर दस में से तीन बच्चे फैटी लिवर के आ रहे हैं। यह कहना है केजीएमयू में गैस्ट्रोमेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष गेस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट डॉ. सुमित रूंगटा का। ऐसे में शारीरिक और मानसिक सक्रियता ही हमें मोटापे और फैटी लिवर से बचा सकती है, लेकिन यदि आप बीमारी की चपेट में आ गये हैं तो बिना देर किये चिकित्सक से सलाह लें और उनके दिशा निर्देश पर इलाज करें।
उन्होंन बताया कि पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द या भारीपन, थकान और कमजोरी, भूख में कमी, तेजी से वजन बढ़ना, कभी-कभी उल्टी या मतली होने की शिकायत होना फैटी लिवर का लक्षण हो सकता है।
मोबाइल मनोरंजन नहीं, डिजिटल नशा है
डॉ. सुमित रूंगटा बताते हैं कि मोबाइल मनोरंजन नहीं बल्कि डिजिटल नशा है, आज हमने मनोरंजन और खुशियों को ऑर्डर करना शुरू कर दिया है। खुशियां अब अपनों का साथ छोड़ मोबाइल की स्क्रीन तक आ गयी हैं। हम साथ तो बैठते हैं, लेकिन सबके हाथ में अपना-अपना फोन होता है। रेस्टोरेंट का खाना और घर पर पिज्जा पार्टी अब एन्जॉयमेंट का विकल्प बन गई है। देर रात तक बिस्तर में लेटे हुए वीडियो देखना हमें सुकून देने के बजाय थकान दे रहा है। समस्या यह है कि इससे पेट तो बढ़ रहा है, बीमारियां भी हो रही रहीं, लेकिन मन नहीं भर रहा। कुल मिलाकर मोबाइल से मनोरंजन और जंक फूड खाना सिर्फ वजन बढ़ा रहा है, खुशियां नहीं बढ़ा रहा है।
मौज, मस्ती और सेहत पाना है तो स्क्रीन से हटकर होगा जीना
डॉ. सुमित के मुताबिक पहले के दौर में मनोरंजन का अर्थ सबका साथ होता था। शाम होते ही मोहल्ले में लोग जुटते थे, गांवों में चौपालें लगती थीं, मैदानों में पसीने से तर-बतर होकर बच्चे व वयस्क खेल खेलते थे और सिनेमाघर की एक फिल्म पर पूरे हफ्ते चर्चा होती थी। तब थिएटर में तालियों की गूंज और दोस्तों के साथ बिताया गया समय सिर्फ वक्ता काटना नहीं, बल्कि यादें सजोना था। वह मौज असली थी और वह खुशियां असली थीं, उसमें शारीरिक सक्रियता और भावनाओं का मेल था। याद रखिए असली खुशियां गैजेट्स में नहीं, एक दूसरे से जुड़ाव और सक्रियता में है।
छोटे कदम से मिलेगी बड़ी खुशियां
डॉ. सुमित बताते हैं कि यदि जिंदगी में खुशियों और ताजगी को महसूस करना चाहते हैं, तो हम सभी को अपनी आदतों में थोड़ा बदलाव तो जरूर करना होगा। यकीन मानिए इससे न सिर्फ सेहत सुधरेगी बल्कि व्यक्ति की कार्य के प्रति एकाग्रता भी बढ़ेगी। उन्होंने इसके लिए कुछ उपाय भी सुझाये हैं और कहा कि रोजाना 30 मिनट साइकिल चलाकर देखिए, ठंडी हवा और रास्तों का साथ न सिर्फ वजन कम करेगा, बल्कि मन को भी बदल देगा, उसे तरोताजा कर देगा। रेस्टोरेंट्स पर जाने से बचिये, घर का खाना खाइये और सबसे जरूरी बात बच्चों से मोबाइल लेकर उनके साथ मिलकर कागज और गत्ते के टुकड़ों के साथ कुछ नया बनाइये। यह खुशी बच्चों के लिए किसी वीडियो गेम से कहीं ज्यादा होगी। तो उठिए आज से ही शुरू करिये नई जिंदगी, साइकिल निकालिए, अपनों के साथ ठहाके लगाइए, क्योंकि असली मजा जिंदगी जीने में है, मोबाइल देखने में नहीं।
