चिंपैंजियों के बीच चल रहा हैखूनी गृहयुद्ध
दुनिया के एक हिस्से में एक ऐसी जंग भी हो रही है, जिसमें सीजफायर कराने वाला कोई नहीं है। ये ईरान, इजराइल या अमेरिका के बीच युद्ध नहीं है, बल्कि ये अफ्रीकी देश युगांडा के जंगलों में चल रहा है और इस युद्ध में इंसान नहीं, बल्कि चिंपैंजी यानी वनमानुष लड़ रहे हैं। वैसे तो यह युद्ध पिछले आठ सालों से लगातार चल रहा है, लेकिन अप्रैल 2026 में यह तब प्रकाश में आया जब वैज्ञानिकों ने पश्चिमी यूगांडा (पूर्वी अफ्रीका) के किबाले नेशनल पार्क (नगोगो क्षेत्र) में चिंपैंजी के बीच एक बहुत खूनी “सिविल वार” (आंतरिक युद्ध) की रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसे मीडिया में “ब्लडियस वार ऑन रिकार्ड” या “प्राइमेट सिविल वार” कहा जा रहा है। यहां दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञात जंगली चिंपैंजी समूह है, जिसमें लगभग 200 सदस्य। शोधकर्ता इसे 1995 से अध्ययन कर रहे हैं। - डॉ. इरफान ह्यूमन
चिंपैंजी का वैज्ञानिक विश्लेषण
चिंपैंजी यानी वनमानुष, जिसे आम बोलचाल की भाषा में कभी-कभी चिम्प भी कहा जाता है, का वैज्ञानिक नाम पैन ट्रोग्लोडाइट्स है। यह होमिनीडे परिवार का सदस्य है। चिंपैंजी मनुष्यों से कई व्यावहारिक और संज्ञानात्मक लक्षण साझा करते हैं, जैसे हंसी, दुख, सहानुभूति और औजार उपयोग। ये विशेषताएं उन्हें वैज्ञानिक अध्ययन (प्राइमेटोलॉजी) के लिए बहुत महत्वपूर्ण बनाती हैं। इनके सबसे निकटतम रिश्तेदार हैं बोनोबो और मनुष्य। मनुष्यों के साथ डीएनए समानता लगभग 98.7 प्रतिशत है। दोनों का एक साझा पूर्वज लगभग 6-7 मिलियन वर्ष पहले था। चिंपैंजी औजारों का उपयोग करते हैं, जैसे छड़ियों से दीमक निकालना, पत्थर से नट तोड़ना आदि। जेन गुडॉल ने 1960 में सबसे पहले इसका अवलोकन किया था, जिसमें उन्होंने समस्या समाधान, योजना बनाना, स्मृति, संकेत भाषा सीखना और संख्याओं की समझ का अध्ययन साझा किया। ये शिकार करते हैं, कभी-कभी युद्ध और हिंसा भी दिखाते हैं।
चिंपैंजी गृहयुद्ध के कारण
चिंपैंजी के युद्ध का वैज्ञानिकों को सटीक कारण अभी पता नहीं है। चिंपैंजियों के बीच छिड़े इस गृहयुद्ध के पीछे तीन बड़ी वजहें बताई जा रही हैं। पहली है चिंपैंजियों की बढ़ती जनसंख्या। साल 2016 तक किबाले नेशनल पार्क में चिंपैंजियों के गुटों में सदस्यों की संख्या 200 के पार पहुंच गई थी, इतनी आबादी की वजह से खाने के संसाधनों को लेकर तनाव पैदा होने लगा था। दूसरी बड़ी वजह थी 2017 में जंगलों में आया एक वायरस, जिससे बुजुर्ग चिंपैंजियों की बड़ी तादाद में मौत हो गई थी। बुजुर्गों की मौत के बाद बड़े गुटों में कई अल्फा मेल यानी गुट का नेतृत्व करने वाले चिंपैंजी बन गए थे। इसी तीसरे कारण के चलते चिंपैंजियों के गुट ज्यादा क्षेत्र कब्जाने के लिए लड़ने लगे और यह गृहयुद्ध छिड़ गया।
बीते दिनों यहां शुरुआत में आपसी टकराव के चलते पच्चीस चिंपैंजियों की मौत हुई थी और इन मौतों के बाद से ये कथित गृहयुद्ध बढ़ता चला गया और ये आज तक जारी है। आपके मन में एक सवाल उठ रहा होगा कि आखिर चिंपैंजी गृहयुद्ध कैसे करते हैं? क्या चिंपैंजी भी कोई रणनीति बनाते हैं? क्या चिंपैंजियों के पास भी इंसानों की तरह हथियार होते हैं? चिंपैंजी और इंसान के डीएनए में अधिकांश समानता होती है। यही वजह है कि जब चिंपैंजी जंग करने उतरता है, तो वो इंसानों की तरह रणनीति भी बनाता है। चिंपैंजी अपने शत्रु की आवाजाही के रास्ते को देखते और समझते हैं। जब शत्रु कम संख्या में अपने पारंपरिक रास्ते से गुजर रहा होता है, तो बड़ा दल बनाकर चिंपैंजी उस पर हमला कर देते हैं, बिल्कुल इंसानों की तरह। खास बात ये है कि हमले के वक्त आक्रामक दल के कुछ चिंपैंजी उन रास्तों को बंद कर देते हैं, जहां से दुश्मन के भागने की संभावना हो, जो एक खूनी संघर्ष को जन्म देता है।
क्या कहते हैं वैज्ञानिक अध्ययन
साइंस जर्नल में प्रकाशित एक नए अध्ययन में प्राइमेटोलॉजिस्ट आरोन सैंडेल और उनके सहयोगियों ने जंगली चिंपैंजी में देखे गए पहले ‘गृह युद्ध’ का दस्तावेजीकरण किया है। जून 2015 में सैंडेल युगांडा के किबाले राष्ट्रीय उद्यान में न्गोगो चिंपैंजी समूह के एक छोटे से झुंड का अवलोकन कर रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि जैसे ही चिंपैंजी के बड़े समूह के अन्य सदस्य जंगल में उनके करीब आने लगे, उनके सामने मौजूद चिंपैंजी घबराए हुए व्यवहार करने लगे। वे मुंह बनाने लगे और एक-दूसरे को तसल्ली देने के लिए छूने लगे, ऐसा लग रहा था जैसे वे किसी अजनबी से मिलने वाले हों, जबकि वे सब उनके अपने करीबी साथी थे। सैंडेल ने बाद में कहा कि वह क्षण चिंपैंजी के एक कभी घनिष्ठ समूह के बीच वर्षों तक चलने वाले खूनी संघर्ष का पहला संकेत था।
शोधकर्ताओं ने दुनिया में जंगली चिंपैंजी के सबसे बड़े ज्ञात समूह में स्थायी विभाजन का पता लगाने के लिए चिंपैंजी के इस सुप्रसिद्ध समूह के तीन दशकों से अधिक के व्यवहार संबंधी अवलोकनों का सहारा लिया। दोनों समूहों के मजबूत होने के बाद, पश्चिमी समूह के सदस्यों ने अगले सात वर्षों में केंद्रीय समूह पर चौबीस लगातार और समन्वित हमले किए, जिनमें कम से कम सात वयस्क पुरुषों और सत्रह शिशुओं की मौत हो गई। सैंडेल ने बताया कि अचानक मृत्यु ने संभवतः मोहल्लों के बीच संबंधों को कमजोर कर दिया, जिससे अल्फा परिवर्तन होने पर यह समूह ध्रुवीकरण के प्रति संवेदनशील हो गया।
फिर 2017 में एक बीमारी का प्रकोप भी हुआ, जिसने संभवतः विभाजन को अपरिहार्य बना दिया या इसे थोड़ा तेज कर दिया। अध्ययन में बताया गया है कि आनुवंशिक साक्ष्यों के आधार पर, चिंपैंजी के बीच ये गृहयुद्ध संभवतः हर 500 वर्षों में एक बार होते हैं यानी 500 सालों में चिंपैंजियों की आबादी ज्यादा हो जाती है और फिर आपसी तनाव और खून-खराबे का दौर शुरू होता है, लेकिन सैंडेल ने कहा कि कोई भी मानवीय गतिविधि जो सामाजिक एकता को बाधित करती है, जैसे वनों की कटाई, जलवायु संकट या बीमारियों का प्रकोप, ऐसे अंतर-समूह संघर्षों को और अधिक सामान्य बना सकती है।
मानव युद्ध की जड़ों की समझ
चिंपैंजी हमारे सबसे करीबी रिश्तेदार हैं। शोधकर्ता 30$ साल के डेटा से यह अध्ययन साइंस जर्नल में प्रकाशित की। 24 वर्षों के सामाजिक नेटवर्क डेटा से पता चला कि 2015 में दो क्लस्टर के बीच संबंध कमजोर पड़ने लगे। पहले वे एक-दूसरे के साथ घूमते, संभोग करते और संबंध रखते थे। बाद में वे अलग-अलग क्षेत्र में रहने लगे और 2018 तक कोई सकारात्मक संबंध नहीं बचा। “पुराने दोस्त दुश्मन बन गए”, यह रिलेशनल डायनेमिक्स (संबंधों की गतिशीलता) का परिणाम माना जाता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि चिंपैंजी में यह हिंसा बिना भाषा, धर्म, जाति या विचारधारा के सिर्फ सामाजिक संबंधों के टूटने से हुई। इससे मानव युद्ध की जड़ें समझने में मदद मिल सकती है, शायद संबंधों की गतिशीलता मानव संघर्ष में भी ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जितना हम सोचते हैं। वैज्ञानिक लगातार निगरानी कर रहे हैं।
