जिंदगी, जेब, सेहत और भविष्य पर भारी पड़ेगा जल संकट

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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शहरों में पानी अब सहज उपलब्ध संसाधन नहीं रहा। सुबह-शाम पानी आने का समय तय है और उसके बीच का पूरा दिन मैनेजमेंट में गुजरता है। कई जगहों पर लोग टैंकर के भरोसे हैं। यानी पानी अब बाजार में बिकने वाली चीज बन चुका है।

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राजेश जैन, वरिष्ठ पत्रकार

 

पानी अब सिर्फ प्यास बुझाने का साधन नहीं, बल्कि जीवन, स्वास्थ्य, खेती, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता की धुरी है और यही धुरी तेजी से कमजोर पड़ रही है। विडंबना यह है कि हम नहीं समझ पा रहे हैं कि पानी का संकट अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रहा, बल्कि हमारे समय का सबसे बड़ा सामाजिक, आर्थिक और मानवीय संकट बन चुका है। यह संकट उस बुनियादी संसाधन से जुड़ा है, जिसके बिना सभ्यता, विकास और जीवन की कल्पना ही संभव नहीं।

आज जल संकट की कहानी केवल सूखते तालाबों, घटते भूजल स्तर या कम होती बारिश तक सीमित नहीं है। यह उस परिवार की कहानी है, जो नल के निर्धारित समय का इंतजार करता है, उस किसान की कहानी है, जिसकी पूरी फसल बारिश और सिंचाई पर निर्भर है और उस शहर की कहानी है, जहां पानी अब अधिकार नहीं, बल्कि खरीदी जाने वाली सेवा बनता जा रहा है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि यह संकट अचानक नहीं आया। यह धीरे-धीरे हमारे जीवन में समाता गया और अब हमारी दिनचर्या, बजट, स्वास्थ्य और भविष्य सभी को प्रभावित कर रहा है।

शहरों में पानी अब सहज उपलब्ध संसाधन नहीं रहा। सुबह-शाम पानी आने का समय तय है और उसके बीच का पूरा दिन उसी की योजना बनाने में गुजरता है। कई इलाकों में लोग टैंकरों पर निर्भर हैं, यानी पानी अब बाजार में बिकने वाला उत्पाद बन चुका है। एक मध्यमवर्गीय परिवार हर महीने हजारों रुपये केवल पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने में खर्च कर रहा है। यह बदलाव खामोशी से हुआ, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बेहद गंभीर हैं, क्योंकि जब पानी बाजार का हिस्सा बनता है, तो समानता खत्म होने लगती है। पानी का निजीकरण धीरे-धीरे सामाजिक विभाजन को और गहरा कर रहा है, जहां भुगतान करने की क्षमता ही उपलब्धता तय करने लगी है।

जब सब्जियां महंगी होती हैं, तो चर्चा अक्सर पेट्रोल, डीजल या सप्लाई चेन तक सीमित रह जाती है, जबकि असली कारण कई बार पानी होता है। कम बारिश, गिरता भूजल स्तर और महंगी सिंचाई व्यवस्था खेती की लागत बढ़ा रहे हैं। इसका सीधा असर आम आदमी की थाली पर पड़ता है। यानी जल संकट केवल प्यास का संकट नहीं, बल्कि महंगाई का भी बड़ा कारक बन चुका है। आने वाले वर्षों में खाद्य सुरक्षा पर इसका असर और अधिक स्पष्ट दिखाई देगा।

पानी की उपलब्धता जितनी बड़ी समस्या है, उससे कहीं अधिक गंभीर चुनौती उसकी गुणवत्ता है। देश के अनेक हिस्सों में लोग वही पानी पी रहे हैं, जो उनकी बीमारियों का कारण बन रहा है। डायरिया, टाइफाइड, फ्लोराइड और आर्सेनिक जैसी समस्याएं लाखों लोगों की जिंदगी प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि क्या ‘हर घर जल’ केवल पाइपलाइन पहुंचाने तक सीमित है, या उसमें सुरक्षित और शुद्ध पानी भी शामिल है? केवल पहुंच नहीं, गुणवत्ता भी नीति का केंद्र बननी चाहिए।

जल संकट का सबसे बड़ा और अक्सर अदृश्य भार महिलाएं और बच्चे उठाते हैं। गांवों और बस्तियों में आज भी पानी लाने की जिम्मेदारी मुख्यतः महिलाओं पर है। कई किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाना उनके दैनिक जीवन का हिस्सा है। इसका असर बच्चों, विशेषकर लड़कियों की शिक्षा पर पड़ता है, क्योंकि पानी लाने की जिम्मेदारी उनके स्कूल समय को निगल जाती है। इस तरह जल संकट सामाजिक असमानता को और गहरा करता है।

एक ओर शहरों में स्विमिंग पूल, कार वॉश और सजावटी फव्वारों के लिए पानी उपलब्ध है, तो दूसरी ओर गांवों और झुग्गी बस्तियों में पीने के पानी के लिए संघर्ष हो रहा है। यह असमानता केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं की भी है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो पानी भविष्य में सामाजिक संघर्ष और अस्थिरता का बड़ा कारण बन सकता है। जल असमानता सामाजिक असंतोष को जन्म देती है और धीरे-धीरे व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ाती है।

पानी अब प्राकृतिक संसाधन भर नहीं, बल्कि राजनीतिक मुद्दा भी बन चुका है। चुनावों में मुफ्त पानी के वादे होते हैं, लेकिन दीर्घकालिक जल प्रबंधन पर गंभीरता कम दिखाई देती है। राज्यों के बीच नदी जल विवाद बढ़ रहे हैं। शहरों में अव्यवस्थित शहरीकरण और गांवों में जल संरचनाओं की उपेक्षा ने स्थिति को और जटिल बनाया है। स्पष्ट है कि समस्या केवल पानी की कमी नहीं, बल्कि उसके प्रबंधन की विफलता भी है।

जलवायु परिवर्तन ने पानी की उपलब्धता को और अनिश्चित बना दिया है। कहीं अचानक बाढ़ आती है, तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ता है। यह असंतुलन खेती, शहरों, उद्योगों और पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। अब जल संकट केवल ‘कम पानी’ का नहीं, बल्कि ‘अनिश्चित पानी’ का बन चुका है। मौसम की यह अनिश्चितता भविष्य की जल योजनाओं को और कठिन बना रही है।

जल संकट का समाधान केवल सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। यह सामूहिक जिम्मेदारी है। घरों में पानी बचाने की आदत, वर्षा जल संचयन, स्थानीय जल स्रोतों का पुनर्जीवन, अपशिष्ट जल का पुनः उपयोग और खेती में माइक्रो-इरिगेशन जैसी आधुनिक तकनीकों का विस्तार- ये छोटे कदम बड़े बदलाव ला सकते हैं। सबसे जरूरी है पानी को असीमित संसाधन मानने की मानसिकता बदलना।

जल संकट की सबसे खतरनाक बात यह है कि यह धीरे-धीरे बढ़ता है, इसलिए इसकी गंभीरता देर से समझ आती है, लेकिन अब स्थिति यह है कि पानी केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बुनियादी संकट बन चुका है। यदि आज पानी को राष्ट्रीय और व्यक्तिगत प्राथमिकता नहीं बनाया गया, तो आने वाले वर्षों में यह केवल समस्या नहीं रहेगा, यह संघर्ष का कारण बनेगा, घर-घर में, शहर-शहर में और देशों के बीच भी। पानी बचाना अब पर्यावरण प्रेम नहीं, अस्तित्व की अनिवार्यता है। (यह लेखक के निजी विचार हैं)