माल, बाल और पटाल: अल्मोड़ा की अनुपम सांस्कृतिक विरासत
समुद्र तल से लगभग 1,646 मीटर (5,400 फीट) की ऊंचाई पर स्थित पटाल बाजार में घूमते हुए रोमांच का अनुभव होना स्वाभाविक है, क्योंकि न केवल यह बाजार अल्मोड़ा शहर के केंद्र में एक लंबी पहाड़ी चोटी पर स्थित है, बल्कि यहां से हिमालय की शानदार सफेद दमकती चोटियां नजारे को अद्भुत कर देंती हैं। दरअसल, अल्मोड़ा का पटाल बाजार अपनी बनावट और ऐतिहासिक महत्व के कारण केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कुछ चुनिंदा बाजारों में गिना जाता है। इसकी तुलना अक्सर यूरोपीय देशों के ‘ओल्ड टाउन’ और मध्यकालीन बाजारों से की जाती है। उन अंतर्राष्ट्रीय बाजारों या शहरों के बारे में भी समझ लेते हैं, जहां से मुख्य रूप से पटाल बाजार की तुलना की जाती है। अजय दयाल, वरिष्ठ पत्रकार
माल, बाल और पटाल। हां, इसी नाम से मशहूर है उत्तराखंड का अल्मोड़ा। माल का आशय माल रोड से है, बाल से मतलब बाल मिठाई से और पटाल यानी पटाल बाजार। यहां मैं चर्चा पटाल बाजार की करने जा रहा हूं। इस बाजार में कदम रखते ही दिल-दिमाग मानो तरोताजा हो जाते हों। माहौल इस कदर रोमांचकारी है कि आंखें नहीं झपकती… कि कहीं कुछ देखने को छूट न जाए। यह पारंपरिक कुमाऊंनी शैली के घरों (पटाल यानी पत्थरों की छत) से बना हुआ ऐसा ऐतिहासिक बाजार है जहां ‘सबकुछ’ मिलता है।
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अब आप जानना चाहेंगे कि सबकुछ से क्या आशय है? किसी बाजार का वर्णन करते हुए अकसर हमने सुना हैं वहां सूई से लेकर अलमारी तक मिलती है। मतलब जीवनयापन की छोटी आवश्यकता से लेकर बड़ी जरुरतें तक पूरी होंती हैं। लेकिन पटाला बाजार के बारे में कहना चाहूंगा कि यहां जाखिया और बिच्छू घास से लेकर लेटेस्ट एआई गजेट्स तक मिलते हैं।
बिच्छू घास यानी कंडाली का साग एक पौष्टिक पत्तेदार सब्जी है, जिसे बिच्छू घास के पत्तों से बनाया जाता है। इसे उबालकर और स्थानीय मसालों का तड़का लगाकर तैयार किया जाता है। इन्हीं मसालों में से एक जाखिया है जो उत्तराखंड और भारत- नेपाल के तराई क्षेत्रों में पाया जाता है। यह एक तीखा और कुरकुरा मसाला है जिसका उपयोग कढ़ी, दालों और सब्जियों में तड़का लगाने के लिए किया जाता है।
समुद्र तल से लगभग 1,646 मीटर (लगभग 5,400 फीट) की ऊंचाई पर स्थित पटाल बाजार में घूमते हुए रोमांच का अनुभव होना स्वाभाविक है, क्योंकि न केवल यह बाजार अल्मोड़ा शहर के केंद्र में एक लंबी पहाड़ी चोटी पर स्थित है बल्कि यहां से हिमालय की शानदार सफेद दमकती चोटियां नजारे को अद्भुत कर देंती हैं।
दरअसल, अल्मोड़ा का पटाल बाजार अपनी बनावट और ऐतिहासिक महत्व के कारण न केवल भारत, बल्कि दुनिया के कुछ चुनिंदा बाजारों में गिना जाता है। इसकी तुलना अक्सर यूरोपीय देशों के 'ओल्ड टाउन' और मध्यकालीन बाजारों से की जाती है। उन अंतरराष्ट्रीय बाजारों या शहरों के बारे में भी समझ लेते हैं जहां से मुख्य रूप से पटाल बाजार की तुलना की जाती है।
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इनमें से एक स्कॉटलैंड स्थित एडिनबर्ग का रॉयल माइल है। पटाल बाजार और स्कॉटलैंड के इस बाजार में काफी समानताएं हैं। रॉयल माइल भी कोबलस्टोन (पत्थरों) से बनी एक लंबी सड़क है, जिसके दोनों ओर पुरानी इमारतें और छोटी-छोटी गलियां हैं। पटाल बाजार की तरह ही यहां का फर्श भी खास तरह के तराशे हुए पत्थरों (पटालों) से बना है।
दूसरा चेक रिपब्लिक की राजधानी प्राग का ओल्ड टाउन है। ओल्ड टाउन स्क्वायर की गलियों में भी पटाल बाजार जैसा अनुभव होता है। यहां की संकरी गलियां पत्थरों से पक्की की गई हैं। पटाल बाजार की तरह यहां भी कई पीढ़ियों पुरानी दुकानें हैं जो शहर की सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए हैं।
इसी क्रम में ऑस्ट्रिया के साल्जबर्ग में गेट्राइडेगास है। गेट्राइडेगास एक मशहूर ऐतिहासिक शॉपिंग स्ट्रीट है। पटाल बाजार की तरह यहां भी पैदल चलने वालों के लिए अलग व्यवस्था है और दुकानों के बाहर लगे पुराने स्टाइल के साइनबोर्ड और वास्तुकला इसे अल्मोड़ा के पारंपरिक स्वरूप के नजदीक लाते हैं।
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सच पूछिए तो पहाड़ी पत्थर (पटाल) से बनी पटाल बाजार की सड़क दुनिया की उन चुनिंदा सड़कों में से है जहां बारिश के बाद भी पानी नहीं रुकता और फिसलन कम होती है। देश-विदेश स्थित कई ऐतिहासिक बाजारों की तरह पटाल बाजार में भी गाड़ियों का प्रवेश वर्जित है, जिससे इसका शांत और प्राचीन स्वरूप स्थिर रहता है।
पटाल बाजार में विचरण करते हुए दुकानों से ऊपर बने घरों पर नजरें थम सी गई। यहां के पुराने घरों की खिड़कियों पर की गई नक्काशी यूरोप की विक्टोरियन या मध्यकालीन शैली की नक्काशी के समान जटिल और खूबसूरत हैं। दरअसल, पटाल बाजार का स्वरूप इसे यूरोप के मध्यकालीन 'स्ट्रीट मार्केट्स' की श्रेणी में खड़ा करता है, जहां आधुनिकता और इतिहास का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा।
वैसे भी मध्य हिमालय के काषाण पर्वत की पीठ पर बसा प्राचीन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नगर अल्मोड़ा अपनी खूबियों के लिए देश ही नहीं बल्कि विदेशों में खासा मशहूर है। इस शहर की विशिष्टताओं में एक है यहां की पटाल (पत्थर) संस्कृति। ऐसा माना जाता है कि कुमाऊं अंचल में इस कला की शुरआत कत्यूरघाटी से हुआ था, लेकिन अल्मोड़ा शहर ने इस कला को इस तरह स्वीकार किया कि यह शहर पटालों के नाम से मशहूर हो गया।
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अल्मोड़ा की बाल मिठाई के साथ ही यहां का माल रोड और यहां की पटाल बाजार इस शहर की खास पहचानों में है। पटाल संस्कृति के इस अद्भुत शहर में आज भी जहां नजर पड़ेगी वहां पटाल संस्कृति की कोई ना कोई झलक देखने को मिल जाती है। यहीं कारण है कि अल्मोड़ा में देश-विदेश से लोग घूमने के लिए आते हैं।
इतिहास टटोलें तो पाते हैं कि लगभग बारह सौ साल पहले प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा में एक ऐसी शिल्पकारी जीवंत हुई जिसे हम आज पटाल संस्कृति के नाम से जानते हैं। उस दौर में मुख्य बाजार हो या मोहल्ले मकान की ढालू छत का निर्माण पटालों से किया गया। आंगन में पटाल, प्रवेश मार्ग में पटाल, मकान की खिड़कियों व दरवाजों के ऊपर पटाल, करीब हर जगह पटाल अपनी खूबसूरती बिखेरते थे। मकान और पैदल मार्ग ही नहीं बल्कि प्राचीन मंदिर भी इन पटालों से अछूते नहीं रहे। उस दौर में ही अल्मोड़ा नगर का डेढ़ किमी लंबा आवश्यक वस्तुओं का बाजार भी पटालों से ऐसा पटा कि पटाल बाजार के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
कभी ब्रिटिश हुकूमत बनी गवाह
सदियों पुरानी पटाल बाजार ब्रिटिश हुकूमत की भी गवाह बनी। चंद राजाओं ने पटालों का भरपूर प्रयोग किया और इस संस्कृति को आगे बढ़ाने का काम किया। यही कारण रहा कि पटाल यहां के जनजीवन का अभिन्न अंग बन गए। मकान, पैदल मार्ग, मंदिर, आंगन ही नहीं बल्कि उस दौर में प्राकृतिक जल स्रोतों और नौलों के निर्माण में भी पटालों का ही उपयोग किया जाता रहा।
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शनै: शनै: समय बदला और आधुनिकता के दौर में पटालों का स्थान ईंट सीमेंट, रेता, बजरी और सरिया ने ले लिया। फिर भी, अल्मोड़ा में पटाल संस्कृति का दीदार आज भी किया जा सकता है। पटाल संस्कृति की महत्ता इतनी है कि अगर जेहन में पटालों वाले किसी शहर का नाम आए तो वह अल्मोड़ा के अलावा और कोई नहीं हो सकता।
एक वक्त था जबकि अल्मोड़ा के द्वाराहाट, बल्ढोंटी, पेटशाल, सल्ट, गंगोली, क्वारब जैसे अनेक स्थानों पर जंगलों में काफी मात्रा में पटाल पाई जाती थी। वहां से इन्हें खास तकनीक के जरिए लंबी और चौड़ी स्लेटों के रूप में निकाला जाता था। फिर इन्हीं से हर प्रकार का निर्माण कार्य किया जाता था।
पटाल शिल्पियों का दौर ही निराला था
पटाल संस्कृति के अस्तित्व में आने के बाद से ही पर्वतीय क्षेत्रों के पटाल शिल्पियों को यहां रोजगार मिला। सदियों तक यहां पटाल शिल्पियों ने अपने हुनर को इन पटालों में तराशा और यहीं कार्य उनकी कई पुश्तों के लिए रोजी रोटी का माध्यम बना। आज भले की पटाल शिल्पियों को आधुनिक तकनीक के कारण अपने इस रोजगार से किनारा करना पड़ा हो लेकिन एक दौर वह भी था कि पटाल शिल्पियों के सामने कोई और टिक नहीं सकता था।
फिलवक्त भले ही क्यों ना निर्माण कार्यों की नई तकनीक सामने आ रही हों। लेकिन पटाल की विशेषताओं का आज भी कोई जवाब नहीं है। एक्सपर्टस बताते हैं कि पहाड़ की विषम भौगोलिक परिस्थितियों में लकड़ी और पत्थर के मकान काफी उपयुक्त हैं, जिनमें पटाल का खास महत्व रहा है। क्योंकि, पटाल टिकाऊ और मजबूत होने के साथ ही हर मौसम में अनुकूल तासीर देने वाले भी होते हैं।
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भूकंप जैसी आपदा में भी अटल हैं पटाल
इतना ही नहीं, स्वास्थ्य के लिए भी पटाल लाभकारी मानें गए हैं। टूटफूट होने पर पटालों को आसानी से बदला जा सकता है। इसके साथ ही पटाल जल संरक्षण के लिए भी अनुकूल होते हैं। पटालों के जोड़ों से बरसात का पानी पहले धरती में समाता है जिससे भूमि में वाटर-रिचार्ज होता है। पटाल की सबसे बड़ी खूबी यह भी है कि भूकंप जैसी आपदा में पटाल भवनों को मजबूती भी प्रदान करती है।
नगर के मल्ला जोशी खोला, चीनाखान, तल्ला जोशी खोला, पांडेखोला, दुगालखोला, तल्ला मल्ला दन्या, डुबकिया, चौंसार, कर्नाटकखोला, गुरुरानीखोला, बख्शीखोला आदि मोहल्लों में पुरानी शैली के पटाल के भवन इस संस्कृति को संजो कर रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं।
बहरहाल, पहाड़ की अद्भुत पटाल संस्कृति इस कदर निराली है कि आज भी अल्मोड़ा कई क्षेत्रों में पटाल से बने ढाई सौ साल पुराने भवन तमाम संयुक्त परिवारों की एकजुटता के गवाह बने हुए हैं। भले ही नगर का अधिकांश इलाका कंक्रीट के जंगलों सा होता जा रहा हो लेकिन, पटान से बने भवनों का आकर्षण आज भी जस का तस है।
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बाल मिठाई का इतिहास और विशेषताएं
अल्मोड़ा जिला अपनी खूबसूरत पहाड़ियों और ठंडी आबोहवा के लिए मशहूर है, लेकिन इन सबसे अलग है यहां की बाल मिठाई जिसने इसे पूरे भारत में पहचान दिलाई है। बाल मिठाई का उद्भव वर्ष 1856 में उत्तराखंड के अल्मोड़ा में हुआ माना जाता है, जिसे जोग लाल साह ने तैयार किया था। उस दौर में अल्मोड़ा ब्रिटिश शासन के अधीन था और यहां बड़ी संख्या में सैनिक तैनात रहते थे। माना जाता है कि इस मिठाई को शुरुआत में सैनिकों के लिए बनाया गया, क्योंकि पहाड़ों में उपलब्ध शुद्ध दूध से तैयार खोया लंबे समय तक सुरक्षित रह सकता था। धीरे-धीरे इसका अनोखा स्वाद लोगों को भाने लगा और यह आम जनमानस में भी लोकप्रिय हो गई। बाल मिठाई की सबसे प्रमुख विशेषता इसकी पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया है।
