‘ड्रैगन’ के दबाव में क्यों आए ‘अंकल सैम'

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Published By Deepak Mishra
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रूस के राष्ट्रपति इसी माह चीन के दौरे पर आ रहे हैं। इस दौरान दोनों देशों के बीच कई अहम समझौते होंगे। जो डोनाल्ड ट्रंप को चीन की तरफ से बड़ा जवाब होगा।

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नवीन गुप्ता, बरेली

 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन के दौरे से वापस जा चुके हैं। इस दौरे से अमेरिका को बड़ी उम्मीदें थीं। ट्रंप को लगा था कि वह चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को ईरान के विरुद्ध राजी कर लेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। चीन को रूस से दूर ले जाने की उनकी कोशिश भी नाकामयाब हो गई। रूस के राष्ट्रपति इसी माह चीन के दौरे पर आ रहे हैं। इस दौरान दोनों देशों के बीच कई अहम समझौते होंगे। जो डोनाल्ड ट्रंप को चीन की तरफ से बड़ा जवाब होगा। हां, ट्रंप के इस दौरे से एक बात तो स्पष्ट रूप से साफ हो गई कि अमेरिका अब चीन के आगे न सिर्फ झुकने के लिए तैयार है, बल्कि कुछ मुद्दों पर उसकी हां में हां मिलाने को तैयार है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ताइवान की सुरक्षा का मुद्दा। चीन ने ताइवान का साथ देने पर अमेरिकी राष्ट्रपति को आंखें क्या दिखाईं, ट्रंप ने तत्काल बयान दे दिया कि वे ताइवान को आजाद होता नहीं देखना चाहते। उनके इस बयान से चीन तो खुश हो गया, लेकिन अमेरिका के खास दोस्त जापान भी ताइवान के साथ मायूस हुआ है, हालांकि ताइवान के राष्ट्रपति ने अपने चिरपरिचत अंदाज में ट्रंप और जिनपिंग को यह बता दिया कि उन्हें अमेरिकी समर्थन की जरूरत नहीं है, क्योंकि उनका देश पहले से ही संप्रभु राष्ट्र है और रहेगा। 

ट्रंप के दौरे ने पूरी दुनिया को यह बता दिया कि अब अमेरिकी पहल पर गठित किए गए चार देशों के समूह क्वाड का अस्तित्व मिटने वाला है। साथ ही अमेरिका को अब भारत की जरूरत बहुत ज्यादा नहीं रह गई है। पहले अमेरिका चीन को दबाने के लिए भारत की हर स्तर पर सहायता करता था, लेकिन अब उसे प्रतिद्वंद्वी के रूप में देख रहा है, ऐसे में भारत को झुकाने में पूरी ऊर्जा लगाने में जुटा हुआ है।

एक दौर था तब चीन को अमेरिका अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानता था और उसकी सभी सरकारें चीन के खिलाफ भारत को विकल्प के रूप में तैयार करतीं थीं, इसीलिए चीन के मुकाबले अमेरिका भारत को मजबूत आर्थिक ताकत बनाने में मदद कर रहा था। भारत जितना सामरिक और व्यापारिक रूप से मजबूत होता, चीन का दबदबा उतना ही कम होता, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने अब अमेरिका की कूटनीति को बदल दिया है। उनका लक्ष्य चीन को नहीं, बल्कि भारत को रोकना है, ताकि वह आर्थिक रूप से समृद्ध राष्ट्र न बन सके और चीन की तरह उसके मुकाबले न खड़ा हो पाए। 

अमेरिकी नीति में आए बदलाव को भारत की कूटनीति के लिए किसी झटके से कम नहीं माना जाना चाहिए। साथ ही इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि अमेरिका अब भी चीन के मुकाबले उसे मजबूत करेगा। अमेरिका ने पहले चीन के लिए अपने बाजार को खोले रखा। उसकी व्यापार नीति का समर्थन किया। परिणाम स्वरूप चीन पूरी दुनिया में व्यापारिक रूप से मजबूत हो गया, तो अमेरिका को समझ में आया कि उसने अपने लिए ही गड्ढा खोद लिया, इसलिए उसने भारत को आगे बढ़ाने की कोशिश की पर अब खुद ही कह रहा है कि वह भारत को प्रतिद्वद्वी के रूप में खड़ा होते हुए नहीं देखना चाहता है। 

अमेरिकी नीति को भारत समझ चुका है, इसीलिए वह दुनिया के तमाम देशों और संगठनों के साथ मुक्त व्यापार समझौते कर रहा है, लेकिन भारत के लिए एक मुश्किल खड़ी होने जा रही है, वह है अमेरिका और चीन द्वारा जी-2 के रूप में बनाया जा रहा गठजोड़। अमेरिका चाहता है कि संयुक्त राष्ट्र हो या अन्य कोई मंच, जो भी फैसले लेने हों, दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियां चीन और अमेरिका ही मिलकर लें। 

ट्रंप की इस कोशिश पर निगाह तो पूरी दुनिया की है। अब देखना है कि उनके द्वारा फेंके गए इस जाल में चीन कितना फंसता है, इसीलिए ट्रंप ने टकराव का रास्ता छोड़कर चीन को महाशक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया है। वह चाहते हैं कि ईरान के मुद्दे पर चीन पूरी तरह चुप्पी साध ले। चीन और अमेरिका की बढ़ती नजदीकी भारत के लिए बहुत अच्छा नहीं होगा, क्योंकि चीन तो पहले से ही पाकिस्तान की हर क्षेत्र में मदद कर रहा है और अमेरिका भी पाकिस्तान को शह  दे रहा है। रूस भी धीरे-धीरे पाकिस्तान के करीब जा रहा है। 

ऐसे में भारत के लिए फिलहाल अपनी कूटनीति को और धार देनी होगी। उधर, 19 से 20 मई तक रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चीन आ रहे हैं। चीन के साथ रूस कई अहम समझौते करने वाला है। अब देखना यह है कि ट्रंप चीन पर जो प्रभाव छोड़ गए हैं, जी-2 का उनके द्वारा दिए गए प्रस्ताव पर वे कितना पानी फेर पाते हैं। दोनों देशों के बीच अमेरिका-ईरान तनाव, यूक्रेन युद्ध और ताइवान विवाद जैसे बड़े भू-राजनीतिक मुद्दों पर यहां चर्चा होगी। 

चूंकि ट्रंप ने खुद ही चीन के दबाव में ताइवान को आजादी का एलान न करने की चेतावनी दे दी है, ऐसे में चीन, रूसी राष्ट्रपति से भी चाहेगा कि वे ताइवान के मुद्दे पर खुलकर उसके साथ बयान दें, ताकि वह भविष्य में ताइवान को अपने में मिला सके। पुतिन का यह दौरा चीन-रूस मैत्री संधि की 25वीं सालगिरह पर होने जा रहा है। ऐसे में पुतिन भी जिनपिंग को खुश करने के लिए कुछ बड़ी घोषणाएं कर सकते हैं। 

अब बात करें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की भागीदारी वाले समूह क्वाड की, तो अब अमेरिका चीनी दबाव में इसे निष्प्रभावी करने पर उतारू हो गया है। इसका लाभ चीन को मिलेगा, क्योंकि वह नहीं चाहता कि उसके मुकाबले के लिए यह संगठन मजबूत हो। जापान पर वह पहले से ही आंखें तरेर रहा है और युद्ध की धमकी देता रहा है। रही बात भारत की तो वह पाकिस्तान का साथ देकर उसे कमजोर करने की भरपूर कोशिश कर ही रहा है। देखना होगा कि पुतिन भारत के लिए चीन में कितनी जमीन तैयार करते हैं।

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