अपील उत्तराखंड के लिए चुनौती तो अवसर भी

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Published By Deepak Mishra
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होर्मुज संकट से जुड़ी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देशवासियों से बचत की अपील पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के लिए पहाड़ सी चुनौती तो है, लेकिन इसे अवसर कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

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अमित शर्मा, हल्द्वानी

 

वैश्विक रूप से होर्मुज संकट से जुड़ी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देशवासियों से बचत की अपील पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के लिए पहाड़ सी चुनौती तो है, लेकिन इसे सुनहरा अवसर कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। कोरोना काल से जिस तरह से उत्तराखंड ने अपने आपको साबित किया, उसी तरह से पूरी उम्मीद है कि यदि वक्त की नजाकत को समझते हुए स्मार्ट बचत में समझदारी और मितव्ययिता के साथ आत्मनिर्भरता की कसौटी पर खुद को कसा जाएगा, तो उन पर खरा उतरते हुए इन चुनौतियों से भी पार पा लिया जाएगा।

पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध छिड़ने से गहराए वैश्विक ऊर्जा संकट से कोई भी अनजान नहीं होगा। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य बंद करने से दुनिया के 20 प्रतिशत तेल व्यापार पर असर पड़ा है, हालांकि भारत की स्थितियां काफी अलग हैं और भारत अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। कच्चे तेल के दामों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। कॉमर्शियल सिलेंडरों के दामों में पहले तो हाल ही में पेट्रोल-डीजल के रेट बढ़े हैं। वैश्विक संकट को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने देश के सामने सात सूत्रीय बचत का खाका रखने के साथ ही बड़ी बातें कहीं कि यह ‘राष्ट्र प्रथम’ का नैतिक परीक्षण है। 

देशवासियों से की गई अपील में प्रधानमंत्री ने बचत के कई बड़े उपायों पर जोर दिया। ईंधन बचत के लिए आवश्यकतानुसार वर्क फ्रॉम होम, वर्चुअल मीटिंग, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, कार पूलिंग जैसे विकल्प सुझाए, तो विदेशी मुद्रा बचाने के लिए एक साल तक विदेश यात्रा और डेस्टिनेशन वेडिंग टालने और सोना न खरीदने की अपील की। बता दें कि सोना न खरीदने की अपील इसलिए की, क्योंकि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना आयातक है। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने जेब के साथ स्वास्थ्य की रक्षा के उपायों में खाद्य तेल खपत 50 फीसदी घटाने को भी कहा। 

प्राकृतिक खेती के लिए रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करने पर जोर दिया, तो स्वदेशी अपनाने पर ज्यादा फोकस करते हुए मेक इन इंडिया, रोजमर्रा के सामान में भारतीय ब्रांड, ईवी और सोलर, जबकि डीजल पंप की जगह सोलर पंप अपनाने पर जोर दिया। सीधे तौर पर प्रधानमंत्री ने इसे ‘दशक की आपदाओं’ का दौर बताया। पहले कोरोना, फिर युद्ध और अब ऊर्जा संकट। 

अब बड़ा सवाल है कि इन चुनौतीपूर्ण हालात में उत्तराखंड में हालात कैसे बदलेंगे, तो बता दें कि उत्तराखंड भौगोलिक और आर्थिक रूप से बेहद संवेदनशील है। वर्ष 2025 में हिमालय में 10 बड़ी आपदाओं से 12 लाख लोग प्रभावित हुए, लेकिन पहाड़ और न कभी पहाड़वासी झुके हैं और हर संकट का सामना साहस से किया है। अनुमानित तौर पर देखा जाए, तो ऐसे हालातों में पहाड़ी राज्य में डीजल-पेट्रोल महंगा होने से सब्जी, अनाज, निर्माण सामग्री महंगी होगी, तो पर्यटन सीजन में टैक्सी-होटल का भी खर्च बढ़ेगा। 

कॉमर्शियल एलपीजी और यूरिया की कीमत बढ़ने से लागत बढ़ेगी। किसान प्रभावित हो सकते हैं। कुमाऊं-गढ़वाल में शादियों में सोना अहम माना जाता है। खरीद टालने से सर्राफा बाजार और कारीगरों पर असर पड़ सकता है, तो वर्क फ्रॉम होम से वीकेंड टूरिज्म में कमी आ सकती है, हालांकि नकारात्मकता के साथ इसका सकारात्मक अवसर पहाड़ की लोकल इकोनॉमी को बूस्ट करेगा। 'वोकल फॉर लोकल' से ऊनी शॉल, अचार, बुरांश जूस, जैविक उत्पादों की मांग बढ़ेगी। ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में सोलर रूफटॉप और पीएनजी कनेक्शन से पहाड़ों में एलपीजी पर निर्भरता घटेगी। डिजिटल इकोनॉमी में वर्क फ्रॉम होम से देहरादून, हल्द्वानी में आईटी प्रोफेशनल रुकेंगे तो लोकल खर्च बढ़ेगा। 

ऐसे हालातों में उत्तराखंड को एक बार फिर से अपने आपको साबित करने की जरूरत है। हमें सरकारी स्तर पर ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ानी होगी। पीएम सूर्य घर योजना के तहत हर सरकारी भवन, स्कूल, पंचायत में सोलर माइक्रो हाइड्रो और सोलर हाइब्रिड प्रोजेक्ट लगाने होंगे और बांधों पर निर्भरता घटानी होगी। एलपीजी पर निर्भरता कम करते हुए पीएनजी नेटवर्क को बढ़ाना होगा। कृषि क्षेत्र में जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग को अपनाना होगा, तो रासायनिक खाद आयात घटाना होगा। राज्य सरकार को मोटा अनाज जैसे मंडुआ-झंगोरा को एमएसपी पर खरीद और खाद्य तेल की खपत घटाने के लिए प्रमोशन करना होगा।  

उत्तराखंड का पारंपरिक भोजन सादा, पौष्टिक और स्थानीय अनाजों (मडुआ, झंगोरा, गहत) से भरपूर होता है। काफुली, आलू के गुटके, झंगोरे की खीर, फाणू, चेनसू, भांग की चटनी, मंडवे की रोटी, बाड़ी, भट्ट की चुड़कानी, अरसा जैसे उत्तराखंड के पारंपरिक भोजन किसी से कम नहीं हैं। कोल्ड स्टोरेज चेन बनानी होगी, ताकि फल और सब्जियां सस्ते में स्थानीय बाजारों में बिके और मंडी तक डीजल खर्च घटे। अच्छी बात है कि राज्य सरकार आपदा और आर्थिक सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने के साथ ही ईंधन-खाद्य बफर स्टॉक जैसे उपाय अपना रही है, हालांकि राज्य में इस समय सबसे बड़ी जरूरत इलेक्ट्रिक बसों की भी है, जिसके बेड़े को प्राथमिकता के साथ बढ़ाना होगा। 

डीजल की खपत रोकने के लिए पहाड़ों पर रोपवे नेटवर्क बढ़ाना होगा, तो सरकारी कर्मचारियों के लिए वर्क फ्रॉम होम रोटेशन लागू करना होगा। अपना उत्तराखंड विश्व के किसी भी पर्यटन स्थल से कमतर नहीं है, इसलिए अपने ही राज्य के पर्यटन-धार्मिक स्थलों को प्रमोट करने के लिए देश-दुनिया के लोगों का ध्यान खींचना होगा और इसके लिए नई योजना-नए उपाय अपनाने होंगे। 

केंद्र और राज्य सरकार तो अपने स्तर से जो करना है, कर रही है और करती भी रहेगी, लेकिन हमें भी प्रधानमंत्री की सात सूत्रीय अपील को औपचारिक रूप से नहीं बल्कि व्यवहार में ढालते हुए अपनाना होगा। 'आत्मनिर्भर और सशक्त उत्तराखंड' के लिए सोलर उपकरणों के साथ ही प्राकृतिक खेती की तरफ लौटना होगा। डिजिटल उपायों पर फोकस करना होगा। पहाड़ी कला, उत्पादों और खान-पान को बढ़ावा देना होगा। विवाह समारोहों में अनाश्वयक खर्च से बचना होगा। 

'बूंद-बूंद से सागर भरता है' की तरह, जब तक हम 'स्मार्ट बचत' के उपाय अपनाते हुए व्यक्तिगत रूप से आवश्यक खर्चों में मितव्ययिता नहीं लाएंगे, काम नहीं चलेगा। जब देश संकट में हो तो किंतु-परंतु में पड़ने के बजाय अपने आपको आर्थिक रूप से मजबूत रखने के उपायों पर ध्यान देना होगा, क्योंकि वर्तमान चुनौतियों के साथ आने वाला समय आपदा का है। ऐसे में हमें हर पहलू पर गंभीरता से विचार करते हुए अपने आने वाले कल को संवारना होगा।

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