प्रसंगवश : गुम होते भारतीय संस्कृति के हिस्सा रहे प्याऊ
गर्मियों की भीषण तपिश से इन दिनों पूरा उत्तर भारत झुलस रहा है। सच तो यह है कि प्रचंड गर्मी ने जनजीवन को बेहाल कर दिया है। वास्तव में ऐसे मौसम में मनुष्य को भोजन से अधिक पानी की आवश्यकता होती है, किंतु विडंबना यह है कि आज वही पानी बोतलों में कैद होकर बाज़ार की वस्तु बन गया है। प्राचीन भारत में जगह-जगह पानी का प्याऊ लगाना केवल सेवा नहीं, बल्कि लोकधर्म और पुण्य का कार्य माना जाता था।
राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में आज भी कहीं-कहीं यह परंपरा जीवित दिखाई देती है, जहां गंगासागर-अर्थात पीतल या तांबे के नलनुमा पात्र से राहगीरों, पथिकों और थके-हारे यात्रियों को प्रेमपूर्वक पानी पिलाया जाता है। गांवों में खेतों के किनारे पशुओं के लिए ‘खेली’ बनाई जाती थी, कुएं, कुंड और परंपरागत जल-स्रोतों की व्यवस्था रहती थी, किंतु अब ये दृश्य विरले ही दिखाई देते हैं। सच तो यह है कि प्यास बुझाने को पुण्य मानने वाली भारतीय संस्कृति धीरे-धीरे स्मृतियों में सिमटती जा रही है।
भारतीय परंपरा में ‘प्याऊ’ अथवा ‘प्रपा’ सामाजिक संवेदना और मानवीय करुणा का प्रतीक रही है। भीषण गर्मी में राहगीरों और जरूरतमंदों को निःशुल्क शीतल जल उपलब्ध कराना सदियों पुरानी परोपकारी परंपरा थी। भारतीय शास्त्रों विशेषकर भविष्योत्तर पुराण और स्कंद पुराण में ‘प्रपा दान’ अर्थात जलदान को स्वर्णदान और गोदान के समान पुण्यदायी बताया गया है। इसे कई स्थानों पर ‘पौशाला’ भी कहा जाता था। राजा, सेठ-साहूकार, व्यापारी तथा सामान्य लोग चौराहों, बाज़ारों और मार्गों पर प्याऊ लगवाते थे।
बुजुर्ग बताते हैं कि कहीं राहगीरों को पानी के साथ गुड़, बताशे या भुने चने भी प्रेमपूर्वक दिए जाते थे। वास्तव में भारतीय संस्कृति में यह परंपरा केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं थी। लोग अपने घरों की छतों पर पक्षियों के लिए मिट्टी के सकोरे रखते थे और पेड़ों के नीचे पशुओं के लिए पानी के पात्र भरकर रखते थे। जल-संरक्षण और जीवों के प्रति करुणा भारतीय जीवनशैली का स्वाभाविक हिस्सा थी।
इतना ही नहीं, कई स्थानों पर प्याऊ पर पानी पिलाने के लिए विधवा महिलाओं अथवा जरूरतमंद लोगों को नियुक्त किया जाता था और उन्हें सम्मानपूर्वक मानदेय भी दिया जाता था। इस प्रकार से प्याऊ सेवा, संवेदना और रोजगार तीनों का माध्यम थी। आज भी कहीं-कहीं रेलवे स्टेशनों पर हमें प्याऊ देखने को मिल जाते हैं।
सदियों से उत्तर भारत में बैसाख और जेठ के महीनों में राहगीरों की प्यास बुझाने के लिए जल-प्याऊ लगाई जाती रही हैं। लोग स्वयं खड़े होकर राह चलते व्यक्तियों को ठंडा पानी या शर्बत पिलाते थे, क्योंकि भारतीय संस्कृति में प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ा पुण्य माना गया है। एक समय था, जब शहरों में लगभग हर एक-दो किलोमीटर पर पेड़ों की छांव में पानी से भरे मिट्टी के घड़े रखे दिखाई देते थे। राहगीर स्वयं पानी निकालकर पीते और अपनी प्यास बुझाते थे।
विडंबना यह भी है कि जो देश कभी प्यासे को पानी पिलाने को सबसे बड़ा पुण्य मानता था, वही आज गंभीर जल संकट की ओर बढ़ रहा है। आज के समय में भूजल स्तर निरंतर नीचे जा रहा है। अनेक बड़े शहर गर्मियों में ‘डे-जीरो’ जैसी भयावह चेतावनियों का सामना कर रहे हैं। यह हमारे समय का सबसे बड़ा विरोधाभास है कि सामाजिक रूप से पानी का संकट गहराता जा रहा है, जबकि व्यावसायिक रूप से पानी हर जगह उपलब्ध है। पानी अब सेवा नहीं, व्यापार बनता जा रहा है। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
