अलनीनो का प्रभाव और भारत के पास व्यवस्था

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
On

अलनीनो से मानसून कमजोर पड़ता है और कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। इसका सीधा असर खाद्यान्न उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

14
सौरभ वार्ष्णेय, वरिष्ठ पत्रकार

 

दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच अलनीनो एक बार फिर भारत के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य वृद्धि से उत्पन्न होने वाली यह मौसमी घटना भारतीय मानसून को सीधे प्रभावित करती है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मानसून की थोड़ी-सी गड़बड़ी भी खेती, अर्थव्यवस्था, जल संकट और महंगाई पर व्यापक असर डालती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि अलनीनो का प्रभाव गहराता है, तो भारत के पास इससे निपटने के लिए क्या इंतजाम हैं?

भारत का लगभग आधा कृषि क्षेत्र आज भी वर्षा पर निर्भर है। अलनीनो के कारण मानसून कमजोर पड़ता है, वर्षा कम होती है और कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। इसका सीधा असर किसानों की आय, खाद्यान्न उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यही नहीं, बिजली उत्पादन, पेयजल आपूर्ति और उद्योग भी प्रभावित होते हैं, इसलिए अलनीनो केवल मौसम की समस्या नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक चुनौती भी है।

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। भारतीय मौसम विभाग अब पहले की तुलना में अधिक सटीक और समय रहते मौसम पूर्वानुमान जारी कर रहा है। उपग्रह तकनीक और आधुनिक वैज्ञानिक प्रणालियों के जरिए सरकार मानसून की स्थिति पर लगातार नजर रखती है।

इससे राज्यों और किसानों को पहले से तैयारी करने में मदद मिलती है। कृषि क्षेत्र में भी बदलाव की कोशिशें की जा रही हैं। सरकार सूखा-रोधी बीजों को बढ़ावा दे रही है तथा किसानों को कम पानी वाली फसलों की ओर प्रेरित किया जा रहा है। जल संरक्षण की दिशा में भी कई प्रयास हो रहे हैं।

‘जल शक्ति अभियान, तालाबों के पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन और भूजल संरक्षण जैसे कार्यक्रमों पर सरकार विशेष ध्यान दे रही है। कई राज्यों ने स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन को मजबूत करने के लिए सामुदायिक भागीदारी भी बढ़ाई है। यह समझना जरूरी है कि भविष्य में जल ही सबसे बड़ी चुनौती बनने वाला है। 

आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधाएं सीमित हैं। जल संरक्षण योजनाएं कागजों से आगे नहीं बढ़ पातीं। किसानों तक समय पर सही जानकारी पहुंचाने में भी कई बार कमी दिखाई देती है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जलवायु परिवर्तन अब पहले से अधिक अनिश्चित और गंभीर होता जा रहा है।

अलनीनो जैसी प्राकृतिक घटनाएं हमें यह संदेश देती हैं कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए बिना भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता। भारत को केवल राहत योजनाओं पर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति पर ध्यान देना होगा। जल संरक्षण, वैज्ञानिक खेती, हरित ऊर्जा और पर्यावरण सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना समय की मांग है।

यदि केंद्र और राज्य सरकारें, वैज्ञानिक संस्थान, किसान और आम नागरिक मिलकर जिम्मेदारी निभाएं, तो भारत अलनीनो जैसी चुनौतियों का मुकाबला मजबूती से कर सकता है। संकट बड़ा है, लेकिन तैयारी और सामूहिक प्रयास उससे भी बड़े हो सकते हैं। विश्व मौसम व्यवस्था में होने वाले बदलावों का सबसे अधिक असर कृषि पर पड़ता है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मानसून केवल मौसम नहीं, बल्कि करोड़ों किसानों की आजीविका और देश की खाद्य सुरक्षा का आधार है। ऐसे में जब प्रशांत महासागर में समुद्री तापमान बढ़ने से ‘अलनीनो’ की स्थिति बनती है, तब उसका सीधा प्रभाव भारतीय मानसून और फसलों पर दिखाई देता है। यही कारण है कि अलनीनो को भारतीय कृषि के लिए एक गंभीर चेतावनी माना जाता है।

अलनीनो के दौरान सामान्यत: भारत में वर्षा कम होती है। मानसून कमजोर पड़ने से खेतों में पानी की कमी हो जाती है और खरीफ फसलें सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। धान, मक्का, सोयाबीन, दालें और गन्ना जैसी फसलें पर्याप्त वर्षा पर निर्भर रहती हैं। जब समय पर बारिश नहीं होती, तब बुआई में देरी होती है, उत्पादन घटता है और किसानों की लागत बढ़ जाती है।

कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। धान की खेती पर अलनीनो का प्रभाव विशेष रूप से गंभीर माना जाता है। धान को अधिक पानी की आवश्यकता होती है, लेकिन वर्षा कम होने पर खेत सूखने लगते हैं और उत्पादन में भारी गिरावट आती है। इसी प्रकार दालों और तिलहन की फसलें भी कमजोर मानसून से प्रभावित होती हैं। पशुपालन पर भी इसका असर पड़ता है, क्योंकि चारे की उपलब्धता कम हो जाती है। 

अलनीनो केवल खेती तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। जब कृषि उत्पादन घटता है तो खाद्यान्न की कीमतें बढ़ने लगती हैं। इससे महंगाई बढ़ती है और आम जनता पर आर्थिक बोझ पड़ता है। किसानों की आय घटने से ग्रामीण बाजारों की क्रय शक्ति भी कमजोर होती है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

 

 

संबंधित समाचार