गिरता रुपया : चेतावनी या अवसर

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Published By Deepak Mishra
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कमजोर रुपया आयात को महंगा बनाकर महंगाई का दबाव बढ़ाता है, वहीं दूसरी ओर यह निर्यात और विदेशी निवेश के कुछ क्षेत्रों को लाभ भी पहुंचा सकता है।

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भारतीय रुपया देश की आर्थिक स्थिति का सबसे महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। हाल के वर्षों में डॉलर के मुकाबले रुपये में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। लगातार गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता और अवसर दोनों का संकेत है। एक ओर कमजोर रुपया आयात को महंगा बनाकर महंगाई का दबाव बढ़ाता है, वहीं दूसरी ओर यह निर्यात और विदेशी निवेश के कुछ क्षेत्रों को लाभ भी पहुंचा सकता है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतें, भू-राजनीतिक तनाव और विदेशी पूंजी के प्रवाह जैसे कई कारक रुपये की चाल को प्रभावित करते हैं। ऐसे समय में रुपये की गिरावट केवल मुद्रा का सवाल नहीं, बल्कि आम आदमी की जेब से लेकर देश की आर्थिक दिशा तक जुड़ा विषय बन जाती है।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था के मजबूत होने और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि किए जाने से डॉलर मजबूत होता है। जब डॉलर मजबूत होता है, तो भारतीय रुपया स्वतः कमजोर पड़ जाता है। भारत कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं और कई आवश्यक उत्पादों के लिए आयात पर निर्भर है। जब आयात अधिक और निर्यात कम होता है, तब व्यापार घाटा बढ़ता है। अधिक डॉलर की मांग के कारण रुपये पर दबाव बढ़ता है। इन दिनों कच्चे तेल और गैस के आयात पर भारत को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है। 

जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालकर सुरक्षित बाजारों की ओर जाते हैं, तब डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपया कमजोर हो जाता है। राजनीतिक अस्थिरता या वैश्विक आर्थिक संकट भी इसका कारण बनते हैं। पिछले एक महीने से अधिक समय से विदेशी निवेशकों ने शेयर बाजार में लिवाली कम और बिकवाली अधिक की है। यदि किसी देश में महंगाई अधिक हो और आर्थिक विकास की गति धीमी हो, तो उसकी मुद्रा कमजोर पड़ती है। देश के अंदर बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी जैसी समस्याएं भी रुपये की गिरावट में योगदान देती हैं।

रुपये के कमजोर होने से आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं, विशेषकर पेट्रोलियम उत्पाद। इसका असर परिवहन, खाद्य पदार्थों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर पड़ता है, जिससे महंगाई बढ़ती है। वर्तमान में सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों का घाटा यानी अंडर रिकवरी प्रतिदिन करीब 750 करोड़ रुपये है। इससे उबरने के लिए सरकार ने धीरे-धीरे पेट्रोल, डीजल और सीएनजी के दाम बढ़ाने शुरू किए हैं। इसके अतिरिक्त पहले ही सरकार ने कामर्शियल गैस सिलेंडर पर भी करीब 50 फीसदी की मूल्य वृद्धि की थी।

कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ जाती है। इससे कंपनियों का मुनाफा कम हो सकता है। इसके अलावा अगर आम लोगों की बात करें, तो विदेश में पढ़ाई, यात्रा या इलाज कराने वाले लोगों को अधिक खर्च करना पड़ता है। साथ ही घरेलू बाजार में वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से आम नागरिक की क्रय शक्ति घटती है। रुपये की इस गिरावट का एकमात्र सकारात्मक पक्ष ये है कि कमजोर रुपया भारतीय निर्यातकों के लिए कुछ हद तक लाभकारी होता है, क्योंकि विदेशी खरीदारों को भारतीय वस्तुएं सस्ती पड़ती हैं। इससे निर्यात बढ़ने की संभावना रहती है। सरकार लगातार आयात को अवरुद्ध कर रही है। सोना और चांदी के आयात को प्रतिबंधित किया है, वहीं लोगों से वे सभी कदम उठाने की अपील की है, जिनसे विदेशी मुद्रा का खर्च रोका जा सके। जनता को चाहिए कि सरकार का सहयोग करे। इसके अलावा भारतीय उत्पादों की वैश्विक बाजार में मांग बढ़ने के लिए भी काम करना चाहिए। 

स्थिर नीतियां, बेहतर व्यापारिक माहौल और पारदर्शी व्यवस्था विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ा सकती हैं। इससे विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा। इसके अलावा स्वदेशी उत्पादों के उपयोग पर अधिक फोकस किया जाना चाहिए। इससे भी विदेशी मुद्रा की बचत होगी और रुपया मजबूत होगा। भारत का केंद्रीय बैंक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को महंगाई नियंत्रित करने और विदेशी मुद्रा बाजार में संतुलन बनाए रखने के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए। 

इस प्रकार देखें तो भारतीय रुपये में गिरावट एक गंभीर आर्थिक चुनौती है, जिसका प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था और आम नागरिक दोनों पर पड़ता है, हालांकि इसके कुछ लाभ हैं, लेकिन निरंतर गिरावट दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक हो सकती है, इसलिए सरकार रिजर्व बैंक और उद्योग जगत को मिलकर ऐसी नीतियां अपनानी होंगी, जो रुपये को स्थिर और मजबूत बना सकें। मजबूत रुपया न केवल आर्थिक स्थिरता का प्रतीक है, बल्कि यह देश की वैश्विक साख को भी बढ़ाता है। साथ ही हम नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि सरकार का सहयोग करते हुए विदेश यात्राओं, सोना-चांदी खरीद, पेट्रोल-डीजल के व्यय को यथासंभव न्यूनतम कर दें, जिससे आयात कम से कम हो और विदेशी मुद्रा बच सके। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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