माड़िया चित्रों में बदलता बस्तर
यह एक बहुत ही विचित्र एवं रोचक प्रश्न है की क्या नक्सलवाद किसी क्षेत्र की आदिवासी कला पर कोई प्रभाव डाल सकता है, लेकिन यह हुआ है, वर्षों तक नक्सल गतिविधियों ग्रस्त छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के माड़िया आदिवासियों की चित्रकला पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ा है। सन 1980 के दशक के उपरांत उनके पारंपरिक चित्रों में, बस्तर में नक्सल गतिविधियों से उत्पन्न परिवर्तनों का गहरा प्रभाव पड़ा है।
पिस्तौल, बंदूक, पुलिस के ट्रक-जीप, हेलीकाप्टर जैसे मोटिफ जिनका माडिया पारंपरिक चित्रों में कोई स्थान नहीं था, अब वे प्रमुखता से चित्रित किए जा रहे हैं। पुलिस-फ़ौज और उनके वाहन, हथियार यहां के आदिवासी सामाजिक जीवन में इतने घुल-मिल गए हैं की अब वे उनके मिथकीय विश्वासों ओर कल्पनाओं में भी स्थान बना चुके हैं, जिसका प्रभाव उनके बनाए अनुष्ठानिक चित्रों में भी दिखने लगा है।
बस्तर की माड़िया जनजाति मूलतः बृहद गोंड जनजाति की ही एक शाखा है। बस्तर का यह सबसे आदिम जनजातीय समुदाय बीहड़ वनों एवं पर्वतीय क्षेत्र अबूझमाड़ में रहता है। माड़िया जनजाति मुख्यतः दो समूहों में विभक्त है,अबूझमाड़िया अथवा हिल माड़िया जिन्हें गौरसींघ माड़िया या बाइसन हॉर्न माड़िया भी कहा जाता है। दूसरा समूह है दण्डामी माड़िया। माड़िया जनजाति के लोग अपने पूर्वजों की स्मृति में पत्थर अथवा लकड़ी के बने मृतक स्तम्भ स्थापित करते हैं। इन्हें उरूसकाल, उरुसगाता एवं मट्ठ भी कहा जाता है। जब यह स्मृति स्तंभ, पत्थर की शिला से बनाते हैं तब यह उरूसकाल कहलाता है, जब इसे लकड़ी का बनाते है तब इसे खंब कहते हैं, परंतु जब इसे पत्थर, ईंट, सीमेंट आदि से छोटे मंदिर जैसा बनाते हैं तब इसे मट्ठ कहा जाता है।
आमतौर पर यदि माड़िया परिवार की आर्थिक हालत अच्छी नहीं होती तो वह यादगार के लिए यह सब नहीं बनवाता किन्तु यदि वह थोड़ा भी संपन्न है तो यह कार्य अवश्य करवाता है। आरंभ में वे एक अनघढ़ शिलाखंड को सीधा खड़ा किया करते थे। बस्तर के बैलाडीला जानेवाले रास्ते में सदियों पुराने इस प्रकार के विशाल माड़िया मृतक शिलाखंड देखे जा सकते हैं। बाद में वे इसे लकड़ी का बनाने लगे और इस पर अनेक आकृतियां उत्कीर्ण करवाने लगे। वन विभाग द्वारा जंगल के वृक्षों को काटना प्रतिबंधित करने पर लकड़ी मिलने में कठिनाई होने लगी, इस कारण सन 1970 के दशक में यह मृतक स्तंभ समतल सतह वाली आयताकार पतली प्रस्तर शिला से बनाया जाने लगा।
कुछ लोग इसे सीमेंट कंक्रीट से भी बनाने लगे। तदोपरांत इस प्रस्तर शिला पर चमकीले रंगों से चित्रकारी की जाने लगी। जगदलपुर से चित्रकोट जाने वाले रास्ते तथा जगदलपुर से गीदम-किलेपाल जाने वाले रास्ते के दोनों ओर बहुत उरूसकाल लाइन में खड़े दिखते हैं। इनमें से कुछ सादा पत्थर शिला से बने हैं, कुछ में शिलाओं के शीर्ष पर चिड़िया या कलश बने हुए हैं, कुछ पर लोहे से बने त्रिशूल लगे हैं, कुछ को पत्थर और लकड़ी से मिलाकर बनाया गया है। अनेक ईंट, पत्थर, सीमेंट-कंक्रीट से मंदिरनुमा बने गए हैं, इन पर उभारदार आकृतियां भी निरूपित की गई हैं। अनेकों पर चूने के रंगों अथवा आइलपेंट से चित्र बनाए गए हैं। प्रत्येक पर मृतक का नाम, गांव का नाम, जन्म एवं मृत्यु की तारीख भी लिखी है।
उरूसकाल की चित्रकथा
इन मृतक स्तंभों पर माड़िया जनजीवन एवं मृतक से संबंधित चित्र बनाए जाते हैं। इनमे मृतक को प्रमुखता से दर्शाया जाता है। उसे घोड़े या हाथी पर सवार, हाथ में टंगिया और छाता लिए चित्रित किया जाता है। मृतक के जीवन की घटनाएं, उसकी विशेषताएं एवं उसकी प्रिय वस्तुओं को भी दर्शाया जाता है। नृत्य करता युवक युवतियों का समूह , कंधे पर कांवड़ में बड़े से मटके में लांदा लेजाता आदमी, हल जोतता किसान, घोड़ासवार, फरसा, टंगिया, धनुष-बाण, कढरी, हंसिया, बकरा, बदक, मुर्गा, चिड़िया, मोर, मछली, कछुआ, शेर, बैल, हाथी, अदि आकृतियां बनाई जाती हैं। इनमें माड़िया जीवन के अनेक पक्षों से संबंधित चीजों का अंकन होता है।
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-मुश्ताक खान, लेखक, नई दिल्ली
