कोयला गैसीकरण से आत्मनिर्भरता में बड़ा कदम

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Published By Deepak Mishra
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 रजत मेहरोत्रा,
वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ 

 

भारत दुनिया के सबसे बड़े कोयला उत्पादक देशों में शामिल है। भारत के पास 344 अरब टन से अधिक अनुमानित कोयला संसाधन मौजूद हैं, जो इसे दुनिया के सबसे बड़े कोयला संपन्न देशों में शामिल करता है, लेकिन विडंबना यह है कि ऊर्जा, उर्वरक, प्राकृतिक गैस और पेट्रोकेमिकल उत्पादों के लिए भारत अभी भी बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के आयात पर हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये खर्च होते हैं, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है। ऐसे समय में भारत सरकार की “कोल गैसीफिकेशन योजना” ऊर्जा आत्मनिर्भरता और औद्योगिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पहल बनकर सामने आई है।

कोयला गैसीकरण वास्तव में एक ऐसी तकनीक है, जिसमें कोयले को सीधे जलाने के बजाय उसे नियंत्रित वातावरण में ऑक्सीजन और भाप की मदद से उच्च तापमान पर परिवर्तित किया जाता है। इस प्रक्रिया से “सिंगैस” यानी सिंथेटिक गैस तैयार होती है, जिसमें मुख्य रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन शामिल होते हैं। इसी गैस का उपयोग बिजली उत्पादन, उर्वरक निर्माण, रसायन उद्योग, सिंथेटिक प्राकृतिक गैस और स्वच्छ ईंधन तैयार करने में किया जा सकता है। 

भारत सरकार ने वर्ष 2030 तक कम से कम 100 मिलियन टन कोयले का गैसीकरण करने का लक्ष्य रखा है। सरकार इस क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के लिए वित्तीय सहायता और “वायबिलिटी गैप फंडिंग” भी उपलब्ध करा रही है। सार्वजनिक और निजी कंपनियों को इस तकनीक में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि भारत आयातित गैस और पेट्रोलियम उत्पादों पर अपनी निर्भरता कम कर सके।  

हाल के वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने यह साबित कर दिया है कि ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने पर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों को भारी आर्थिक दबाव झेलना पड़ सकता है। ऐसे में कोल गैसीफिकेशन भारत को घरेलू संसाधनों के बेहतर उपयोग का विकल्प देता है। इस योजना का सबसे बड़ा आर्थिक लाभ यह है कि इससे आयात बिल कम हो सकता है। यदि कोयले से गैस, उर्वरक और अन्य औद्योगिक उत्पाद देश में ही बनने लगें, तो विदेशी मुद्रा की बचत होगी। इससे रुपया मजबूत करने में भी मदद मिल सकती है। साथ ही भारत का व्यापार घाटा कम होने की संभावना बढ़ेगी। इसके अलावा यह योजना औद्योगिक विकास को भी नई दिशा दे सकती है। 

गैसीफिकेशन आधारित परियोजनाओं में भारी निवेश की आवश्यकता होती है, जिससे इस्पात, मशीनरी, इंजीनियरिंग, केमिकल और निर्माण जैसे क्षेत्रों को गति मिलेगी। नए औद्योगिक कॉरिडोर और उत्पादन इकाइयों के विकास से रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। सरकार का मानना है कि यह योजना कोयला उत्पादक राज्यों जैसे झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दे सकती है। कोयला गैसीफिकेशन का एक महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है।

पारंपरिक कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में सीधे कोयला जलाने से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर ऑक्साइड और अन्य प्रदूषक निकलते हैं, जबकि गैसीफिकेशन तकनीक अपेक्षाकृत नियंत्रित और अधिक स्वच्छ मानी जाती है। इसमें प्रदूषण नियंत्रण तकनीकों को बेहतर तरीके से लागू किया जा सकता है। हालांकि यह पूरी तरह “ग्रीन एनर्जी” नहीं है, लेकिन पारंपरिक कोयला उपयोग की तुलना में इसे एक बेहतर विकल्प माना जा रहा है। 

भारत की उर्वरक और रसायन उद्योग को भी इससे बड़ा लाभ मिल सकता है। आज भारत यूरिया और प्राकृतिक गैस के आयात पर काफी निर्भर है। यदि सिंगैस के माध्यम से घरेलू स्तर पर अमोनिया और यूरिया का उत्पादन बढ़ता है, तो कृषि क्षेत्र को स्थिर आपूर्ति मिल सकती है और आयात लागत घट सकती है। इससे किसानों को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा होगा। हालांकि इस योजना के सामने कई चुनौतियां भी हैं। कोल गैसीफिकेशन परियोजनाएं अत्यधिक पूंजी-प्रधान होती हैं। इनकी स्थापना में भारी निवेश और आधुनिक तकनीक की जरूरत होती है।

इसके अलावा जल उपयोग और कार्बन उत्सर्जन को लेकर भी चिंताएं बनी हुई हैं। यदि उचित पर्यावरणीय प्रबंधन नहीं किया गया, तो यह तकनीक भविष्य में पर्यावरणीय दबाव बढ़ा सकती है। इसलिए भारत को “क्लीन कोल टेक्नोलॉजी” और कार्बन कैप्चर जैसी उन्नत प्रणालियों पर भी निवेश बढ़ाना होगा। वैश्विक स्तर पर भी ऊर्जा परिवर्तन तेजी से हो रहा है। दुनिया सौर ऊर्जा, हाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ रही है। ऐसे में भारत के लिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि कोल गैसीफिकेशन केवल अस्थायी ऊर्जा सुरक्षा का माध्यम बने और साथ-साथ स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में भी निवेश जारी रहे। यदि संतुलन नहीं बनाया गया, तो भविष्य में यह तकनीक आर्थिक रूप से महंगी साबित हो सकती है। (ये लेखक के निजी के निजी विचार हैं)

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