संपादकीय : संवाद का संदेश
भाजपा के संगठनात्मक फेरबदल के राजनीतिक संकेत साफ हैं। इसकी संरचना में 2027 के विधानसभा चुनावों की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। भाजपा ने एक साथ संगठन और चुनाव- दोनों मोर्चों को साधने की कोशिश की है। भाजपा कैडर आधारित दल है, इसलिए उसका संगठन चुनाव आने पर अचानक सक्रिय होने वाला ढांचा नहीं, बल्कि लगातार काम करने वाली मशीनरी है। नई टीम ने इस व्यवस्था को और अधिक चुनाव-केंद्रित बनाया है। 2027 में सात राज्यों में चुनाव हैं। ऐसे में राष्ट्रीय पदाधिकारियों का चयन स्वाभाविक रूप से उन राज्यों की राजनीतिक जरूरतों से जुड़ना था। सबसे बड़ा संकेत उत्तर प्रदेश को राष्ट्रीय संगठन में असाधारण प्रतिनिधित्व मिलना है।
80 लोकसभा सीटों और 403 विधानसभा क्षेत्रों वाले उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए 2027 केवल एक राज्य चुनाव नहीं, बल्कि 2029 की लोकसभा रणनीति का पहला निर्णायक पड़ाव है। यही कारण है कि जून में प्रदेश संगठन में भी सभी छह क्षेत्रीय अध्यक्ष बदले गए थे और सामाजिक तथा क्षेत्रीय संतुलन पर जोर दिया गया था। भाजपा ने लंबे समय से विपक्ष के पीडीए- पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक के जवाब में गैर-यादव पिछड़ों, दलितों और पसमांदा मुसलमानों तक अपनी पहुंच बढ़ाने की रणनीति अपनाई है। पूर्वांचल में ब्राह्मण प्रतिनिधित्व और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पसमांदा मुस्लिम संपर्क की कोशिश इसी सूक्ष्म सामाजिक इंजीनियरिंग का हिस्सा समझी जानी चाहिए, हालांकि किसी समुदाय के एक-दो नेताओं को पद देने से उसका पूरा वोट बैंक स्थानांतरित नहीं होता।
सपा के यादव-मुस्लिम आधार में सेंध तभी संभव है, जब संगठन स्थानीय स्तर पर लगातार सामाजिक संवाद, प्रत्याशी चयन और सत्ता में वास्तविक हिस्सेदारी का भरोसा पैदा करे। कई राज्यों में संगठन और चुनाव प्रबंधन का अनुभव रखने वाले विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाना भी चुनावी चाल है, इससे स्थानीय गुटों से अपेक्षाकृत दूरी और केंद्रीय नेतृत्व के प्रति जवाबदेही दोनों सुनिश्चित कर होगी।
उत्तराखंड के चार नेताओं को राष्ट्रीय जिम्मेदारी मिलना भी कम महत्वपूर्ण नहीं। 70 विधानसभा और पांच लोकसभा सीटों वाला छोटा राज्य संख्यात्मक दृष्टि से उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र की बराबरी नहीं करता, लेकिन वहां लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की भाजपा की महत्वाकांक्षा और 2029 के लिए पहाड़ी राज्य में अपनी पकड़ बनाए रखने की जरूरत इसे विशेष महत्व देती है। नबीन के मई दौरे में बूथ सुदृढ़ीकरण और 2027 की जीत पर विशेष जोर इसका प्रमाण है, इसलिए प्रदेश प्रभारी के चयन में भी चुनावी दक्षता और धामी सरकार के साथ प्रभावी समन्वय प्रमुख कसौटी होने की संभावना है।
गोवा, मणिपुर और हिमाचल को राष्ट्रीय टीम में प्रमुख प्रतिनिधित्व न मिलना बताता है कि भाजपा ने इस बार ‘हर राज्य को समान हिस्सा’ देने के बजाय ‘जहां तत्काल राजनीतिक निवेश अधिक जरूरी है’ वहां संसाधन लगाने का तरीका अपनाया है। वहां की चुनावी रणनीति अलग प्रभारी, सह-प्रभारी और स्थानीय नेतृत्व के जरिए संचालित की जा सकती है। भाजपा ने दरअसल 2027 की टीम बनाई है, लेकिन उसकी निगाह 2029 पर है। नई टीम मजबूत है, क्योंकि इसमें संगठन, चुनाव प्रबंधन, सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय संतुलन- चारों को साथ रखने का प्रयास है। इसकी असली मजबूती की परीक्षा मैदान में होगी।
