फुहार, झूले और विरह  सावन का लोक संसार

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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सावन भारतीय लोकजीवन में केवल वर्षा का मौसम नहीं, बल्कि प्रकृति, प्रेम, मिलन और विरह की भावनाओं का उत्सव है। बादलों की गर्जना, रिमझिम फुहार, झूलों की पींग और कोयल की कूक जहां वातावरण में उल्लास भरती है, वहीं परदेस गए प्रिय की याद विरहिणी के मन को उदास कर देती है। लोकगीतों ने सावन के इसी दोहरे स्वरूप को बड़ी संवेदनशीलता से संजोया है। इनमें धरती की प्यास बुझने की खुशी, किसान की उम्मीद, प्रकृति का शृंगार और प्रेमिका की प्रतीक्षा एक साथ दिखाई देते हैं। यही कारण है कि सावन के गीत आज भी लोकमन की भावनाओं को उतनी ही गहराई से छूते हैं।

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सावन आते ही प्रकृति जैसे अचानक अपना रूप बदल लेती है। तपती धरती पर बादलों की छांव पड़ते ही वातावरण में ठंडक घुलने लगती है। झर-झर बरसती बूंदों से वृक्ष धुलकर निखर उठते हैं और हवा के झोंकों के साथ उनकी डालियां झूमने लगती हैं। ऐसा लगता है मानो पेड़-पौधे भी वर्षा के स्वागत में नृत्य कर रहे हों। धरती पर हरियाली की चादर बिछ जाती है और सूखी वनस्पतियों में फिर से जीवन लौट आता है। पशु-पक्षी चहक उठते हैं, कीट-पतंगों में नई सक्रियता दिखाई देती है और किसान के मन में आने वाली फसल की उम्मीद जाग जाती है।

सावन के इस प्राकृतिक उल्लास को लोकगीतों ने बेहद खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है। अमरूद की डाल पर बैठी कोयल की कूक, पपीहे की ‘पीहू-पीहू’, मेंढकों की टर्राहट और मोर का पंख फैलाकर नाचना वर्षा ऋ तु की पहचान बन जाते हैं। उमड़ते-घुमड़ते बादलों को देखकर मोर का नृत्य मानो प्रकृति की अपनी खुशी का प्रतीक बन जाता है। ऐसे ही वातावरण में लोकमन गा उठता है- सावन आया रे, झूले पड़ गए बाग/झूला झूलें सखियां सारी, मन में उठे उमंग। 

सावन  का मौसम जितना प्रकृति को मादक बनाता है, उतना ही मनुष्य के भीतर भावनाओं की हलचल भी बढ़ाता है। खासकर प्रेम और विरह के प्रसंगों में सावन का स्वर और गहरा हो जाता है। जिन स्त्रियों के प्रियजन उनके पास होते हैं, उनके लिए झूले, तीज और वर्षा आनंद के अवसर बन जाते हैं; लेकिन जिनका प्रिय परदेस में है, उनके लिए यही मौसम प्रतीक्षा और पीड़ा लेकर आता है।

विरहिणी को सावन की हर चीज अपने प्रिय की याद दिलाती है। बादलों की आवाज उसे प्रियतम की पुकार जैसी लगती है, पपीहे की ‘पिया-पिया’ उसे बेचैन करती है और वर्षा की बूंदें उसके मन में दबे प्रेम को फिर जगा देती हैं। वह नणंद से अपने प्रिय को पत्र लिखने का आग्रह करती है- हेरी सखी सामण मास घिरण लाग्यो/नणदी ऐसा खत लिखवा दे/ मेरे प्रीतम ने बुलवा दो।

पति परदेस में हो तो उत्सव का उल्लास भी विरह की पीड़ा को ढक नहीं पाता। बागों में झूले पड़ जाते हैं, सहेलियां सज-संवरकर झूला झूलती हैं, लेकिन विरहिणी की आंखें अपने प्रिय की राह देखते-देखते थक जाती हैं- बागों में पड़ गए सावन के झूले/बाट सजना की जोहते नैन थक गए। क्यों सजन मेरे न लौट के आए/सखि! कमल खिले सरवर के तीरे/ हैं मेरे नैन-कमल मुरझाए।

यहां सावन का सौंदर्य और विरह की उदासी एक-दूसरे के समानांतर चलते दिखाई देते हैं। सरोवर में कमल खिल रहे हैं, वन हरियाली से भर रहे हैं, लेकिन विरहिणी की आंखों में उदासी है। प्रकृति बाहर से जितनी सुंदर होती जाती है, उसके भीतर का अकेलापन उतना ही गहरा होता जाता है। लोकगीतों में बादलों को भी विरहिणी के दुख का सहभागी बनाया गया है। वह बादल से शिकायत करती है- बदरिया बैरिन हो, सब के पिय भीजे घर-आंगन/मेरे पिय भीजे परदेश, बदरिया बैरिन हो।

यह पंक्ति सावन के लोकगीतों में छिपे विरह की तीव्रता को सहज रूप में सामने लाती है। दूसरों के प्रियजन जब घर-आंगन में वर्षा का आनंद ले रहे हैं, तब उसका प्रिय दूर किसी परदेश में है। इसलिए जो बादल दूसरों के लिए खुशी लेकर आए हैं, वही उसके लिए विरह के दूत बन जाते हैं। सावन की वर्षा केवल बाहरी प्रकृति को नहीं भिगोती, वह मन की स्मृतियों को भी सींचती है। घने बादल जब आकाश में उमड़ते हैं और बिजली चमकती है, तब विरहिणी के मन में भी अतीत के मिलन की स्मृतियां कौंधने लगती हैं। बीते हुए सुखद क्षण और वर्तमान की दूरी उसके भीतर ऐसा द्वंद्व पैदा करते हैं, जिसकी परिणति आंखों से बहते आंसुओं में होती है।

“मन नै तो समझाऊं, पर जोबन बैरी तरसै...”

वर्षा की ठंडी हवा, पपीहे की पुकार, कोयल की कूक और बूंदों की रिमझिम—ये सभी विरहिणी की बेचैनी को और बढ़ा देते हैं। प्रिय की स्मृति से उसका मन बार-बार उसी ओर लौटता है। कवि केशव ने भी वर्षा ऋ तु के प्राकृतिक सौंदर्य को शब्द देते हुए लिखा- केशव सरिता सकल, मिलत सायर मन मोहै।/ललित लता लपटाति, तरुण वन तरुबर सोहै।

वर्षा के साथ प्रकृति का सौंदर्य अपने चरम पर पहुंच जाता है। फूलों की पंखुड़ियों पर ठहरी बूंदें, हरे-भरे वृक्ष, लताओं का फैलाव और जल से भरे सरोवर मन को आकर्षित करते हैं। छोटे-छोटे जीव-जंतु सक्रिय हो जाते हैं। खेतों में हरियाली दिखाई देने लगती है और किसान की उम्मीदें भी आकार लेने लगती हैं। इसीलिए सावन ग्रामीण जीवन के लिए केवल मनोरंजन का मौसम नहीं, बल्कि जीवन और आजीविका की नई आशा का समय भी है।

लोकगीतों में सावन की नायिका कभी खिड़की के पास बैठकर वर्षा देखती है तो कभी प्रियतम से मिलने के लिए सामाजिक और प्राकृतिक बाधाओं की परवाह किए बिना निकल पड़ती है। ‘कृष्णाभिसारिका’ नायिका का चित्रण इसी भाव को व्यक्त करता है। घनघोर वर्षा, अंधेरी रात और गरजते बादल भी उसके प्रेम को रोक नहीं पाते। उसके लिए मिलन की आकांक्षा प्रकृति की प्रतिकूलता से कहीं अधिक शक्तिशाली है।

सावन के लोकगीतों की सबसे बड़ी खूबी यही है कि इनमें प्रकृति और मनुष्य अलग-अलग दिखाई नहीं देते। बादल केवल बादल नहीं हैं, वे कभी प्रिय के संदेशवाहक हैं तो कभी विरह की पीड़ा बढ़ाने वाले साथी। पपीहा केवल पक्षी नहीं, बल्कि प्रेम की पुकार है। झूला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामूहिक उल्लास का प्रतीक है और वर्षा की बूंदें कभी धरती की प्यास बुझाती हैं तो कभी विरहिणी के मन में स्मृतियों की बाढ़ ला देती हैं।

इस तरह सावन के लोकगीतों में जीवन के अनेक रंग एक साथ दिखाई देते हैं। किसान के लिए यह आशा और समृद्धि का मौसम है, प्रकृति के लिए नवजीवन का, युवतियों के लिए तीज और झूलों का तथा प्रेमियों के लिए मिलन और विरह का। यही बहुरंगी भावभूमि सावन के लोकगीतों को कालजयी बनाती है। इनमें प्रकृति का सौंदर्य है, प्रेम की कोमलता है, विरह की कसक है और लोकजीवन की सहज धड़कन भी। इसलिए सावन बीत जाने के बाद भी उसके गीत लोकमन में लंबे समय तक गूंजते रहते हैं।