स्वच्छ ऊर्जा की खोज में भारी न पड़ जाए कचरा
सौर ऊर्जा को लंबे समय से जीवाश्म ईंधन के विकल्प के रूप में एक अचूक और पूर्णतः स्वच्छ ऊर्जा स्रोत माना जाता रहा है। वैश्विक तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों से जूझ रही दुनिया के लिए सूर्य की किरणों से बिजली बनाना एक जादुई समाधान की तरह उभरा। परंतु जैसे-जैसे यह हरित क्रांति प्रौढ़ता की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसका एक अनदेखा, स्याह और खतरनाक पहलू सामने आने लगा है। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की व्यापक रिपोर्ट ‘द डार्क साइड ऑफ सोलर पावर’ संकेत करती है कि जिस सौर ऊर्जा को हम पर्यावरण के रक्षक के रूप में देखते हैं, वह भविष्य में कचरे के विशाल और जहरीले संकट में बदल सकती है।
सोलर पैनलों की समस्या का मूल कारण उनकी जीवन अवधि और उपभोक्ता व्यवहार में छिपा है। सामान्यतः एक सोलर पैनल लगभग पच्चीस से तीस वर्ष तक कुशलता से काम करता है। इसी आधार पर शुरुआती अनुमानों में माना गया था कि सौर कचरे का संकट वर्ष 2050 के आसपास आएगा, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के आर्थिक विश्लेषण के अनुसार, तकनीकी नवाचार और लगातार गिरती कीमतों के कारण लोग पुराने पैनलों को तीस वर्ष पूरा होने से पहले ही बदल रहे हैं। नई तकनीक के पैनल कम जगह में अधिक बिजली पैदा करते हैं, इसलिए बड़े सौर पार्क और आर्थिक रूप से सक्षम उपभोक्ता पुराने पैनल समय से पहले हटा देते हैं।
इस असमय प्रतिस्थापन ने कचरे के आगमन की रफ्तार बढ़ा दी है। अनुमान है कि सोलर कचरे का जो सैलाब 2045 या 2050 में आने की उम्मीद थी, वह उससे पहले ही दस्तक दे चुका है। यदि इस रफ्तार पर अंकुश न लगा तो 2050 तक दुनिया के लैंडफिल में छह करोड़ टन से अधिक फोटोवोल्टिक पैनलों का कचरा जमा हो सकता है।
फोर्ब्स में प्रकाशित माइकल शेलनबर्गर के शोध के अनुसार, सोलर पैनलों के निर्माण में सीसा, कैडमियम, एंटीमनी और क्रोमियम जैसी जहरीली भारी धातुओं का उपयोग किया जाता है।
जब जीवनकाल समाप्त होने के बाद पैनलों को बिना वैज्ञानिक उपचार के खुले मैदानों या सामान्य लैंडफिल में फेंका जाता है, तो वर्षा जल के प्रभाव से ये तत्व रिसकर मिट्टी में पहुंच सकते हैं। वहां से वे भूजल स्रोतों तक पहुंचकर पेयजल और कृषि तंत्र को प्रदूषित कर सकते हैं। ‘साइंस डायरेक्ट’ में प्रकाशित शोध भी संकेत करता है कि फोटोवोल्टिक कचरे का अनियंत्रित निपटान पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए दीर्घकालिक खतरा है तथा प्रभावी पुनर्चक्रण तंत्र विकसित करना आवश्यक है।
भारत के संदर्भ में यह चुनौती और अधिक संवेदनशील हो जाती है। ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ (एनर्जी वर्ल्ड) की रिपोर्ट ‘द रिस्की साइड ऑफ सोलर एनर्जी’ के अनुसार, भारत सौर ऊर्जा का तेजी से विस्तार करने वाले देशों में शामिल है, लेकिन सौर कचरे के प्रबंधन में उसकी तैयारी चिंता पैदा करती है। देश में इस इलेक्ट्रॉनिक और सौर कचरे के सुरक्षित निपटान के लिए सख्त और व्यापक व्यवस्था की जरूरत है।
फर्स्टपोस्ट की एक खोजी रिपोर्ट भी चेतावनी देती है कि ठोस अपशिष्ट निपटान योजना के अभाव में सौर ऊर्जा का विस्तार जैव विविधता के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, जहां विशाल सौर पार्क स्थापित हो रहे हैं, अनुपयोगी पैनलों के खुले में छोड़े जाने या अनौपचारिक कबाड़ बाजार में पहुंचने की आशंका है। वहां उन्हें असुरक्षित तरीके से तोड़ा-फोड़ा गया तो स्थानीय मिट्टी, जल और पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकते हैं।
सोलर पैनलों के पुनर्चक्रण की राह में सबसे बड़ी बाधा वित्तीय व्यवहार्यता की कमी है। ग्रीनमैच जैसे वैश्विक अध्ययनों से स्पष्ट है कि रिसाइक्लिंग की तकनीकें उपलब्ध हैं और उनसे सिलिकॉन, एल्युमीनियम तथा उच्च गुणवत्ता वाला कांच जैसी मूल्यवान सामग्री प्राप्त की जा सकती है, लेकिन तकनीकी संभावना के सामने अर्थशास्त्र की दीवार खड़ी है।
हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के अनुसार, एक सोलर पैनल को रिसाइकिल करने की लागत लगभग बीस से तीस डॉलर तक आती है, जबकि उससे प्राप्त सामग्री का बाजार मूल्य केवल तीन से चार डॉलर के आसपास है। इस आर्थिक अंतर के कारण निजी कंपनियों के लिए रिसाइक्लिंग आकर्षक व्यवसाय नहीं बन पाती। जब तक लागत कम नहीं होती या सरकारें प्रोत्साहन और सब्सिडी नहीं देतीं, तब तक पैनलों को डंप करना अधिक सस्ता विकल्प बना रह सकता है। यही स्थिति भविष्य में सौर ऊर्जा के विस्तार के पर्यावरणीय लाभों को कमजोर कर सकती है।
इस पर्यावरणीय दुविधा से बाहर निकलने का रास्ता कड़े नीतिगत हस्तक्षेप और स्पष्ट उत्तरदायित्व से ही निकलेगा। सरकारों को ऐसे कानून बनाने चाहिए जो सौर विनिर्माताओं के लिए ‘विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व’ यानी एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी को अनिवार्य करें, जैसा कि यूरोपीय संघ ने किया है।
इसका अर्थ है कि जो कंपनी सोलर पैनल बनाती और बेचती है, उसकी कानूनी जिम्मेदारी हो कि पैनल खराब होने या जीवनकाल पूरा होने पर उसे वापस लेकर सुरक्षित पुनर्चक्रण सुनिश्चित करे। इसके साथ ही शोध और विकास में निवेश बढ़ाना होगा, ताकि रिसाइक्लिंग की नई, सस्ती और प्रभावी तकनीकें विकसित हो सकें। पैनलों के निर्माण से लेकर उनके उपयोग और अंतिम निपटान तक पूरे जीवनचक्र की निगरानी के लिए एक मजबूत व्यवस्था भी विकसित करनी होगी।
यदि हम आज इस समस्या की अनदेखी करते रहे तो आने वाली पीढ़ियां हमें ऐसे समाज के रूप में याद कर सकती हैं, जिसने एक प्रदूषण को कम करने की कोशिश में उससे जुड़ा नया और स्थायी कचरा संकट खड़ा कर दिया। समय आ गया है कि हम सौर ऊर्जा के इस स्याह पक्ष को स्वीकार करें और समय रहते सुधारात्मक कदम उठाएं, ताकि भविष्य की हरित क्रांति अपनी ही विफलता के मलबे के नीचे न दबे।
