लाठी नहीं, संवाद से निकलेगा रास्ता
झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों और अभ्यर्थियों का आंदोलन अब केवल परीक्षा रद्द कराने या जांच की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। यह सरकार, प्रशासन और युवाओं के बीच टूटते भरोसे का सवाल बन गया है। जिस युवा ने वर्षों तक सरकारी नौकरी की तैयारी की है, उसके लिए परीक्षा में कथित धांधली महज प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं, बल्कि उसकी मेहनत और भविष्य के साथ अन्याय है। इसलिए पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध भर्ती व्यवस्था की मांग को खारिज नहीं किया जा सकता।
आंदोलन के दबाव के बीच झारखंड सरकार ने 14 वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा तथा 2023 और 2025 की बैकलॉग परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला किया है। जेपीएससी के पूर्व अध्यक्ष एल. खियांगते के इस्तीफे के बाद आयोग के तीन अन्य सदस्यों के इस्तीफे भी स्वीकार किए गए हैं। कथित अनियमितताओं की सीआईडी और ईडी जांच, मामलों के त्वरित निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक अदालत तथा 90 दिनों में जांच पूरी करने की बात कही गई है। परीक्षा व्यवस्था में दीर्घकालिक सुधार के लिए आईआईएम रांची, आईआईटी-आईएसएम व एक्सएलआरआई के विशेषज्ञों की समिति बनाने का प्रस्ताव भी सामने आया है।
सरकार का दावा है कि छात्रों की लगभग 98 प्रतिशत मांगें मान ली गई हैं। फिर आंदोलन क्यों जारी है? इसका उत्तर सीबीआई जांच की मांग में छिपा है। यहीं सरकार और आंदोलनकारी छात्रों के बीच संवाद की सबसे बड़ी दीवार खड़ी है। छात्र जेएसएससी-सीजीएल सहित विवादित परीक्षाओं की सीबीआई जांच चाहते हैं। सरकार का तर्क है कि सीजीएल परीक्षा न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी है और उसके परिणाम के बाद नियुक्तियां भी हो चुकी हैं, इसलिए उसे राज्य सरकार अपने स्तर से रद्द नहीं कर सकती। दूसरी ओर छात्रों को भी समझना होगा कि सीबीआई जांच ही निष्पक्षता की एकमात्र कसौटी नहीं है। यदि किसी स्वतंत्र संस्था की जांच न्यायिक निगरानी में, स्पष्ट समयसीमा के साथ हो और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करने की व्यवस्था हो तो उस विकल्प पर विचार किया जा सकता है। आंदोलन की सफलता केवल अधिकतम मांगें मनवा लेने में नहीं, बल्कि ऐसा समाधान हासिल करने में है जो भविष्य की व्यवस्था को भी विश्वसनीय बनाए।
किसी आरोप को सच मान लेना और आरोप की निष्पक्ष जांच कराना दो अलग बातें हैं। यही अंतर लोकतांत्रिक आंदोलन को अपनी नैतिक शक्ति बनाए रखने के लिए समझना होगा। परीक्षा रद्द करना समाधान का अंत नहीं है। जिन अभ्यर्थियों ने वर्षों तैयारी की है, उनकी उम्र बढ़ रही है। कई अभ्यर्थी दूसरी नौकरियों के अवसर भी खो चुके होंगे। इसलिए नई परीक्षा कब होगी, उम्र सीमा में क्या राहत मिलेगी, पाठ्यक्रम क्या होगा और पुराने अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा कैसे होगी-इन सवालों का स्पष्ट और लिखित जवाब सरकार को देना चाहिए।
जेपीएससी के अध्यक्ष और सदस्यों के इस्तीफे को भी जवाबदेही की अंतिम मंजिल नहीं माना जा सकता। पद छोड़ना और किसी अनियमितता के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना अलग-अलग बातें हैं। जांच को यह स्पष्ट करना होगा कि गड़बड़ी हुई या नहीं, हुई तो किस स्तर पर हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। दोषी अधिकारी, बिचौलिया या कोई प्रभावशाली व्यक्ति-कानून की पहुंच सभी तक होनी चाहिए, लेकिन इस पूरे प्रकरण में पुलिस कार्रवाई भी गंभीर सवाल खड़े करती है। लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं है। सरकार के खिलाफ धरना देना, नारे लगाना और शांतिपूर्ण मार्च निकालना नागरिक अधिकारों का हिस्सा है।
झारखंड सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। अब उसे साबित करना होगा कि ये कदम केवल आंदोलन शांत कराने के लिए नहीं, बल्कि भर्ती व्यवस्था को बदलने के लिए हैं। छात्रों को भी साबित करना होगा कि उनका आंदोलन केवल परीक्षा रद्द कराने के लिए नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय और पारदर्शी व्यवस्था के लिए है। विधानसभा का घेराव हो चुका, हिरासत और पुलिस कार्रवाई भी हो चुकी। अब अगला रास्ता लाठी और बैरिकेड का नहीं, संवाद का होना चाहिए। मुख्यमंत्री को छात्रों से सीधे बात करनी चाहिए। सरकार को समयबद्ध लिखित आश्वासन देना चाहिए और छात्रों को अहिंसा व अनुशासन की अपनी ताकत बनाए रखनी चाहिए।
क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि छात्र विधानसभा तक पहुंचे या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या झारखंड में अगली प्रतियोगी परीक्षा ऐसी होगी, जिसके परिणाम पर भरोसा करने के लिए किसी छात्र को फिर विधानसभा की सड़क तक नहीं आना पड़ेगा? अगर इसका जवाब हां है, तो आज का संकट व्यवस्था सुधारने का अवसर बन सकता है। वहीं जवाब नहीं है, तो आंदोलन समाप्त होने के बाद भी संकट समाप्त नहीं होगा। परीक्षा की गड़बड़ी की जांच जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है उस भरोसे की बहाली, जिस पर लोकतंत्र और भर्ती व्यवस्था दोनों टिके हैं।(ये लेखक के निजी विचार हैं)
