संपादकीय : लाठी नहीं जवाबदेही

Amrit Vichar Network
Edited By Pradeep Kumar
On

भर्ती परीक्षाओं पर उठते सवाल और पुलिस का लाठीचार्ज

रांची में जेएसएससी-जेपीएससी परीक्षाओं को लेकर छात्रों के प्रदर्शन और लाठीचार्ज पर पढ़ें आज का खास संपादकीय 'लाठी नहीं जवाबदेही'।

रांची के प्रदर्शनकारी छात्रों और पुलिस के बीच टकराव भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर युवाओं में बढ़ते अविश्वास का संकेत है। कानून-व्यवस्था जरूरी है, लेकिन क्या बल प्रयोग से पहले संवाद के सारे रास्ते समाप्त हो चुके थे। यदि भीड़ ने सुरक्षा घेरा तोड़ा तो पुलिस को उसे रोकने का अधिकार है। मगर लोकतांत्रिक शासन में बल अंतिम उपाय होना चाहिए, पहला संदेश नहीं। खासकर तब, जब सामने अपने भविष्य को लेकर बेचैन युवा हों। लाठीचार्ज अविश्वास को खत्म नहीं करता, उसे गहरा कर सकता है। हेमंत सोरेन सरकार का दावा है कि 98 प्रतिशत मांगें मान ली गई हैं, वरिष्ठ मंत्री संवाद कर रहे हैं, एसआईटी जांच चल रही है और नई मानक संचालन प्रक्रिया तैयार है। फिर आंदोलन विधानसभा तक क्यों पहुंचा? उत्तर प्रतिशत में नहीं, बची हुई मांगों की प्रकृति में है। जब छात्र जेपीएससी-जेएसएससी की विवादित परीक्षाओं को रद्द करने, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और कथित अनियमितताओं की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हों, तब 98 प्रतिशत का गणित उनके लिए निर्णायक नहीं होता। सवाल यह है कि क्या उस परीक्षा और व्यवस्था पर भरोसा किया जा सकता है, जिसके आधार पर उनका भविष्य तय होना है। उच्च न्यायालय ने जेएसएससी-सीजीएल मामले में परिणाम जारी करने के साथ एसआईटी जांच जारी रखने का निर्देश दिया था। विवाद केवल राजनीतिक आरोप नहीं; संस्थागत जांच की आवश्यकता स्वीकार की जा चुकी है। यही वह बिंदु है जहां दिल्ली और रांची के आंदोलनों का राजनीतिक अंतर सामने आता है। दिल्ली का आंदोलन केंद्र की शिक्षा व्यवस्था पर राष्ट्रीय प्रश्न बना और विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर मिला। रांची का आंदोलन सीधे राज्य सरकार की प्रशासनिक क्षमता, जेपीएससी-जेएसएससी की विश्वसनीयता और जवाबदेही को कठघरे में खड़ा करता है। लेकिन दोनों को जोड़ने वाली वास्तविक शक्ति राजनीति नहीं, युवा हैं। दिल्ली में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद आंदोलन समाप्त हुआ; इससे जवाबदेही का महत्व सामने आया।

झारखंड सरकार छात्रों की हर मांग मान ले यह उचित न भी हो तो कम से कम उसे हर गंभीर आरोप का निष्पक्ष परीक्षण कराने पर सहमत होना चाहिए। सरकारों की भूल तब होती है जब वे आंदोलनकारियों की राजनीतिक पहचान को उनकी मांगों की वैधता का पैमाना बना देती हैं। विपक्ष के शामिल होने से मूल शिकायत झूठी नहीं हो जाती और राजनीति घुस आने से प्रशासनिक जवाबदेही खत्म नहीं होती। रांची में विपक्षी दलों ने भी सीबीआई जांच की मांग उठाई है, लेकिन इस आधार पर छात्रों की मूल शिकायत को केवल राजनीतिक साजिश बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। समाधान यह है कि परीक्षा रद्द करने जैसी मांग पर निष्पक्ष मानकों से निर्णय हो, जांच एजेंसी के चयन पर पारदर्शी कारण बताए जाएं, समयबद्ध जांच हो और दोषी पाए जाने पर कठोर कार्रवाई हो। भविष्य की परीक्षाओं में प्रश्नपत्र सुरक्षा, स्वतंत्र प्रबंधन, समयबद्ध परिणाम और प्रभावी शिकायत निवारण अनिवार्य हों। लोकतंत्र में सरकार की असली परीक्षा यह नहीं कि वह आंदोलन कितनी मजबूती से रोक सकती है, बल्कि यह है कि वह आंदोलन की जरूरत पैदा होने से पहले समस्या कितनी ईमानदारी से हल कर सकती है।

ये भी पढ़ें - संपादकीय : हॉर्मुज का नया पेच