संपादकीय : संवाद का संदेश
लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन और मोहन भागवत के बयान पर पढ़ें आज का संपादकीय
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के चीफ मोहन भागवत ने जेन-जी की शिकायतों को वास्तविक और प्रदर्शन को लोकतांत्रिक अधिकार बताया है। क्या सत्ता और विपक्ष युवाओं के इन सवालों को समझेगा? जानिए इसके राजनीतिक मायने
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का 'जेन-जी' और 'जेन अल्फा' को लेकर दिया गया वक्तव्य सामाजिक टिप्पणी के अलावा मौजूदा राजनीतिक विमर्श में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप भी है। ऐसे समय में जब परीक्षा अनियमितताओं, शिक्षा व्यवस्था, रोजगार और शासन की जवाबदेही को लेकर देश के अनेक हिस्सों में युवाओं का असंतोष खुलकर सामने आया है, भागवत का यह कहना, ‘जेन-जी की शिकायतें वास्तविक हैं’, ‘प्रदर्शन लोकतांत्रिक संवाद का माध्यम है’ और ‘प्रदर्शनकारी युवा राष्ट्रविरोधी नहीं हैं’, स्वाभाविक रूप से व्यापक राजनीतिक अर्थ ग्रहण करता है। इन बयानों का पहला संदेश यह है कि नई पीढ़ी को केवल अनुशासन या राष्ट्रवाद के पारंपरिक पैमाने से नहीं समझा जा सकता। जेन-जी प्रश्न पूछती है, तर्क मांगती है और सत्ता से उत्तरदायित्व की अपेक्षा करती है। यदि लोकतंत्र में संवाद का स्थान सिकुड़ता है, तो विरोध-प्रदर्शन उसी संवाद का विकल्प बन जाता है। सच यह है कि सरकार की नीतियां केवल वैचारिक संकेतों से नहीं बदलतीं; वे राजनीतिक गणित, प्रशासनिक विवेक और कानूनी प्रक्रियाओं से भी संचालित होती हैं।
इस बयान से सरकार का जेन जी प्रदर्शनकारियों पर विचार बदलेगा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। फिर भी इतना स्पष्ट है कि संघ प्रमुख ने भाजपा और सरकार के सामने एक वैचारिक कसौटी अवश्य रखी है। भारतीय राजनीति में संघ और भाजपा का संबंध केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक भी है। यद्यपि भाजपा सरकार अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से लेती है, लेकिन संघ प्रमुख के सार्वजनिक विचारों की उपेक्षा भी सामान्य बात नहीं होती। भाजपा की ओर से तत्काल प्रतिक्रिया न आना संभवतः एक रणनीतिक मौन है, ताकि बयान की राजनीतिक व्याख्याओं से बचा जा सके। संभव है कि भागवत का यह वक्तव्य देश के लगभग 40 करोड़ युवा मतदाताओं तक सकारात्मक संदेश पहुंचाने का प्रयास हो। हाल के छात्र आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जेन-जी को न तो अनदेखा किया जा सकता है और न ही केवल प्रचार से प्रभावित माना जा सकता है। उनकी राजनीतिक चेतना, डिजिटल सक्रियता और प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति अब चुनावी राजनीति का भी महत्वपूर्ण कारक बन चुकी है। विपक्षी दलों के अनुसार यदि छात्रों की शिकायतें वास्तविक हैं, तो संसद में माफी, बल प्रयोग की जवाबदेही और संबंधित निर्णयों की समीक्षा होनी चाहिए। यह विपक्ष का राजनीतिक तर्क है। दूसरी ओर सरकार या उसके समर्थकों का पक्ष यह हो सकता है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी राज्य का दायित्व है। लोकतंत्र में इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच संतुलन ही सर्वोत्तम मार्ग है।
भागवत ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार, संवाद, तर्क और अपनेपन की जिस आवश्यकता पर बल दिया है, वह किसी एक दल की नहीं, पूरे लोकतांत्रिक तंत्र की परीक्षा है। यदि उनके शब्द केवल भाषण बनकर रह गए तो उनका प्रभाव सीमित रहेगा, लेकिन यदि सत्ता, विपक्ष और समाज तीनों यह स्वीकार करें कि प्रश्न पूछने वाला युवा लोकतंत्र की शक्ति है, कमजोरी नहीं, तब यह वक्तव्य एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हो सकता है। लोकतंत्र की स्थिरता आदेशों से नहीं, बल्कि विश्वास, उत्तरदायित्व और संवाद से मजबूत होती है। यही संदेश आज की राजनीति के लिए सबसे अधिक प्रासंगिक है।
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