कर्ज में डूबते किसान कैसे बनें अर्थव्यवस्था का सहारा

Amrit Vichar Network
Edited By Deepak Mishra
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सुनिधि कुमारी, एक्टिविस्ट

गांवों में खेती केवल रोजगार नहीं, बल्कि पूरे परिवार की ज़िंदगी का आधार होती है। हर मौसम के साथ किसान एक नई उम्मीद बोता है। वह बीज के साथ अपने परिवार की कमाई, मेहनत और आने वाले दिनों का भरोसा भी खेत में डालता है, लेकिन कई बार खेती की शुरुआत ही ऐसी मुश्किलों से होती है, जिन पर किसान का कोई नियंत्रण नहीं होता। समय पर बीज न मिलना, खेती की बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता और सरकारी योजनाओं तक सीमित पहुंच जैसी समस्याएं उसकी उम्मीदों को धीरे-धीरे कमज़ोर कर देती हैं। यही कारण है कि ज़मीन के छोटे टुकड़े पर खेती करने वाला किसान आज केवल मौसम से नहीं, बल्कि व्यवस्था की खामियों से भी संघर्ष कर रहा है।

अनेक ग्रामीण इलाकों में छोटे किसानों की सबसे बड़ी शिकायत यही है कि उन्हें सरकारी बीज वितरण योजना की जानकारी समय पर नहीं मिलती है, या फिर जब वे कृषि विभाग के केंद्रों तक पहुंचते हैं, तब तक बीज का स्टॉक समाप्त हो चुका होता है। कई किसानों के आवेदन अधूरे रह जाते हैं, कुछ तकनीकी कारणों से लाभ से वंचित रह जाते हैं, तो कई ऐसे भी हैं, जो पूरी प्रक्रिया से ही अनजान रहते हैं। परिणामस्वरूप उन्हें निजी दुकानों से अधिक कीमत पर बीज खरीदना पड़ता है, जिससे उनकी खेती की लागत बढ़ जाती है, जबकि आमदनी पहले से ही सीमित होती है। 

हमारे देश में आज भी ज़्यादातर खेती प्रकृति पर निर्भर है और पिछले कुछ वर्षों में मौसम का बदलता स्वरूप किसानों की चिंता और बढ़ा रहा है। कभी अत्यधिक वर्षा खेतों में पानी भर देती है, जिससे तैयार फसल खराब हो जाती है। तो कभी, पर्याप्त वर्षा न होने से सूखे जैसी स्थिति बन जाती है। ऐसी परिस्थितियों में किसान की पूरी मेहनत और निवेश कुछ ही दिनों में नष्ट हो जाता है। बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी पर किया गया खर्च वापस नहीं आता, जबकि लिया गया कर्ज़ ब्याज के साथ बढ़ता ही जाता है। कई बार किसान को पुराने कर्ज़ को चुकाने के लिए नया कर्ज़ लेना पड़ता है और वह धीरे-धीरे कर्ज़ के ऐसे चक्र में फंस जाता है, जिससे निकलना आसान नहीं होता।

सरकार किसानों की आय बढ़ाने और खेती को सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से कई योजनाएं संचालित कर रही है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत पात्र किसानों को प्रतिवर्ष 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खातों में भेजी जाती है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन और सब-मिशन ऑन सीड्स एंड प्लांटिंग मैटेरियल के माध्यम से किसानों को प्रमाणित और उन्नत बीज उपलब्ध कराया जाता है, जिससे उनकी उत्पादकता बढ़ सके। 

इन उपलब्धियों के बावजूद यह कहना कठिन है कि योजनाओं का लाभ सभी छोटे किसानों तक समान रूप से पहुंच पाया है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिन्हें इन योजनाओं की सबसे अधिक ज़रूरत है, वे ही अक्सर वंचित रह जाते हैं। इनमें बड़ी संख्या उन भूमिहीन और महिला किसानों की है, जो खेतों में अनवरत काम करते हैं। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि केवल आर्थिक सहायता देना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि खेती के पूरे चक्र को मजबूत बनाया जाए। समय पर प्रमाणित बीज की उपलब्धता, मौसम के अनुरूप वैज्ञानिक सलाह, आसान फसल बीमा, त्वरित मुआवजा और किसानों तक सही जानकारी पहुंचाने की व्यवस्था एक साथ मजबूत करनी होगी। 

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