Moradabad News : भारत छोड़ो आंदोलन में मुरादाबाद के 11 वर्षीय बालक सहित छह देशभक्त हुए थे शहीद, रोचक है इतिहास
अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन में छह बलिदानियों ने दी अपने प्राणों की आहुति
Moradabad News: भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 10 अगस्त 1942 को मुरादाबाद में निकले जुलूस पर अंग्रेजों ने गोली चला दी थी। 11 वर्षीय जगदीश प्रसाद समेत छह स्वतंत्रता सेनानी शहीद हुए और 200 से अधिक लोग घायल हुए।
मुरादाबाद, अमृत विचार : स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन (क्विट इंडिया मूवमेंट) का महत्वपूर्ण स्थान है। इस आंदोलन में दिए गए करो या मरो के नारे ने हर भारतीय में जो जोश भरा उसने अंग्रेजों की भारत से विदाई की रूपरेखा तैयार कर दी। इस आंदोलन में भारत के हर हिस्से से उठे ज्वार ने अंग्रेजों ही सत्ता की नींव हिला दी थी। मुरादाबाद भी इससे अछूता नहीं रहा।
आठ अगस्त को आंदोलन की घोषणा के साथ ही यह देश के कौने-कौने में फैल गया। दस अगस्त को मुरादाबाद में भी जुलूस निकाला गया, जिसे रोकने के लिए अंग्रेजों ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर गाेलियां चलवा दीं, जिसमें 11 वर्षीय बालक सहित छह आंदोलनकारी बलिदान हुए और 200 से अधिक घायल हुए। हालांकि यह केवल सरकारी आंकड़ा मात्र है।
आठ अगस्त 1942 को बॉम्बे के गोवालिया टैंक मैदान (जिसे बाद में अगस्त क्रांति मैदान का नाम दिया गया) में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र क्विट इंडिया मूवमेंट का प्रस्ताव पारित हुआ। इसमें अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन का नारा दिया गया। नौ अगस्त को महात्मा गांधी सहित कांग्रेस के सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए। प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के कारण यह आंदोलन नेतृत्व विहीन हो गया।
जनता ने स्वयं इसका नेतृत्व किया। मुरादाबाद में सभी प्रमुख नेताओं सहित बड़ी संख्या में लोगों की गिरफ्तारी की गईं। गिरफ्तारियों के विरोध में नौ अगस्त को मुरादाबाद के स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय नेताओं ने अंग्रेजों के विरोध में जुलूस निकालने की योजना बनाई। रात भर में यह संदेश दूर-दूर तक गोपनीय तरीके से पहुंचा दिया गया। दस अगस्त की सुबह बड़ी लोग राजकीय इंटर कालेज के मैदान पर एकत्रित होना शुरू हुए। मोहन लाल एडवोकेट, मकसूद अहमद और रामअवतार दीक्षित के नेतृत्व में जुलूस के रूप में अंग्रेजों के विरुद्ध नारेबाजी करते हुए टाउनहाल की ओर बढ़ने लगे।
अंग्रेज अधिकारियों ने सूचना मिलने के बाद मंडी बांस पर आंदोलनकारियों को रोकने के लिए फोर्स तैनात कर दी थी। जीआइसी की ओर से आंदोलनकारी आगे बढ़ रही थे, अंग्रेजों ने उन्हें रुकने और वापस जाने के लिए चेताया, लेकिन मन में स्वतंत्रता की चाह से प्रेरित आंदोलनकारियों के पग रुकने को तैयार नहीं थे। इससे गुस्साए अंग्रेज कप्तान ने लाठी चार्ज करा दिया। देशभक्तों की टोली लाठियों की चोट की चिंता किए बिना आगे बढ़ती रही। चोट खाते हुए आगे बढ़ते मां भारती के सपूतों के साहस से झल्लाए अफसरों ने गोली चलाने का आदेश कर दिया।
गाेली चलते ही भगदड़ मच गई, सिपाही उनके पीछे भागे। इस भीड़ में शामिल 11 वर्षीय बालक जगदीश प्रसाद पान दरीबा के निकट हाथ में झंडा लिए एक खंभे पर चढ़ने लगा। इस दौरान एक गोली जगदीश प्रसाद को भी लगी और वह खंभे से नीचे गिर गए। अपने अदम्य साहस से जगदीश प्रसाद ने अमर बलिदानियों के बीच अपना नाम लिखवा लिया। वहीं, बचाव के लिए गलियों में भाग रहे लोगों का अंग्रेज सिपाहियों ने पीछा किया। लाठी की चोट और गोली लगने से सैकड़ों की संख्या में आंदोलनकारी घायल हुए।
थोड़ी देर बाद वहां नारेबाजी तो थम गई, लेकिन पीछे रह गई चीख-पुकार और घायलों की कराह। सन्नाटा पसरते ही अंग्रेजों ने शवों को अपने कब्जे में लेना शुरू कर दिया। अमानवीय तरीके से देशभक्तों के शवों को ठेले पर लादकर ले जाया गया। बड़ी संख्या में लोगों अपना जीवन त्यागा, लेकिन घोषणा सिर्फ छह नामों की गई। जिन बलिदानियों के नाम घोषित किए गए उनमें जगदीश प्रसाद शर्मा, प्रेमप्रकाश अग्रवाल, मोतीलाल, रामकुमार, झाऊलाल जाटव और मुमताज तांगे वाला शामिल थे।
दमनकारी घटना से आया उबाल
दस अगस्त की घटना से मुरादाबाद के जन-जन में क्रोध और उबाल था, जिसका प्रतिक्रिया भी हुई। 11 अगस्त को जगह-जगह लोग एकत्रित हुए और हर ओर से अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह शुरू हो गया। सरकारी भवनों में तोड़-फोड़ की गई। इतिहासकारों के अनुसार कई जगह आगजनी की घटनाएं भी हुई। बताया जाता है कि मुरादाबाद स्टेशन से सरकारी खजाना भी लूटा गया।
बनाया गया शहीद स्मारक
जिस स्थान पर यह घटना हुई थीं, वहां स्वतंत्रता मिलने के बाद बलिदानी स्मारक बनाया गया है। नगर निगम की इसकी देखभाल करता है। स्वतंत्रता दिवस पर यहां ध्वज भी फहराया जाता है और बलिदानियों को श्रद्धांजलि भी दी जाती है।
अंग्रेजों के जुल्म से किया पलायन
इस आंदोलन के बाद अंग्रेजों ने दमन शुरू किया। आंदोलन में शामिल हुए लोगों के साथ ही घायलों और बलिदानियों के परिवारों पर जुल्म ढाना शुरू किया। साथ ही गिरफ्तारियां शुरू की गईं। शिकंजा लगातार कसा जा रहा था, जिसके चलते बड़ी संख्या में लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया था।
