जनता जनार्दन देख रही है संसद का 'शोर'

Amrit Vichar Network
Edited By Deepak Mishra
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डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि सड़कें अगर खामोश रहेंगी तो संसद आवारा हो जाएगी। देश की जनता देख रही है कि संसद में कैसे उनके प्रतिनिधि चर्चा से ज्यादा शोर-शराबे में व्यवस्त हैं।

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रोहित माहेश्वरी,
स्वतंत्र पत्रकार

देश के बड़े समाजवादी नेता डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि सड़कें अगर खामोश रहेंगी, तो संसद आवारा हो जाएगी। उनका मतलब ये था कि किसी भी लोकतंत्र को जगाए रखने के लिए जनता को खुद जागते रहना होगा। देश की जनता देख रही है कि कैसे उनके प्रतिनिधि चर्चा से ज्यादा शोर-शराबे और हंगामे में रुचि ले रहे हैं। हर मिनट संसद चलाने में खर्च हो रहा है। आम आदमी के मुद्दे और आवाज संसद से गायब है। संसद में पक्ष-विपक्ष के बीच नूराकुश्ती जारी है।

उम्मीद थी कि संसद का मानसून सत्र हंगामाखेज होगा, क्योंकि पेपर लीक के अलावा, राम मंदिर में चंदा-चढ़ावा चोरी, ई-20 एथेनॉल विवाद, परिसीमन बिल, दल-बदल सरीखे मुद्दे जन-सरोकार, लोकतांत्रिक शुचिता और आम आदमी की आस्था से जुड़े थे। यह भी अपेक्षा की जा रही थी कि जन-सरोकार के इन मुद्दों पर संसद में सार्थक, संरचनात्मक चर्चा होगी, लेकिन पेपर लीक से जुड़े बिल पर ही हमारे सांसदों की विरोधाभासी राजनीति बेनकाब हो गई। 

संसद पहले ज्यादा चलती थी। धीरे-धीरे राजनीति बढ़ती गई। हंगामा बढ़ता गया। चर्चा घटती गई। भारत की पहली लोकसभा 14 सत्र में 3784 घंटे तक चली थी, अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो 1974 तक लगातार बैठकों की संख्या हर लोकसभा कार्यकाल में 100 से ज्यादा रहीं। 1974 के बाद 2011 तक केवल पांच बार ऐसा हुआ कि सदन में बैठकों की संख्या 100 के पार गई। पहली लोकसभा में 333 बिल पास हुए थे। 17वीं लोकसभा यानी पिछली लोकसभा में 2019 से 2024 के बीच 222 बिल पास हुए। इस बार संसद में हंगामे के बीच जनता के लिए जरूरी बिल पास हुए हैं, लेकिन विपक्ष की तरफ से बिना चर्चा किए हुए।

संसद के मॉनसून सत्र के पहले हफ्ते में भारी हंगामे और गतिरोध के कारण कामकाज बेहद कम हुआ है। सदन का अधिकांश समय हो-हल्ले में बीत गया। अहम बिंदु यह है कि संसद की प्रत्येक कार्यवाही पर करीब हर मिनट में ढाई लाख रुपये खर्च का अनुमान है। आसान भाषा में समझें तो एक घंटे में डेढ़ करोड़ रुपये खर्च हो जाता है। संसद सत्र के सात घंटों में एक घंटा लंच को हटाकर बचते हैं छह घंटे।

इन छह घंटों में दोनों सदनों में केवल विरोध, हल्ला और शोर होता है, जिसके कारण हर मिनट में ढाई लाख रुपये बर्बाद हो रहे हैं। संसद में हंगामा होने के कारण आम आदमी का ढाई लाख रुपये हर मिनट बर्बाद होता है। संसद में बैठने वाले 93 प्रतिशत सांसद करोड़पति हैं, जिन्हें अभी एक लाख 24 हजार रुपये हर महीने वेतन मिलता है। संसदीय क्षेत्र भत्ता 84 हजार रुपये होता है। दैनिक भत्ता सांसदों का 2500 रुपये है। वेतन भत्ता जोड़कर हर सांसद को हर महीने दो लाख 54 हजार रुपये जनता के पैसे से दिया जाता है। 

सरकार का यह आरोप रहता है कि विपक्ष बिना किसी ठोस प्रक्रिया के जानबूझकर सदन में हंगामा करता है और कार्यवाही बाधित करता है। वहीं विपक्ष का तर्क यह है कि सरकार उनकी आवाज़ को दबाना चाहती है और जनहित या राष्ट्रीय महत्व के जरूरी मुद्दों पर चर्चा से भागती है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सांसद देश के दूर-दूर के कोनों से अपने लोगों की बात रखने आते हैं। करोड़ों लोगों की उम्मीदों का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

विरोध आपका अधिकार है और मुद्दों पर सरकार से सवाल पूछना आपका कर्तव्य, लेकिन इस तरह संसद में ये सब करके आप किसका भला कर रहे हैं? सारा देश हमें देख रहा है, हम उस सदन में बैठे हैं, जहां देश के कई सबसे महान नेता कभी बैठते थे, उन्होंने देश के विकास की नींव रखी। हंगामे, शोर शराबे और नोक-झोंक के बीच लोकसभा में एंटी पेपरलीक संशोधन बिल ध्वनि-मत से पारित करना पड़ा। इस बिल पर 45 सांसदों ने, 10 से ज्यादा घंटे की बहस के दौरान, अपनी बात रखी और संशोधन भी पेश किए, लेकिन बिल पर मत-विभाजन तक नहीं कराया गया।

यह लोकतंत्र की सूक्ष्म एवं महत्वपूर्ण अनिवार्यता है। बिल ‘हां’ अथवा ‘ना’ के शोर में पारित नहीं कराया जाना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य और विडंबना है कि आज भी यही संसदीय व्यवस्था है। संसद में सार्थक चर्चा और बहस का होना लोकतंत्र की जीवंतता के लिए अनिवार्य है। यदि सदन में गंभीर संवाद के बजाय केवल हंगामा या बिना चर्चा के कानून पास होने की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो जनता का जवाबदेही और शासन प्रणाली से विश्वास उठने लगता है। वहीं बिना पर्याप्त चर्चा के पारित विधेयक लोकतांत्रिक संस्थाओं की गहराई और गंभीरता को कम करते हैं।

अहम सवाल यह है कि संविधान में संसद सत्र आयोजित किए जाने की जो व्यवस्था की गई है, क्या उसका मूल उद्देश्य पूर्ण हो पा रहा है? अगर किसी कानून या योजना को सक्षम एवं कारगर बनाने में विपक्ष की कोई भूमिका न हो, तो संसद की प्रासंगिकता क्या रह जाएगी? इसमें दो राय नहीं कि सदन को सुचारु रूप से चलाने की जिम्मेदारी सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की है। मगर जब विपक्ष कोई सवाल या समस्या उठाता है, तो उसका निराकरण करना सत्ता पक्ष का दायित्व होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता पक्ष अपनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकता। संसद के मॉनसून सत्र की अब तक की अवधि पर नजर डालें, तो हंगामा और कार्यवाही का स्थगन, इन्हीं दो बातों पर जोर दिया गया है।

ऐसा लगता है कि स्थगन, कार्यवाही का पर्याय बन गया है। विपक्ष नीट प्रश्नपत्र लीक के विरोध में प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों पर पुलिस कार्रवाई तथा राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मुद्दों को लगातार संसद में उठा रहा है और हंगामे के कारण दोनों सदनों की कार्यवाही बार-बार स्थगित हो जाती है। इस बीच महत्त्वपूर्ण विधेयक भी व्यापक चर्चा के बिना ही पारित हो जाते हैं। संसद में बने इस गतिरोध को दूर करने के बजाय आरोप-प्रत्यारोप के जरिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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