CWG 2026: ‘जिंदगी बदल जाएगी, पूरी ताकत लगा दो’… पिता की एक बात ने बदल दिया यशवीर का खेल, आखिरी थ्रो में जीता ब्रॉन्ज

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Edited By Muskan Dixit
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85.41 मीटर के करियर-बेस्ट थ्रो से यशवीर सिंह ने रचा इतिहास, सातवें स्थान से सीधे पोडियम पर पहुंचे; पिता राय सिंह खुद रह चुके हैं राष्ट्रीय स्तर के जैवलिन थ्रोअर

नई दिल्लीः कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय भाला फेंक एथलीट यशवीर सिंह की कांस्य पदक जीत सिर्फ एक शानदार थ्रो की कहानी नहीं है। इसके पीछे पिता की वर्षों की मेहनत, अधूरा सपना और आखिरी प्रयास से पहले कही गई एक ऐसी बात है, जिसने यशवीर को अपनी पूरी ताकत झोंकने के लिए प्रेरित कर दिया।

ग्लासगो में पुरुषों की जैवलिन थ्रो स्पर्धा के दौरान यशवीर के सामने पदक जीतने का आखिरी मौका था। छठे और अंतिम प्रयास से ठीक पहले उनके पिता और निजी कोच राय सिंह ने बेटे से कहा, “जिंदगी बदल जाएगी, पूरा जोर लगाना।”

यशवीर ने पिता की बात को मैदान पर उतारा और अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 85.41 मीटर का थ्रो कर दिया। इस एक प्रयास ने उन्हें सातवें स्थान से सीधे तीसरे स्थान पर पहुंचा दिया और भारत की झोली में कांस्य पदक आ गया।

छठे थ्रो में पलट दिया पूरा मुकाबला

24 वर्षीय यशवीर के लिए प्रतियोगिता का ज्यादा हिस्सा पदक की उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा था। तीसरे प्रयास में उन्होंने 81.33 मीटर का थ्रो किया और लास्ट राउंड से पहले वह सातवें स्थान पर थे।

इसके बाद आया छठा और अंतिम प्रयास। यशवीर ने रन-अप लिया और पूरी ताकत के साथ भाला फेंका। भाला 85.41 मीटर दूर जाकर गिरा। अपको बता दें की यह उनके करियर का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था और इसी थ्रो ने उन्हें कांस्य पदक भी दिला दिया।

इससे पहले यशवीर का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ 83.72 मीटर था। यानी ग्लासगो में उन्होंने अपने ही रिकॉर्ड को पीछे छोड़ा और 85 मीटर का आंकड़ा पार किया।

‘जिंदगी संवर जाएगी, दम लगाकर मारना’

यशवीर ने बताया की गेम से पहले उन्होंने अपने पिता राय सिंह से बात की थी। उनके पिता ने उनसे साफ शब्दों में एक लाइन कही यह मौका उसके करियर के लिए निर्णायक हो सकता है। पूरा जोर लगाना, जितनी तेजी से भाग सकता है भागना और जरूरत पड़े तो गिरने से भी न डरना। इस मौके को किसी भी कीमत पर हाथ से नहीं जाने देना है।

यशवीर ने भी पिता की बात को पूरी तरह अमल में उतारा और आखिरी प्रयास में ऐसा थ्रो किया, जिसने उन्हें पोडियम तक पहुंचा दिया।

पिता खुद रह चुके हैं राष्ट्रीय स्तर के जैवलिन थ्रोअर

यशवीर की सफलता में उनके पिता राय सिंह की भूमिका बेहद ही खास है। वह न सिर्फ उनके पिता हैं, बल्कि निजी कोच भी हैं। राय सिंह खुद भी पूर्व राष्ट्रीय स्तर के भाला फेंक खिलाड़ी रह चुके हैं।

उन्होंने वर्ष 2006 में संन्यास लेने से पहले राष्ट्रीय पदक और रेलवे चैंपियनशिप के खिताब जीते थे। इसके बाद वह खेल कोटे के तहत रेलवे में कोच बने। वह एनआईएस डिप्लोमा धारक भी हैं।

ग्लासगो के स्कॉटस्टोन स्टेडियम में राय सिंह दर्शक दीर्घा से अपने बेटे का मुकाबला देख रहे थे। रनवे के ठीक ऊपर से वह यशवीर के हर प्रयास पर नजर बनाए हुए थे।

बेटे की जीत में पूरा हुआ पिता का अधूरा सपना

यशवीर का कांस्य पदक उनके पिता के लिए सिर्फ बेटे की उपलब्धि नहीं है। राय सिंह के लिए यह उनके अपने अधूरे सपने के पूरा होने जैसा भी है।

उन्होंने बताया कि उन्होंने सीनियर राष्ट्रीय ओपन और राष्ट्रीय अंतर-राज्यीय प्रतियोगिताओं में पदक जीते हैं। रेलवे, दिल्ली और हरियाणा में भी उनके नाम रिकॉर्ड रहे हैं। हालांकि वह राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों में पदक नहीं जीत सके।

यही वजह थी कि वह चाहते थे कि उनका बेटा बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में भारत के लिए पदक जीते।

‘मैं चाहता था बेटा मेरा अधूरा सपना पूरा करे’

राय सिंह ने बताया कि उनके समय में कोचिंग, उपकरण और डाइट जैसी सुविधाओं की कमी थी। इसलिए उन्होंने कोशिश की कि यशवीर को अपने करियर में उन परेशानियों का सामना न करना पड़े।

उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी पूरी ताकत बेटे के करियर के पीछे लगा दी और परिवार ने भी यशवीर को पूरा सहयोग दिया।

यशवीर का जन्म और पालन-पोषण जयपुर में हुआ। वह भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं और अपने पिता के मार्गदर्शन में जैवलिन थ्रो में लगातार आगे बढ़े।

तीन पीढ़ियों से परिवार में एथलेटिक्स का जुनून

यशवीर की सफलता को उनके परिवार की खेल परंपरा से भी जोड़कर देखा जा सकता है। उनके परिवार की तीन पीढ़ियों में एथलेटिक्स के प्रति जुनून रहा है।

राय सिंह के पिता राष्ट्रीय स्तर पर 400 मीटर बाधा दौड़ के एथलीट थे। उनके छोटे भाई 110 मीटर बाधा दौड़ में हिस्सा लेते रहे हैं और रेलवे में कार्यरत हैं।

यशवीर के भाई उत्सव ने भी हाल में खेलो इंडिया विश्वविद्यालय खेलों में भाला फेंक में पदक जीता है।

नीरज चोपड़ा के साथ पोडियम पर खड़े हुए यशवीर

ग्लासगो में यशवीर की कांस्य पदक जीत का एक और खास पहलू रहा। वह पोडियम पर भारत के स्टार जैवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा के साथ खड़े नजर आए, जिन्होंने रजत पदक जीता।

यशवीर के लिए यह पल इसलिए भी खास रहा क्योंकि जिस भारतीय जैवलिन को दुनिया में नई पहचान देने में नीरज चोपड़ा की बड़ी भूमिका रही है, उसी पोडियम पर अब यशवीर ने भी अपना नाम दर्ज करा लिया।

एक आखिरी थ्रो, पिता की आवाज और 85.41 मीटर का जवाब—यशवीर सिंह की यह कांस्य पदक जीत भारतीय एथलेटिक्स की उन कहानियों में शामिल हो गई है, जहां मेहनत, परिवार और विश्वास ने मिलकर इतिहास रचा।

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