ड्यूटी के दौरान गंवाया पैर, लेकिन हौसला नहीं… सोमन राणा ने CWG 2026 में भारत को दिलाया ऐतिहासिक गोल्ड
भारतीय सेना के जवान सोमन राणा ने पुरुष एफ57 शॉटपुट में 13.40 मीटर के सर्वश्रेष्ठ थ्रो के साथ स्वर्ण पदक जीता; 2006 में ड्यूटी के दौरान दाहिना पैर गंवाने के बाद 2017 से शुरू की पैरा खेलों की तैयारी
ग्लासगो। कहते है कि अगर एक बार कुछ ठान लो तो दुनिया भी आपके इरादे भटका नहीं सकते... कुछ ऐसी ही कहानी हौसले, संघर्ष और मजबूती की है पैरा एथलीट सोमन राणा की जिन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीतया। भारतीय सेना में ड्यूटी के दौरान अपना दाहिना पैर गंवाने के बावजूद सोमन ने जीवन में कभी हार नहीं मानी। उन्होंने कृत्रिम पैर के साथ चलना सीखा, खेलों की तैयारी की और अब ग्लासगो में भारत के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स का गोल्ड जीतकर इतिहास रच दिया।
पुरुषों की एफ57 शॉटपुट स्पर्धा में सोमन ने 13.40 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो किया और गोल्ड मेडल अपने नाम किया। साल 2022 के एशियाई पैरा खेलों में रजत पदक जीत चुके सोमन की यह उपलब्धि उनके लंबे संघर्ष का ही बड़ा परिणाम है।
2006 में ड्यूटी के दौरान गंवाया दाहिना पैर
सोमन राणा ने बताया कि वह भारतीय सेना में सेवा कर रहे हैं। साल 2006 में ड्यूटी के दौरान उन्होंने अपना दाहिना पैर गंवा दिया। इसके बावजूद उन्होंने सेवा जारी रखी।
बाद में जब उन्हें पैरालंपिक खेलों के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद क्या अपने इरादों को मजबूत करके उन्होंने साल 2017 से पैरा खेलों की तैयारी शुरू कर दी।
सोमन के लिए यह सफर बिल्कुल आसान नहीं था। एक पैर गंवाने के बाद उन्हें कृत्रिम पैर के सहारे चलना सीखना पड़ा और इसके बाद उसी स्थिति में खेलों के लिए खुद को तैयार करना पड़ा।
‘एक पैर गंवाने के बाद बहुत मुश्किलें आईं’
सोमन ने बताया कि आम व्यक्ति को छोटी चोट के बाद भी चलने में परेशानी महसूस हो सकती है, जबकि उनके सामने कृत्रिम पैर के साथ चलने और फिर उसी के साथ खेलों में उतरने की चुनौती थी।
उन्होंने धीरे-धीरे इन मुश्किलों को पार किया और लगातार अभ्यास के जरिए खुद को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया। आज उनका वही संघर्ष उन्हें कॉमनवेल्थ गेम्स के पोडियम तक ले आया है।
दूसरे पैरा एथलीटों को देखकर मिली प्रेरणा
सोमन ने बताया कि शुरुआत में उन्हें खुद भी भरोसा नहीं था कि कृत्रिम पैर के साथ वह खेल पाएंगे। लेकिन दूसरे पैरा खिलाड़ियों को देखकर उनका आत्मविश्वास बढ़ा।
उन्होंने ऐसे खिलाड़ियों को देखा जिनके पूरे पैर नहीं थे, लेकिन वे इसके बावजूद खेलों में शानदार प्रदर्शन कर रहे थे। यही देखकर उनके मन में विश्वास पैदा हुआ कि अगर दूसरे खिलाड़ी इतनी कठिन परिस्थितियों के बावजूद आगे बढ़ सकते हैं तो वह भी ऐसा कर सकते हैं।
यहीं से सोमन ने अपने खेल सफर को आगे बढ़ाने की ठान ली।
परिवार, सेना, SAI और PCI को दिया सफलता का श्रेय
कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने के बाद सोमन राणा ने अपनी सफलता का श्रेय अपने परिवार, भारतीय सेना, भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) और पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया (PCI) को दिया।
उन्होंने कहा कि इन सभी ने उनके सफर के हर पड़ाव पर साथ दिया। मुश्किल समय में मिले सहयोग और हौसले ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी।
सोमन ने अपना स्वर्ण पदक उन सभी लोगों को समर्पित किया, जिन्होंने कठिन दौर में उनका हौसला बढ़ाया।
संघर्ष से स्वर्ण तक पहुंची सोमन की कहानी
सोमन राणा की कहानी सिर्फ एक खेल उपलब्धि नहीं बल्कि संघर्ष के बाद मिली सफलता की मिसाल है। 2006 में ड्यूटी के दौरान दाहिना पैर गंवाने से लेकर 2017 में पैरा खेलों की तैयारी शुरू करने और 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतने तक, उनका सफर बताता है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, मजबूत इरादे रास्ता बना सकते हैं।
भारतीय सेना के जवान से कॉमनवेल्थ गेम्स के गोल्ड मेडलिस्ट बने सोमन राणा अब देश के करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।
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