संपादकीय : शांति या रणनीति
पश्चिम एशिया की कूटनीति, इजराइल की भूमिका और भारत का रुख
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान और पश्चिम एशिया में शांति समझौते का दावा किया है, लेकिन क्या इसके पीछे कोई नई कूटनीतिक रणनीति है? इस वैश्विक घटनाक्रम, मध्य-पूर्व की राजनीति और भारत के रुख पर पढ़ें अमृत विचार का विशेष संपादकीय।
पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध और कूटनीति के दोराहे पर खड़ा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह दावा कि अमेरिका, ईरान और क्षेत्रीय देशों के बीच युद्ध समाप्ति के लिए प्रस्तावित समझौते की रूपरेखा लगभग तैयार है, पहली दृष्टि में राहत देने वाला प्रतीत होता है, किंतु इस घोषणा के साथ ही अमेरिकी दूतावासों द्वारा पश्चिमी एशियाई देशों के लिए सुरक्षा चेतावनियां जारी होना और ईरान का सतर्क रुख यह बताता है कि फिलहाल यह शांति की घोषणा नहीं, बल्कि संभावित समझौते की राजनीतिक भूमिका भर है। ट्रंप के वक्तव्यों का इतिहास इस आशंका को और गहराता है।
पिछले कुछ महीनों में उन्होंने कई बार हमले की चेतावनी दी, फिर उन्हें स्थगित किया और तत्पश्चात नई वार्ता का दावा किया। इसी कारण उनकी घोषणाओं को अंतिम नीति के बजाय वार्ताकालीन दबाव की रणनीति के रूप में देखना अधिक उचित होगा। जब तक समझौते का आधिकारिक दस्तावेज, हस्ताक्षरकर्ता और क्रियान्वयन तंत्र सामने नहीं आता, तब तक इस पर पूर्ण विश्वास कठिन है। सवाल यह भी कि समझौता किन पक्षों के बीच होगा। यदि यह केवल अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और होर्मुज जलडमरूमध्य तक सीमित रहता है तो क्षेत्रीय संघर्षों का समाधान नहीं होगा। पश्चिम एशिया की अस्थिरता का केंद्र केवल तेहरान और वाशिंगटन नहीं हैं। इजराइल, हूती, हमास, हिजबुल्लाह तथा विभिन्न शिया-सुन्नी गुट भी इस समीकरण के निर्णायक पक्ष हैं। इनमें से कोई भी यदि समझौते का हिस्सा नहीं बनता तो स्थायी शांति की संभावना सीमित ही रहेगी। यही कारण है कि ट्रंप का यह कहना कि वह ‘बेहतर भविष्य और समृद्ध ईरान’ के लिए यह कदम उठा रहे हैं, विरोधाभासी प्रतीत होता है। कुछ महीने पहले तक वही प्रशासन ईरान पर कठोर प्रतिबंध, सैन्य कार्रवाई और अधिकतम दबाव की नीति का समर्थक था। अब यदि तेल निर्यात पर छूट, नौसैनिक नाकाबंदी में ढील और वार्ता की बात हो रही है, तो यह केवल सद्भावना नहीं, बल्कि ऊर्जा बाजार, वैश्विक महंगाई और अमेरिकी रणनीतिक हितों की मजबूरी भी है। इजराइल का प्रश्न सबसे जटिल है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि इजराइल अमेरिकी सुरक्षा समन्वय में है, लेकिन इजराइल ने सार्वजनिक रूप से किसी व्यापक समझौते की पुष्टि नहीं की है। यदि तेल मार्ग खुल भी जाएं और अमेरिका-ईरान संवाद आगे बढ़े, तब भी इजराइल अपने सुरक्षा हितों के विरुद्ध किसी व्यवस्था को स्वीकार करेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। ईरान का यह कहना कि वह अमेरिकी घोषणा से न तो चकित है और न ही सतर्कता कम कर रहा है, वस्तुतः उसकी रणनीतिक नीति का संकेत है। तेहरान बातचीत भी जारी रखना चाहता है और सैन्य तैयारी भी। यह ‘वार्ता के साथ प्रतिरोध’ की वही नीति है, जिसे उसने वर्षों से अपनाया है।
भारत के लिए इस समय सबसे संतुलित नीति यही होगी कि वह किसी एक पक्ष का प्रचारक बनने के बजाय संवाद, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता का समर्थक बना रहे। भारत के हित सस्ते तेल, खुले होर्मुज, क्षेत्रीय स्थिरता और अपने नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े हैं, इसलिए नई दिल्ली को स्वागत और सतर्कता—दोनों का संतुलन बनाए रखना चाहिए।
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