संपादकीय : सजा से आगे सुधार

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Edited By Pradeep Kumar
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परीक्षाओं में सेंधमारी रोकने के लिए नया बिल, क्या छात्रों को मिलेगा इंसाफ?

पेपर लीक और धांधली रोकने के लिए लोकसभा में पारित नए संशोधन विधेयक पर पढ़ें विशेष संपादकीय। जानें क्या सिर्फ कड़ी सजा से रुकेगा अपराध या तकनीक और 'जीरो ट्रस्ट' व्यवस्था से होगा असली सुधार।

लोकसभा से ध्वनिमत से पारित लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 लोकसभा में पारित होना स्वागत योग्य है, पर यह एक असहज प्रश्न भी खड़ा करता है— जब 2024 में इसी उद्देश्य से केंद्रीय कानून बनाया गया था, तो महज दो वर्ष में उसे कठोर बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? उत्तर कानून की अनुपस्थिति में नहीं, उसके अपर्याप्त प्रतिरोध और क्रियान्वयन में है। मई में नीट-2026 रद्द कर दोबारा कराना पड़ा। यानी कानून मौजूद था, फिर भी संगठित गिरोह परीक्षा व्यवस्था में सेंध लगाने में सफल रहे। बेशक, 2024 का कानून कमजोर नहीं था। उसमें व्यक्तिगत अपराध के लिए तीन से पांच वर्ष कैद और दस लाख रुपये तक जुर्माना था तथा संगठित अपराध और सेवा प्रदाताओं के लिए कठोर प्रावधान थे।

नया विधेयक व्यक्तिगत अपराध में सजा पांच से दस वर्ष और जुर्माना पचास लाख रुपये तक करता है। संगठित अपराध में न्यूनतम कैद पांच से बढ़ाकर सात वर्ष और न्यूनतम जुर्माना एक करोड़ से दस करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव है। सेवा प्रदाताओं पर अधिकतम जुर्माना पांच करोड़ और परीक्षा संचालन से प्रतिबंध चार से आठ वर्ष किया गया है। यह वृद्धि जरूरी प्रतिरोध पैदा कर सकती है, खासकर वहां, जहां पेपर लीक लाखों-करोड़ों के संगठित कारोबार में बदल चुका हो, लेकिन अपराधशास्त्र का पुराना सबक है कि अपराधी केवल सजा की कठोरता से नहीं, पकड़े जाने और शीघ्र दंडित होने की निश्चितता से अधिक डरता है, इसीलिए संशोधन की अधिक महत्वपूर्ण विशेषता फास्ट-ट्रैक जांच, विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतें, विशेष लोक अभियोजक और अपीलों के समयबद्ध निस्तारण की व्यवस्था है, हालांकि कानून में समय सीमा लिख देना पर्याप्त नहीं; दूसरे विशेष कानूनों में भी समयबद्ध जांच के बावजूद बड़ी संख्या में मामले महीनों लंबित रहते हैं। कठोर कानून मुख्यतः पेपर लीक होने के बाद करेगा, जबकि विद्यार्थी चाहता है कि प्रश्नपत्र लीक ही न हो, इसलिए नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में गठित उच्चस्तरीय परीक्षा-सुधार कार्यबल अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। इसमें तकनीक, सुरक्षा, प्रशासन और परीक्षा संचालन से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हैं।

सुरक्षित डिजिटल वितरण, सीमित मानव पहुंच, ऑडिट ट्रेल, परीक्षा केंद्रों का प्रमाणीकरण और जवाबदेही की स्पष्ट श्रृंखला जैसे उपाय ही रिसाव के अवसर घटा सकते हैं। दुर्भाग्य यह रहा कि संसद में इस बहस का सार्थक उपयोग नहीं हुआ। सत्ता-विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप ने विधेयक के गुण-दोष पर गंभीर विमर्श को पीछे धकेल दिया। इससे भी बड़ा प्रश्न उस नैतिक पतन का है, जिसमें योग्यता को छल से खरीदना स्वीकार्य होने लगता है। कानून अपराध रोक सकता है, ईमानदारी पैदा नहीं कर सकता।

नए कानून के बाद निश्चिंत होने का समय नहीं है। सजा, शीघ्र जांच और फास्ट-ट्रैक अदालतें आवश्यक हैं, पर पर्याप्त नहीं। परीक्षा सुरक्षा को साइबर सुरक्षा जैसी 'जीरो ट्रस्ट' व्यवस्था बनाना होगा— हर चरण सत्यापित, हर पहुंच दर्ज और हर जिम्मेदारी तय। प्रश्नपत्र तभी सुरक्षित होगा जब कानून अपराधी को डराए, तकनीक चोरी का रास्ता बंद करे और व्यवस्था बेईमानी को अवसर ही न दे। तभी विद्यार्थी आश्वस्त होगा कि उसकी मेहनत किसी माफिया की कीमत पर नहीं बिकेगी।

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