संपादकीय : बल की लक्ष्मणरेखा

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Edited By Pradeep Kumar
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और लोकतांत्रिक समाज में भीड़ नियंत्रण के तरीके

संपादकीय: दिल्ली में नीट विवाद के दौरान भीड़ नियंत्रण के लिए पुलिस द्वारा पैलेट गन के इस्तेमाल और बल प्रयोग की 'लक्ष्मणरेखा' पर पढ़ें आज का विशेष लेख।

लोकतंत्र में भीड़ नियंत्रण राज्य की आवश्यकता है, किंतु बल प्रयोग उसकी सुविधा नहीं, अंतिम विवशता होनी चाहिए। दिल्ली में नीट विवाद को लेकर 20 जुलाई के प्रदर्शन में रैपिड एक्शन फोर्स द्वारा पैलेट गन के इस्तेमाल से गंभीर सवाल इसीलिए खड़े हुए। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार कार्रवाई वरिष्ठ स्तर के पुलिस अधिकारी के निर्देश पर हुई, सात राउंड फायर हुए। केंद्रीय सुरक्षा बल की समीक्षा में कार्रवाई को एसओपी के अनुरूप और गैर-घातक साधनों के प्रयोग को अधिकृत बताया गया है, लेकिन कानूनी अनुमति और परिस्थितिजन्य औचित्य दो अलग कसौटियां हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने पैलेट गन पर तत्काल पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार करते हुए ठीक कहा कि मौजूदा नियम असाधारण परिस्थितियों में इनके इस्तेमाल की अनुमति देते हैं। असली प्रश्न यही है कि परिस्थिति को 'असाधारण' कौन घोषित करेगा और बाद में उस निर्णय की स्वतंत्र जांच कैसे होगी? भीड़ का हिंसक होना, पुलिस पर पथराव या किसी भी तरह से उस पर हमला निश्चित रूप से गंभीर है; फिर भी प्रत्येक बल-प्रयोग आवश्यकता, आनुपातिकता और न्यूनतम क्षति की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। उपलब्ध रिपोर्टों में प्रदर्शनकारियों द्वारा सुरक्षा बलों पर हमले का उल्लेख है, लेकिन इससे स्वतः सिद्ध नहीं होता कि पैलेट चलाना अपरिहार्य था। ग्रेडेड रिस्पॉन्स का अर्थ है चेतावनी, संवाद, बैरिकेडिंग, नियंत्रित निकासी, पानी की बौछार, आंसू गैस और अन्य कम हानिकारक उपायों के बाद ही अधिक जोखिम वाला साधन अपनाना, इसलिए जांच का केंद्र यह होना चाहिए कि पैलेट चलाने से पहले कौन-कौन से विकल्प आजमाए गए, आदेश किस आधार पर दिया गया, फायरिंग की दिशा और दूरी क्या थी और लक्ष्य भीड़ को हटाना था या व्यक्तियों को निशाना बनाना। विवाद इसलिए भी बड़ा है, क्योंकि 'नॉन-लीथल' शब्द भ्रामक सुरक्षा-बोध पैदा करता है। पैलेट आंख, चेहरे, नसों और महत्वपूर्ण अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं; निकट दूरी पर खतरा और बढ़ता है। कश्मीर में इनके प्रयोग से जुड़ी गंभीर नेत्र-चोटों ने पहले ही चेताया है कि भीड़ नियंत्रण में ऐसा हथियार लोकतांत्रिक समाज के लिए अंतिम विकल्प होना चाहिए। केंद्र और रैपिड एक्शन फोर्स के महानिरीक्षक को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस दोषसिद्धि नहीं, बल्कि जवाब और रिकॉर्ड मांगने की न्यायिक प्रक्रिया है। हथियारों और गोला-बारूद के लॉग सुरक्षित रखने का आदेश महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे किस जवान को कौन-सा हथियार मिला, कितने राउंड जारी और खर्च हुए तथा घटनाक्रम आधिकारिक दावों से मेल खाता है या नहीं, जांचा जा सकेगा।

सच तो यह है कि भारत को अब औपनिवेशिक लाठी-गोली मानसिकता से आगे बढ़ना चाहिए। आवश्यकता है कि प्रशिक्षित वार्ताकार, बॉडी कैमरे, ड्रोन आधारित भीड़-आकलन, बेहतर बैरिकेड, मोबाइल सार्वजनिक संदेश प्रणाली, सुरक्षित निकासी गलियारे और कम चोट पहुंचाने वाली प्रमाणित तकनीकें पुलिस प्रशिक्षण का हिस्सा बनें। हर गंभीर बल-प्रयोग की समयबद्ध स्वतंत्र समीक्षा, आदेश की रिकॉर्डिंग और घायल नागरिकों की तत्काल चिकित्सा भी अनिवार्य हो। पुलिस की सुरक्षा और नागरिक का प्रदर्शन-अधिकार परस्पर विरोधी नहीं हैं।