संपादकीय : संघर्ष के बीच संवाद
पश्चिम एशिया में युद्ध के बीच कूटनीति की उम्मीद, भारत पर क्या होगा असर?
'संघर्ष के बीच संवाद' संपादकीय में पढ़ें अमेरिका-ईरान तनाव और मध्य पूर्व संकट का सटीक विश्लेषण। लाल सागर व्यापार में बाधा, वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत की ऊर्जा सुरक्षा नीति के लिए इसका क्या अर्थ है।
पश्चिम एशिया में युद्ध की आग के बीच ईरान और अमेरिका को फिर वार्ता की मेज तक लाने की कोशिशें उम्मीद की क्षीण, लेकिन महत्वपूर्ण किरण हैं। कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता पहले ही जून में अमेरिका-ईरान वार्ता के लिए उच्चस्तरीय समिति और परमाणु, प्रतिबंध तथा निगरानी संबंधी कार्य समूहों का ढांचा तैयार करा चुकी है। हाल में हमलों में आए अस्थायी विराम ने फिर कूटनीति की गुंजाइश बनाई है। मगर इसे शांति की शुरुआत समझना जल्दबाजी होगी।
दोनों पक्षों के पास युद्धविराम की ओर लौटने के ठोस कारण हैं। लंबे संघर्ष की आर्थिक-सैन्य कीमत अमेरिका के लिए बढ़ रही है, जबकि ईरान पर सैन्य दबाव, आर्थिक क्षति और समुद्री व्यापार बाधित होने का बोझ है। तेल की कीमतों ने भी चेतावनी दी है कि युद्ध की प्रत्येक नई लहर विश्व अर्थव्यवस्था को झटका दे सकती है। अमेरिकी हमलों में विराम के बाद कच्चे तेल का भाव का 8.7 प्रतिशत गिरकर 88.36 डॉलर प्रति बैरल पहुंचना बताता है कि बाजार भी युद्ध से अधिक समझौते की प्रतीक्षा कर रहा है। कतर उपयोगी मध्यस्थ है, क्योंकि उसके वाशिंगटन और तेहरान दोनों से संवाद के रास्ते हैं। पाकिस्तान भी ईरान का पड़ोसी और अमेरिका के संपर्क वाला देश होने के कारण संदेशवाहक बन सकता है, हालांकि मध्यस्थ बातचीत करा सकते हैं, राजनीतिक इच्छाशक्ति पैदा नहीं कर सकते। असली प्रश्न परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध, होर्मुज की व्यवस्था और क्षेत्रीय सशस्त्र समूहों को लेकर स्वीकार्य समझौता खोजने का है। सबसे बड़ी बाधा है कि युद्ध केवल अमेरिका और ईरान के बीच सीमित नहीं है। ईरान-संबद्ध सशस्त्र समूह सक्रिय हैं, वे सऊदी तेल प्रतिष्ठानों और अमेरिकी हितों पर ड्रोन हमले कर रहे हैं, लाल सागर में सऊदी जहाजरानी को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में वाशिंगटन के लिए तेहरान से समझौता करना तब तक कठिन रहेगा, जब तक ईरान क्षेत्रीय समूहों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल तनाव घटाने में करता दिखाई नहीं देता। दूसरी ओर, तेहरान इन समूहों को अपनी रणनीतिक सुरक्षा का हिस्सा मानता है। यही विरोधाभास युद्धविराम की सबसे कमजोर कड़ी है। कूटनीतिक सफलता इस पर निर्भर करेगी कि अमेरिका सुरक्षा और परमाणु आशंकाओं पर व्यवहारिक समझौता करे, ईरान समुद्री मार्गों को दबाव का हथियार बनाने से पीछे हटे और क्षेत्रीय समूह हथियार शांत करें।
होर्मुज बाधित हो और लाल सागर का वैकल्पिक रास्ता भी संकटग्रस्त रहे, तो मामला केवल सैन्य टकराव नहीं, वैश्विक ऊर्जा और व्यापार सुरक्षा का संकट बन जाता है, इसलिए ईरान, सऊदी अरब और ओमान के विदेश मंत्रियों के बीच होर्मुज की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर संवाद महत्वपूर्ण है। भारत को युद्ध विराम की उम्मीद अवश्य रखनी चाहिए, लेकिन ऊर्जा नीति को उसकी सफलता पर निर्भर नहीं करना चाहिए। सरकार पहले ही आपूर्ति स्रोतों के विविधीकरण, पर्याप्त भंडार और 24 घंटे निगरानी व्यवस्था पर जोर दे चुकी है। युद्धविराम संभव है, शांति अभी दूर है, इसलिए भारत की रणनीति तीन दिशाओं में होनी चाहिए— ईरान, अमेरिका और खाड़ी देशों से समानांतर कूटनीति; कच्चे तेल, एलएनजी और एलपीजी के स्रोतों तथा समुद्री मार्गों का अधिक विविधीकरण और संकट लंबा खिंचने की स्थिति के लिए रणनीतिक भंडार तथा वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था मजबूत करना।
