संपादकीय : पदक के पार
राष्ट्रमंडल खेल 2026: कुश्ती और हॉकी बाहर होने से भारत को नुकसान, ग्लासगो में क्या होंगी चुनौतियां?
'पदक के पार' संपादकीय में पढ़ें भारतीय खेलों का सटीक विश्लेषण। कुश्ती-हॉकी जैसे खेलों के बाहर होने के बाद ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल 2026 में भारत के सामने क्या चुनौतियां होंगी और किन खेलों पर टिकी है उम्मीद?
मीराबाई चानू का चोटों, पुनर्वास और वर्षों तक अपेक्षाओं का भार उठाने के बाद महिलाओं के 48 किलोग्राम भारोत्तोलन के वर्ग में तीन राष्ट्रमंडल खेलों में लगातार स्वर्ण जीतना, उन्हें भारतीय खेल की उन विरल हस्तियों में खड़ा करता है, जिनके लिए जीत अपवाद नहीं, आदत बन चुकी है। चानू की स्वर्णिम उपलब्धि के उस पार यह बड़ा सवाल खड़ा है कि क्या भारत ऐसी और भी ‘मीराबाई’ तैयार कर रहा है?
किसी देश की खेल शक्ति एक-दो महान खिलाड़ियों से नहीं, उनके पीछे तैयार दूसरी और तीसरी पंक्ति से मापी जाती है। ऋषिकांत सिंह चानमबम का पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में रजत लाना भारोत्तोलन में भारतीय प्रतिभा का प्रमाण है। घुटने की चोट के बावजूद उनका प्रदर्शन बताता है कि भारतीय भारोत्तोलन केवल एक सितारे पर निर्भर नहीं है। नीरज चोपड़ा से बहुत उम्मीद है, लेकिन नीरज की संभावित सफलता का वास्तविक मूल्य तभी है, जब उनके पीछे विश्व स्तरीय भाला फेंक खिलाड़ियों की स्थायी श्रृंखला खड़ी हो। साफ है कि मीराबाई चानू का तीसरा स्वर्ण उत्सव के साथ संदेश भी है— भारत को अब महान खिलाड़ियों पर गर्व करने से आगे बढ़कर महान खिलाड़ियों की पीढ़ियां तैयार करनी होंगी। भारत को अब क्रिकेट बनाम अन्य खेलों की बहस से आगे बढ़ना होगा। दूसरे खेलों के लिए ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है, जिसमें प्रतिभा खोज से लेकर पोषण, खेल विज्ञान, प्रशिक्षक, पुनर्वास और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा तक खिलाड़ी को निरंतर संस्थागत सहारा मिले। स्कूल स्तर पर खेल सुविधाएं, जिला स्तर पर प्रतिभा पहचान, प्रशिक्षकों की गुणवत्ता, खेल विज्ञान, महिला खिलाड़ियों के लिए सुरक्षित वातावरण, चोट प्रबंधन और खिलाड़ियों की आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा एक ही तंत्र के हिस्से बनने चाहिए। सरकारी योजनाओं के साथ विश्वविद्यालयों, कॉरपोरेट क्षेत्र और पेशेवर लीगों को भी दीर्घकालिक खिलाड़ी-विकास में जोड़ना होगा।
ग्लासगो की चुनौती असाधारण है। 2022 के बर्मिंघम खेलों में भारत 22 स्वर्ण सहित 61 पदकों के साथ चौथे स्थान पर था। इस बार भारत के परंपरागत पदक-स्रोत कुश्ती, बैडमिंटन, हॉकी, क्रिकेट और स्क्वैश वगैरह कई खेल कार्यक्रम से बाहर हैं। देश के परंपरागत छह खेलों ने बर्मिंघम में भारत को 30 पदक दिए थे। अर्थात पिछली पदक-संख्या से सीधी तुलना करें, तो भारत के लगभग आधे पिछले पदकों का आधार इस बार मौजूद नहीं है। ऐसे में भारोत्तोलकों का मजबूत आरंभ विशेष महत्व रखता है। ग्लासगो 2026 का कार्यक्रम 2022 के 19 खेलों से घटाकर केवल 10 खेलों तक सीमित होने के चलते 2022 की पदक तालिका से तुलना करते समय बदले हुए कार्यक्रम को ध्यान में रखना होगा, हालांकि लॉन बॉल्स में बर्मिंघम की सफलता ने दिखाया था कि भारत नए खेलों में भी पदक-स्रोत विकसित कर सकता है। इस बार मजबूत एथलेटिक्स दल से खास उम्मीद है।
इन सब के बावजूद बहुत संभव है कि ग्लासगो में भारत शायद बर्मिंघम के 61 पदकों तक न पहुंचे; लेकिन इस बार सफलता की सही कसौटी पदकों की संख्या भर नहीं होगी। यदि भारोत्तोलन के साथ एथलेटिक्स, मुक्केबाजी, जूडो और दूसरे अपेक्षाकृत नए क्षेत्रों से अधिक खिलाड़ी पोडियम तक पहुंचते हैं, तो कम पदकों के बावजूद भारतीय खेल अधिक मजबूत होकर लौट सकता है।
