संपादकीय : बल नहीं, संवाद चाहिए
प्रदर्शनकारी अपराधी नहीं, पुलिस बल प्रयोग और संवैधानिक अधिकारों पर विशेष लेख
शांतिपूर्ण आंदोलन पर पुलिस ज्यादती को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर पढ़ें अमृत विचार का विशेष संपादकीय। जानें लोकतंत्र में संवाद का महत्व क्या है और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग के क्या मानक होने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि मात्र आंदोलन होने से पुलिस ज्यादती या लाठीचार्ज को उचित नहीं ठहराया जा सकता, भारतीय लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक संदेश है। इसका मंतव्य पुलिस के हाथ बांधना नहीं, बल्कि राज्य को याद दिलाना है कि असहमति अपराध नहीं और आंदोलन अपने आप में कानून-व्यवस्था का संकट नहीं होता। संविधान शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति का अधिकार देता है, इसलिए सरकारों को विरोधी को शत्रु और प्रदर्शनकारी को अपराधी समझना बंद करना होगा। लोकतंत्र की परीक्षा शांत दिनों में नहीं, असहमति के क्षणों में होती है, इसलिए प्रदर्शनकारी नागरिक और हिंसक उपद्रवी के बीच फर्क किए बिना बल प्रयोग लोकतांत्रिक शासन के बजाय दमनकारी मानसिकता का परिचायक बन सकता है। अदालत की टिप्पणी अभी अंतिम फैसला नहीं है, इसलिए यह कोई बाध्यकारी नजीर तो नहीं, लेकिन यदि आगामी निर्णय में आवश्यकता, आनुपातिकता, जवाबदेही और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को स्पष्ट कसौटियों में बदला गया, तो यह भविष्य में पुलिस कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण न्यायिक मानक बन सकता है। इससे पैलेट गन, गंभीर चोट पहुंचाने वाले साधनों या अनावश्यक लाठीचार्ज जैसे उपायों पर स्वतः पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगेगा, लेकिन सरकारों के लिए उनके इस्तेमाल को उचित ठहराना कठिन अवश्य होगा।
समस्या यह है कि हमारे यहां आंदोलन से निपटने का पहला औजार अक्सर संवाद नहीं, पुलिस बन जाती है। बैरिकेड, हिरासत, एफआईआर, धरपकड़ और बल प्रयोग राजनीतिक प्रबंधन का विकल्प बनने लगते हैं। आंदोलन समाप्त होने के बाद भी मुकदमे जारी रखना और बिना न्यायिक निष्कर्ष प्रदर्शनकारियों को 'असामाजिक तत्व' बताकर उनके चेहरे सार्वजनिक करना कानून के शासन से अधिक सार्वजनिक दंड जैसा दिखाई देता है। सरकार द्वारा आंदोलनकारियों के मुकदमे वापस लेने के आश्वासन देने के बाद ऐसी कार्रवाई, भरोसे और शासन की विश्वसनीयता, दोनों को चोट पहुंचाती है। पर आंदोलनकारियों को मनमानी की छूट देना भी उचित नहीं। शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार आगजनी, पत्थरबाजी, सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़ अथवा पुलिस पर हमले का अधिकार नहीं देता। अदालत को नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा के साथ पुलिसकर्मियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी।
देश को शांतिपूर्ण आंदोलनों से निपटने के लिए समान न्यूनतम प्रोटोकॉल चाहिए। यह पुलिस को राजनीतिक दबाव और मनमाने आदेशों से बचाकर पेशेवर बनाएगा। पुलिस को भीड़ नियंत्रण के साथ मनोविज्ञान, संवाद, मध्यस्थता, तनाव घटाने और मानवाधिकारों का विशेष प्रशिक्षण मिलना चाहिए। पहले बातचीत, फिर चेतावनी, सुरक्षित निकास और नियंत्रित अवरोध; बल प्रयोग केवल अंतिम विकल्प हो। जहां बल अपरिहार्य हो, वहां वह न्यूनतम, आनुपातिक और बाद में स्वतंत्र समीक्षा के योग्य होना चाहिए। तकनीक का उपयोग भी पहचान उजागर कर अपमानित करने के बजाय जवाबदेही सुनिश्चित करने में हो।
छात्र आंदोलनों में कथित पुलिस ज्यादती से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के समय अदालत की मौजूदा सोच महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि अवश्य बनेगी, हालांकि फैसला तथ्यों और कानून पर होगा।
