संपादकीय : इस्तीफे के बाद

Amrit Vichar Network
Edited By Pradeep Kumar
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छात्र आंदोलन की जीत, लेकिन 116 पेपर लीक के बाद अब कैसे लौटेगा परीक्षा प्रणाली पर भरोसा?

पढ़ें आज का संपादकीय 'इस्तीफे के बाद'। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से सरकार को राजनीतिक राहत तो मिली है, लेकिन नए शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी के सामने छात्रों का भरोसा जीतने और परीक्षा व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की बड़ी चुनौती है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा 36 दिनों से चल रहे छात्र आंदोलन के लिए बड़ी उपलब्धि और सरकार के लिए तत्काल राजनीतिक राहत है। आंदोलन की प्रमुख मांग पूरी होने तथा प्रदर्शनकारियों पर मुकदमों और प्रभावित परिवारों के मुआवजे जैसे मुद्दों पर सरकार के आश्वासन के बाद आंदोलन भी वापस ले लिया गया, लेकिन महज एक इस्तीफे को ही परीक्षा-संकट का समाधान मान लेना बड़ी भूल होगी। सवाल स्वाभाविक है कि जो निर्णय 25 जुलाई को हुआ, वह 20 जुलाई की टकरावपूर्ण घटनाओं से पहले या ठीक उसके बाद क्यों नहीं हो सकता था? समय रहते राजनीतिक उत्तरदायित्व स्वीकार किया जाता तो सरकार इसे दबाव में झुकने के बजाय संवेदनशीलता और जवाबदेही के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर सुर्खरू बन सकती थी। देर ने आंदोलन को राष्ट्रीय फलक पर फैलने, नैतिक बल और विपक्ष को संसदीय हथियार दिया।

इस्तीफा विपक्ष द्वारा संसद में इस मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाने और आंदोलन के राजनीतिक संकट बनने की पृष्ठभूमि में आया है। राजनीति में निर्णय निर्वात में नहीं होते। आंदोलन का दूसरे क्षेत्रों में विस्तार, युवाओं में असंतोष, विपक्ष का समर्थन, संसद में गतिरोध और 20 जुलाई के बाद बढ़ा तनाव निश्चित रूप से सरकार की राजनीतिक लागत बढ़ा रहे थे। ऐसे में इस्तीफा नैतिक उत्तरदायित्व के साथ राजनीतिक क्षति-नियंत्रण भी है। लगभग 70 दिन पुरानी राजनीतिक पहल यदि 36 दिन के आंदोलन से केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा हासिल कर सकती है, तो इसका यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि संगठित सड़क-दबाव से सरकार को किसी भी मुद्दे पर झुकाया जा सकता है, हालांकि लोकतंत्र में सरकार यदि शिकायत सुनने के औपचारिक रास्ते बंद रखेगी, तो सड़क ही संवाद का मंच बनेगी। वहीं आंदोलनों को भी समझना होगा कि लोकतांत्रिक विजय का अर्थ हर नीति को भीड़ के दबाव से बदलवाना नहीं है।

असल कसौटी अब परीक्षा व्यवस्था है। प्रश्नपत्र सुरक्षा में सेंध महज प्रशासनिक त्रुटि नहीं, लाखों युवाओं के समय, धन और भविष्य पर प्रहार है। 2014 से अब तक ‘116 पेपर लीक’ का आंकड़ा विभिन्न संकलनों में बताया जाता है, संख्या जो भी हो, लगातार सामने आए प्रकरण बताते हैं कि समस्या व्यक्तियों से बड़ी है, इसलिए नए शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी के सामने सबसे पहला काम परीक्षा प्रणाली में छात्रों का विश्वास लौटाना है। प्रश्नपत्र निर्माण से परीक्षा केंद्र तक एंड-टू-एंड सुरक्षा, डिजिटल ट्रैकिंग, एजेंसियों का स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट, जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही, समयबद्ध जांच और सार्वजनिक अनुपालन रिपोर्ट आवश्यक हैं। केवल दोषियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं; ऐसी व्यवस्था चाहिए, जिसमें प्रश्नपत्र चुराना कठिन और पकड़ा जाना लगभग निश्चित हो।

इस इस्तीफे से मानसून सत्र में सरकार को तत्काल राहत अवश्य मिलेगी और विधायी कामकाज की गुंजाइश बढ़ सकती है, लेकिन विपक्ष का दबाव समाप्त नहीं हुआ है। सरकार की छवि भी इस्तीफे से नहीं, उसके बाद होने वाले सुधारों से बदलेगी। इस पूरे प्रकरण का सही निष्कर्ष यह नहीं कि आंदोलन ने सरकार को झुका दिया, बल्कि यह होना चाहिए कि लोकतंत्र ने सत्ता को जवाबदेह बनाया। अब सरकार को साबित करना है कि उसने केवल मंत्री बदला है या व्यवस्था भी बदलेगी।