अकेले हैं तो क्या गम है, सपने पूरे करने का दम है

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
On

सोलो-मैक्सिंग आज के महानगरीय जीवन की एक उभरती हुई लाइफस्टाइल है, जो युवा पीढ़ी को व्यक्तिगत खुशी, मानसिक शांति, करियर और आत्म-विकास पर पूरा ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित कर रही है। पश्चिमी देशों से आए इस चलन को देश में भी युवा तेजी से अपना रहे हैं। इसकी वजह यह है कि इस तरह की लाइफस्टाइल उन्हें शादी जैसे पारंपरिक बंधन या बनावटी रिश्तों और डेटिंग के तनाव से बचाकर आत्मनिर्भरता की ओर ले जाती है। ‘मैक्सिंग’ का अर्थ है किसी चीज को उसकी क्षमता या योग्यता की सीमा तक पहुंचाना या उसे उसकी पूर्ण सीमा तक ले जाना। 

सोशल मीडिया और इंटरनेट की दुनिया में अब इस शब्द को जीवन के किसी विशेष पहलू को अधिकतम या सर्वोत्तम बनाने का प्रयास करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। दरअसल युवाओं के बीच डेटिंग से बढ़ती थकान और रिश्तों में निराशा के बीच आधुनिक दुनिया में ‘सोलो-मैक्सिंग’ एक नए शब्द के रूप में जुड़ गया है। अकेले रहने की इस महत्वाकांक्षी जीवनशैली को चुनने और उसके जरिए अपनी पूरी क्षमता या सफलता हासिल करने की यह प्रवृत्ति व्यक्तिपरक लाइफस्टाइल को एड्रेस करती है। रिश्तों को लेकर नया दृष्टिकोण विकसित होने के साथ अकेले रहना यानी सोलो-मैक्सिंग बदलती प्राथमिकताओं के प्रतिबिंब के रूप में उभर रहा है, और इसे अपनाने वाले युवा आत्म विकास और स्वतंत्रता को अपने जीवन के केंद्र में रख रहे हैं

करियर और निजी जीवन को सर्वोच्च प्राथमिकता

Glam World (1)

सामाजिक सर्वेक्षणों के अनुसार देश के महानगरीय और शहरी क्षेत्रों में अकेले रहने वाले ऐसे युवाओं और युवतियों का प्रतिशत लगातार बढ़ता जा रहा है, जो अपने करियर और व्यक्तिगत जीवन को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके चलते सोलो-मैक्सिंग की प्रवृत्ति विशेष रूप से कॉर्पोरेट जगत और मेट्रो शहरों के युवाओं में देखी जा रही है, जहां लोग अपनी आय और व्यक्तिगत लक्ष्यों को अधिकतम करने पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं

मेट्रो शहरों में जीवनयापन की बढ़ती लागत बदल रही माहौल

भारत में जहां विवाह और परिवार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती थी, अब सामाजिक परिवेश में तेजी से बदलाव देखा जा रहा है। विवाह और रोमांस अब खासतौर पर जेन-जी युवाओं की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर नहीं है। इसकी वजह यह है कि महानगरों में जीवनयापन की बढ़ती लागत ने युवाओं को अपने करियर और वित्तीय स्थिरता पर अधिक ध्यान देने के लिए मजबूर कर दिया है। इलके चलते आज की युवा पीढ़ी अब पारंपरिक पारिवारिक या वैवाहिक बंधनों में बंधने के बजाय अपनी शर्तों पर जीवन जीने को ज्यादा महत्व दे रही है।

स्वतंत्रता भरी जीवनशैली में निवेश ज्यादा फायदेमंद

बुजुर्गों के लिए अकेलापन जहां कई बार तमाम मुश्किलों के साथ बीमारियों का कारण है, वहीं अकेले रहने के शौकीन युवा इसे एक सोची-समझी और फायदेमंद पसंद के रूप में देख रहे हैं। यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब डेटिंग ऐप से ऊब, बढ़ता सामाजिक खर्च और रिश्तों को लेकर बदलती उम्मीदें युवाओं के साथ रहने के नजरिए को प्रभावित कर रही हैं। कई लोगों के लिए स्वतंत्रता अब रिश्तों के बीच का एक अस्थायी उपाय नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवनशैली है, जिसमें निवेश करना ज्यादा सार्थक है।

अकेले रहना कोई मजबूरी नहीं शांत और संतुष्ट लाइफ स्टाइल

गुड़गांव में एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत शिप्रा के शब्दों में सोलो-मैक्सिंग जीवन के किसी एक पहलू को चरम पर ले जाने का विचार है, जिसमें अकेले रहना एक मजबूरी नहीं बल्कि सक्रिय व्यक्तिगत रणनीति है। मौजूदा दौर में करियर और आर्थिक स्वतंत्रता की चाहत में पेशेवर लक्ष्यों, फ्रीलांसिंग और स्टार्टअप के विकास पर पूरा ध्यान देने के कारण युवा तेजी से इस जीवन शैली को पसंद कर रहे हैं। इसे अपनाकर व्यक्तिगत शौक, फिटनेस और आत्म-खोज जैसे लक्ष्य बिना किसी दबाव के आसानी से पूरे किए जा सकते हैं। विवाह के पारंपरिक बंधन से दूर यह समुद्र की तरह एक शांत और संतुष्ट जीवन चुनने की राह है।

अपनी शर्तों पर जीवन का निर्माण करने की आजादी

सोलो-मैक्सिंग अलगाव को बढ़ावा नहीं देता। इसके बजाय यह उन अनुभवों को प्रोत्साहित करता है, जिनका आनंद स्वतंत्र रूप से लिया जा सकता है, जैसे अकेले यात्रा करना, नई रुचियों को खोजना, साइड बिजनेस शुरू करना और दोस्ती या पारिवारिक संबंधों में अधिक समय देना। यह बताते हुए बेंगलुरू में कार्यरत 26 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर आयुष बंसल कहते हैं कि इसका उद्देश्य रोमांस के माध्यम से मान्यता प्राप्त करने से हटकर अपनी शर्तों पर एक संपूर्ण जीवन का निर्माण करने जैसा है।

एक तिहाई युवक-युवतियां शादी ही नहीं करना चाहते

भारत सरकार के मिनिस्ट्री ऑफ स्टेटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन द्वारा जारी एक रिपोर्ट से जेन-जी युवाओं के बीच पनप रही अकेले रहने की स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अविवाहित युवाओं का अनुपात तेजी से बढ़ रहा है। साल 2011 में अविवाहित युवाओं की संख्या 17.2 फीसदी थी जो 2019 में बढ़कर 23 फीसदी हो गई थी और अब इसके करीब 30 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। वहीं 2011 में 20.8 फीसदी युवा ऐसे थे, जो शादी नहीं करना चाहते थे, किंतु 2019 में ऐसे युवाओं की संख्या 26.1 फीसदी हो गई, जो अब बढ़कर 35 फीसदी तक होने की बात कही जा रही है। महिला आबादी के मामले में भी इसी तरह की प्रवृत्ति दर्ज की गई है। कभी शादी न करने की सोच रखने वाली युवतियां 2011 में जहां 13.5 फीसदी थीं, वह 2019 आते-आते 19.9 फीसदी हो गईं, और अब 25 फीसदी से अधिक युवतियां शादी नहीं करने की सोच रखती हैं। इस तरह देश के करीब एक तिहाई युवक-युवतियां शादी ही नहीं करना चाहते हैं। सरकार की ही एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, शादी न करने वाले युवाओं की सबसे अधिक संख्या जम्मू-कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में दर्ज की गई है। वहीं केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में ऐसे युवाओं की संख्या कम है, जिन्होंने शादी नहीं की है।

जिदंगी के साथ सामाजिक  दबाव और अकेलापन 

भारत जैसे देश में जहां शादी को इतना जरूरी माना जाता है कि अगर किसी परिवार में अविवाहित बेटे या बेटी हैं, तो वह दोस्तों, परिवारों और रिश्तेदारों के बीच चर्चा का विषय बन जाते हैं, यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। इस विमर्श में एक और महत्वपूर्ण तथ्य है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है, वर्तमान में जैसे-जैसे लड़कियों की शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है वैसे-वैसे वे शादी से विमुख होती जा रही हैं। इसका एक मुख्य कारण है कि शादी के बाद लड़कियों की जिंदगी पूरी तरह से बदल जाती है। उनके पहनावे से लेकर उनकी पसंद के खाने तक हर चीज में ससुराल और पति का हस्तक्षेप हो जाती है। यही नहीं एक पारिवारिक सर्वेक्षण के अनुसार 41 फीसदी ससुराल वाले यह चाहत रखते हैं कि उनकी बहू नौकरी तो करे, लेकिन घर की देखरेख भी कुछ उसी तरह करे, जैसे बाकी गृहणियां करती हैं। इसके साथ ही शादी के तीन-चार साल बीतते ही बहू पर बच्चे पैदा करने का दबाव भी थोपना शुरू कर दिया जाता है। उसके दिमाग में इधर-उधर से यह बात डालने का प्रयास शुरू हो जाता है कि मां बने बिना कोई स्त्री पूर्ण नहीं होती, या कि परिवार को आगे बढ़ाने के साथ उन्हें बुढ़ापे में खेलने के लिए एक अदद बच्चे की जरूरत है। इसलिए अपने सपने पूरे करने के साथ अपने बच्चे के बारे में भी सोचें। इस माहौल के चलते ही वह युवतियां जो खुले आसमान में उड़ना चाहती हैं, अपने सपने पूरे करने चाहती हैं, अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीना चाहती हैं, शादी के ख्याल से ही डरने या दूर भागने लगती हैं, और यही विचार उन्हें पेशेवर जिदंगी के दबावों के बीच अकेले रहने के लिए प्रेरित करने लगता है।

- मनोज त्रिपाठी, कानपुर।

संबंधित समाचार