भीड़ नियंत्रण की संवैधानिक कसौटी

Amrit Vichar Network
Edited By Deepak Mishra
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लोकतंत्र की पहचान केवल नियमित चुनावों से नहीं होती; उसकी वास्तविक कसौटी इस बात में निहित होती है कि वह असहमति की अभिव्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है।

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कुमार कृष्णन, वरिष्ठ पत्रकार

लोकतंत्र की पहचान केवल नियमित चुनावों से नहीं होती, उसकी वास्तविक कसौटी इस बात में निहित होती है कि वह असहमति की अभिव्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है। धरना, प्रदर्शन, रैली और जनसभा केवल राजनीतिक गतिविधियां नहीं हैं, बल्कि नागरिकों और राज्य के बीच संवाद के संवैधानिक माध्यम भी हैं। लोकतंत्र की शक्ति विरोध को दबाने में नहीं, बल्कि उसे सुनने, समझने और संवैधानिक दायरे में उसका समाधान खोजने में है, इसलिए जब किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए राज्य बल प्रयोग करता है, तब प्रश्न केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रह जाता, वह नागरिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार और राज्य की लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़ जाता है।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित ‘चलो संसद’ प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के कथित उपयोग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका ने इसी प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। पूर्व भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी तथा खुफिया ब्यूरो के पूर्व विशेष निदेशक यशोवर्धन आजाद सहित अन्य याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों पर बिना पर्याप्त चेतावनी ऐसे ‘प्रक्षेपास्त्रों’ का प्रयोग किया गया, जिससे अनेक लोग घायल हुए। याचिका में नागरिक प्रदर्शनों के दौरान धातुयुक्त पैलेट के प्रयोग पर रोक, घायलों के उपचार, पुनर्वास और मुआवजे की व्यवस्था की मांग की गई है।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया है। साथ ही उसने उपलब्ध अभिलेखों तथा प्रयुक्त गोला-बारूद का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश भी दिया है। न्यायालय का दृष्टिकोण उल्लेखनीय है। उसने न तो किसी पक्ष को दोषी माना है और न ही किसी उपकरण पर तत्काल प्रतिबंध लगाया है। उसका स्पष्ट संकेत है कि किसी भी निष्कर्ष का आधार केवल तथ्य, साक्ष्य और संवैधानिक परीक्षण होंगे। यही विधि के शासन का मूल सिद्धांत है कि निर्णय जनभावना या राजनीतिक दबाव से नहीं, बल्कि प्रमाण और कानून के आधार पर दिए जाएं।

इस संदर्भ में पूर्व पुलिस आयुक्त किरण बेदी की टिप्पणी भी विचारणीय है। उनका कहना है कि प्रत्येक विरोध-प्रदर्शन का उत्तर बल प्रयोग नहीं हो सकता। लोकतांत्रिक पुलिसिंग का आधार संवाद, मध्यस्थता और विश्वास होना चाहिए। यदि पैलेट गन का प्रयोग हुआ है, तो यह भी जांच का विषय है कि उसका उपयोग निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया के अनुरूप था या नहीं। यह दृष्टिकोण इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह प्रशासनिक अनुभव के साथ लोकतांत्रिक पुलिसिंग की आधुनिक अवधारणा पर आधारित है।

वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि पुलिस को बल प्रयोग का अधिकार होना चाहिए या नहीं। आधुनिक राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस और सुरक्षा बलों को आवश्यक शक्तियां प्राप्त होती हैं, किंतु लोकतांत्रिक शासन इन शक्तियों को असीमित नहीं मानता। बल प्रयोग की वैधता उसकी आवश्यकता, अनुपातिकता और जवाबदेही से निर्धारित होती है। इसी कारण विश्व की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में 'न्यूनतम आवश्यक बल' का सिद्धांत स्वीकार किया गया है। इसका अर्थ है कि राज्य केवल उतनी ही शक्ति का प्रयोग करे, जितनी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अपरिहार्य हो। यदि कम जोखिम वाले और अधिक मानवीय विकल्प उपलब्ध हों, तो अधिक हानिकारक साधनों का प्रयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(ख) शांतिपूर्वक और निःशस्त्र सभा करने का अधिकार प्रदान करता है। निःसंदेह ये अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं। सार्वजनिक व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा और अन्य संवैधानिक आधारों पर इन पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, किंतु इन प्रतिबंधों की कसौटी राज्य की सुविधा नहीं, बल्कि संविधान है। राज्य का दायित्व केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि व्यवस्था की रक्षा के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं का अनावश्यक क्षरण न हो।

यही कारण है कि जंतर-मंतर का विवाद किसी एक प्रदर्शन या किसी एक उपकरण के उपयोग तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न का प्रतीक बन चुका है कि क्या भारत की भीड़ नियंत्रण नीति इक्कीसवीं सदी के लोकतांत्रिक और मानवाधिकार संबंधी मानकों के अनुरूप विकसित हुई है, अथवा वह अब भी औपनिवेशिक पुलिसिंग की मानसिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकी है। इस प्रश्न का उत्तर केवल न्यायालय के निर्णय में नहीं, बल्कि पुलिस सुधार, प्रशासनिक संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति में भी निहित है।

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