पॉलीमर प्रयोग भविष्य के भारत की मुद्रा व्यवस्था

Amrit Vichar Network
Edited By Deepak Mishra
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ऋषभ मिश्रा,असिस्टेंट प्रोफेसर
आईआईटी कानपुर 

भारत की अर्थव्यवस्था आज एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रही है, जहां एक ओर डिजिटल भुगतान क्रांति अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर नकदी का महत्व भी कम नहीं हुआ है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) ने भुगतान प्रणाली को सरल, त्वरित और सर्वसुलभ बनाया है, लेकिन इसके बावजूद देश में नकदी की मांग लगातार बढ़ रही है। 

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 तक प्रचलन में मुद्रा का मूल्य लगभग 41.23 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 12 प्रतिशत अधिक है। मुद्रा से जीडीपी अनुपात भी बढ़कर 12.1 प्रतिशत हो गया है। यह तथ्य स्पष्ट संकेत देता है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के बावजूद नकदी भारतीय आर्थिक व्यवस्था की एक मजबूत आवश्यकता बनी हुई है। 

ऐसे समय में आरबीआई द्वारा पॉलीमर अथवा प्लास्टिक नोटों को अपनाने की दिशा में बढ़ाया गया कदम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाल ही में आरबीआई नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (बीआरबीएनएमपीएल) ने ओपेसिफाइड पॉलीमर सब्सट्रेट शीटों की आपूर्ति के लिए वैश्विक निविदाएं आमंत्रित की हैं। यह केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारतीय मुद्रा व्यवस्था में संभावित ऐतिहासिक परिवर्तन का संकेत है। यदि यह योजना सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय मुद्रा की संरचना, सुरक्षा और टिकाऊपन में व्यापक बदलाव देखने को मिल सकता है।

वस्तुतः भारत में नकदी का उपयोग केवल भुगतान का माध्यम नहीं है, बल्कि आर्थिक विश्वास और सामाजिक व्यवहार का हिस्सा भी है। ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे व्यापारियों, कृषि क्षेत्र तथा असंगठित अर्थव्यवस्था में आज भी नकदी प्रमुख भूमिका निभाती है। देश की विशाल आबादी का एक बड़ा वर्ग अभी भी नकद लेन-देन को अधिक सहज और विश्वसनीय मानता है। नकदी की बढ़ती मांग के साथ नोटों की छपाई और रख-रखाव पर होने वाला व्यय भी लगातार बढ़ता रहा है। 

वित्त वर्ष 2024-25 में भारतीय मुद्रा नोटों की छपाई पर लगभग 6,372 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। यद्यपि वित्त वर्ष 2025-26 में यह खर्च घटकर लगभग 4,875 करोड़ रुपये रह गया, फिर भी यह राशि अत्यंत बड़ी है। हर वर्ष बड़ी संख्या में नोट फटने, गंदे होने, नमी से खराब होने तथा अत्यधिक उपयोग के कारण अनुपयोगी हो जाते हैं। इन नोटों को बदलने के लिए नए नोट छापने पड़ते हैं, जिससे सरकार और आरबीआई पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है। भारत जैसे विशाल देश में जहां अरबों नोट प्रचलन में हैं, वहां मुद्रा की टिकाऊपन बढ़ाना आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन जाता है। इसी संदर्भ में पॉलीमर नोट एक प्रभावी विकल्प के रूप में सामने आए हैं।

गौरतलब है कि पॉलीमर नोट विशेष प्रकार के प्लास्टिक आधारित पदार्थ से निर्मित किए जाते हैं। सामान्य कागजी नोट जहां कपास आधारित विशेष कागज से बनाए जाते हैं, वहीं पॉलीमर नोट अत्यधिक मजबूत और लचीले प्लास्टिक सब्सट्रेट पर मुद्रित होते हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता इनकी दीर्घायु है। विशेषज्ञों के अनुसार पॉलीमर नोटों की आयु पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में दो से चार गुना अधिक होती है। ये पानी, नमी, धूल, तेल, पसीने तथा बार-बार मोड़े जाने से अपेक्षाकृत कम प्रभावित होते हैं।

भारत की जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए यह विशेषता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। देश के अधिकांश हिस्सों में गर्मी, आर्द्रता, मानसून और धूल जैसी परिस्थितियां सामान्य हैं। ऐसे वातावरण में कागजी नोट अपेक्षाकृत जल्दी खराब हो जाते हैं। पॉलीमर नोट इस समस्या का दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं। इसके साथ ही पॉलीमर नोटों का दूसरा महत्वपूर्ण लाभ सुरक्षा से जुड़ा है। नकली मुद्रा भारत की आर्थिक सुरक्षा के लिए लंबे समय से एक चुनौती रही है। 

आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025-26 के दौरान बैंकिंग प्रणाली में लगभग 2.3 लाख नकली नोटों की पहचान की गई थी। यद्यपि यह संख्या कुल प्रचलित नोटों की तुलना में बहुत कम है, फिर भी इसका राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। पॉलीमर नोटों में ऐसे कई उन्नत सुरक्षा फीचर जोड़े जा सकते हैं, जिनकी नकल करना अत्यंत कठिन होता है।

इनमें पारदर्शी विंडो, विशेष होलोग्राम, माइक्रो-प्रिंटिंग, उन्नत सुरक्षा धागे, धात्विक सुरक्षा चिह्न तथा रंग बदलने वाली स्याही जैसी तकनीकें शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों के अनुभव बताते हैं कि पॉलीमर नोटों के प्रचलन से नकली मुद्रा के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है। भारत जैसे देश के लिए, जहां सीमा पार से नकली मुद्रा भेजने की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं, यह लाभ अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत शुरुआत में 10 और 20 रुपये जैसे छोटे मूल्यवर्ग के नोटों पर पॉलीमर तकनीक का परीक्षण कर सकता है। इसका कारण यह है कि ये नोट सबसे अधिक प्रचलन में रहते हैं और सबसे जल्दी खराब होते हैं। यदि परीक्षण सफल रहता है और लागत-लाभ विश्लेषण सकारात्मक परिणाम देता है, तो धीरे-धीरे 50, 100 और अन्य मूल्यवर्गों तक इसका विस्तार किया जा सकता है। चरणबद्ध रणनीति से जोखिम कम होगा और आवश्यक सुधार समय रहते किए जा सकेंगे।

यदि आरबीआई और सरकार चरणबद्ध तरीके से, पर्यावरणीय संतुलन, तकनीकी आत्मनिर्भरता और जन-जागरूकता को ध्यान में रखते हुए इस योजना को लागू करती है, तो भारत भी उन अग्रणी देशों की श्रेणी में शामिल हो सकता है, जिन्होंने अपनी मुद्रा प्रणाली को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप सफलतापूर्वक रूपांतरित किया है। निस्संदेह, प्लास्टिक नोट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए केवल एक नया प्रयोग नहीं, बल्कि वित्तीय आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हो सकते हैं। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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