संपादकीय : बजट की मंशा
क्या चुनावी मास्टरस्ट्रोक है योगी सरकार का नया बजट? पढ़ें आज का संपादकीय
यूपी के अनुपूरक बजट में बुनियादी ढांचे, युवाओं, किसानों और संविदा कर्मियों पर विशेष जोर दिया गया है। विपक्ष इसे चुनावी बता रहा है। क्या यह विकास की जरूरत है या 2027 के चुनाव की तैयारी?
उत्तर प्रदेश सरकार का अनुपूरक बजट केवल अतिरिक्त धनराशि का प्रावधान नहीं, बल्कि शासन की राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं का दस्तावेज भी है। इस अनुपूरक बजट का घोषित उद्देश्य विकास परियोजनाओं को गति देना, अधूरी योजनाओं को पूरा करना तथा नई आवश्यकताओं के लिए संसाधन उपलब्ध कराना तो है ही, पर 2027 के विधानसभा चुनाव सन्निकट देखते हुए इस बजट के चुनावी उपकरण होने से इनकार करना भी अतार्किक होगा।
वार्षिक बजट बनाते समय सभी व्यय आवश्यकताओं का अनुमान संभव नहीं होता। नई परियोजनाएं, लागत में वृद्धि, सामाजिक सुरक्षा संबंधी अतिरिक्त दायित्व तथा आधारभूत ढांचे की त्वरित जरूरतें अतिरिक्त आवंटन मांगती हैं, इसलिए अनुपूरक बजट संसदीय वित्तीय व्यवस्था का सामान्य और वैध हिस्सा है, किंतु चुनाव से ठीक पहले आने वाला हर अनुपूरक बजट स्वाभाविक रूप से राजनीतिक नजरिए से भी परखा ही जाएगा। युवा, महिला, किसान, संविदा कर्मचारी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा वर्कर, रसोइये और ग्राम चौकीदार जैसे बड़े सामाजिक समूहों के लिए बढ़े हुए मानदेय और अतिरिक्त प्रावधान निश्चित रूप से उनके जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। महंगाई बढ़ी है तो वर्षों से कम मानदेय पर काम कर रहे इन वर्गों को राहत देना अनुचित नहीं कहा जा सकता। विपक्ष का विरोध इसलिए है, क्योंकि उसके अनुसार इन घोषणाओं का समय चुनावी है और इन्हें दीर्घकालिक नीति की बजाय वह मतदाताओं को प्रभावित करने के प्रयास के रूप में देख रहा है। लोकतंत्र में ऐसी बहसें स्वाभाविक हैं। उद्योग, एक्सप्रेसवे, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे पर जोर आर्थिक दृष्टि से सकारात्मक संकेत देता है। बेहतर सड़क, विश्वसनीय बिजली और औद्योगिक निवेश रोजगार सृजन तथा निजी निवेश को आकर्षित करने के प्रमुख आधार हैं। यदि अतिरिक्त आवंटन समयबद्ध ढंग से खर्च हुआ तो प्रदेश की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ सकती है। बिजली क्षेत्र में निवेश से वितरण व्यवस्था और आपूर्ति सुधरने की संभावना है, जबकि ग्रामीण विकास, आजीविका और मूलभूत सुविधाओं पर खर्च गांवों की अर्थव्यवस्था को भी गति दे सकता है, हालांकि मात्र धन आवंटन से व्यवस्था तथा सेवाएं नहीं सुधरतीं।
सफलता का पैमाना घोषणा नहीं, बल्कि लाभार्थी तक समय पर पहुंचने वाला वास्तविक लाभ है। पिछले बजट में स्वीकृत धनराशि का कितना उपयोग हुआ? कितनी परियोजनाएं समय पर पूरी हुईं? किन विभागों ने आवंटित राशि खर्च ही नहीं की? अमूमन पूंजीगत व्यय के उपयोग में अपेक्षित स्तर से कमी रहती रही है। यदि ऐसा है तो नई घोषणाओं के साथ पुरानी योजनाओं की प्रगति का विस्तृत लेखा-जोखा भी सार्वजनिक होना चाहिए। जवाबदेही लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। जहां तक विपक्ष के सड़क और सदन के व्यवहार का प्रश्न है, आज विपक्ष का बड़ा संघर्ष सदनों के भीतर अधिक दिखाई देता है, सड़क पर कम। इससे उसकी राजनीतिक प्रभावशीलता भी प्रभावित होती है। केवल सदन में विरोध कर विधायी काम रोकना कतई उचित नहीं हैं।
उत्तर प्रदेश का यह अनुपूरक बजट विकास और राजनीति— दोनों का मिश्रण है। चुनावी वर्ष से पहले जनकल्याणकारी घोषणाएं असामान्य नहीं हैं, उम्मीद है कि सरकार इसकी विश्वसनीयता सिद्ध करने के लिए नई आवंटित धनराशि का समयबद्ध, परिणामोन्मुख उपयोग सुनिश्चित करेगी, क्योंकि अंततः मतदाता घोषणाओं से अधिक उनके धरातलीय परिणामों का मूल्यांकन करता है।
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