संपादकीय : संतुलित मौद्रिक नीति
लगातार तीसरी बार रेपो रेट 5.25% पर स्थिर, जानें अर्थव्यवस्था और EMI पर असर
भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में कोई बदलाव न कर इसे 5.25% पर बरकरार रखा है। बढ़ती महंगाई और वैश्विक अस्थिरता के दौर में यह फैसला कितना सही है? पढ़ें अमृत विचार का विस्तृत संपादकीय 'संतुलित मौद्रिक नीति'।
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति ने लगातार तीसरी बार रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखा है। अप्रैल, जून और अगस्त— तीनों बैठकों में यथास्थिति बनाए रखना नीतिगत निष्क्रियता नहीं, वरन यह अत्यधिक अनिश्चित वैश्विक आर्थिक वातावरण में संयमित और संतुलित केंद्रीय बैंकिंग का उदाहरण है। मौद्रिक नीति का उद्देश्य केवल सस्ते ऋण उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि मूल्य स्थिरता, वित्तीय स्थिरता और आर्थिक वृद्धि के बीच संतुलन स्थापित करना भी है।
2025 में महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रित थी और आर्थिक गतिविधियों को गति देने की आवश्यकता के चलते आरबीआई ने तीन बार ब्याज दरों में कटौती कर ऋण सस्ता किया, किंतु 2026 में पश्चिम एशिया के तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, अमेरिकी टैरिफ नीतियों से वैश्विक व्यापार पर बढ़ते दबाव, आपूर्ति श्रृंखलाओं की अनिश्चितता और मुद्रा बाजार की अस्थिरता ने महंगाई के नए जोखिम पैदा कर दिए हैं। ऐसे समय में ब्याज दरों को यथावत रखना सतर्कता का संकेत है, न कि नीति-निर्णय की कमजोरी। यदि रेपो दर घटती है, तो ऋण सस्ता होता है, मांग बढ़ती है और अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। ऋण लेने वालों को कुछ राहत अवश्य मिलती, परंतु इससे बाजार में अतिरिक्त तरलता आती, उपभोग बढ़ता और आयातित महंगाई, विशेषकर तेल आधारित लागत तीव्र हो सकती है। इसके चलते महंगाई और बढ़ सकती है, इसलिए बढ़ती मुद्रास्फीति के दौर में केंद्रीय बैंक आमतौर पर ब्याज दरें घटाने से बचता है। यदि आरबीआई इस बार रेपो दर बढ़ा देता तो महंगाई पर मनोवैज्ञानिक अंकुश लगता, किंतु उद्योगों की पूंजी लागत बढ़ती, निवेश प्रभावित होता और विकास दर पर प्रतिकूल असर पड़ता, इसलिए 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रहना दोनों चरम स्थितियों के बीच व्यावहारिक विकल्प प्रतीत होता है। इस निर्णय पक्ष बचतकर्ताओं के लिए सकारात्मक है। सावधि जमा पर मिलने वाला प्रतिफल घटने, दरें स्थिर रहने से जमाकर्ताओं को राहत देगा। ऋणधारकों की ईएमआई भी नहीं बढने से कर्जदारों को अतिरिक्त राहत भले न मिले, लेकिन नया बोझ भी नहीं पड़ेगा। ऐसी स्थिरता स्वयं आर्थिक विश्वास का आधार होती है। अमेरिका की संरक्षणवादी टैरिफ नीति और वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता का प्रभाव भारत पर प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूपों में पड़ता है। यदि निर्यात प्रभावित होते हैं, तेल महंगा होता है या डॉलर मजबूत होता है, तो आयातित महंगाई बढ़ती है। ऐसे वातावरण में केंद्रीय बैंक को केवल घरेलू आंकड़ों पर नहीं, बल्कि वैश्विक जोखिमों पर भी नजर रखनी पड़ती है। यही कारण है कि आरबीआई ने ‘प्रतीक्षा और मूल्यांकन’ की रणनीति अपनाई है। आगे ब्याज दरों की दिशा पूरी तरह महंगाई, मानसून, तेल कीमतों और वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
यदि आने वाले महीनों में मुद्रास्फीति फिर चार प्रतिशत के लक्ष्य के करीब लौटती है और बाहरी जोखिम कम होते हैं, तो वर्ष के अंत अथवा दिसंबर की बैठक में सीमित दर कटौती की संभावना बन सकती है। इसके विपरीत यदि महंगाई अपेक्षा से अधिक बढ़ती है, तो बढ़ोतरी की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल आरबीआई का संदेश साफ है— तात्कालिक लोकप्रियता से अधिक दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता महत्वपूर्ण है। यही परिपक्व मौद्रिक नीति की पहचान भी है।
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