छोटे चुनावों में छिपे हैं बड़े सियासी संदेश

Amrit Vichar Network
Edited By Deepak Mishra
On

लोकतंत्र में उपचुनाव प्रायः भविष्य की राजनीति की पहली दस्तक माने जाते हैं। बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात के विधानसभा उपचुनावों ने स्पष्ट कर दिया है कि लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक गढ़ स्थायी नहीं होता।

cats
योगेश कुमार गोयल
वरिष्ठ पत्रकार

लोकतांत्रिक राजनीति में कई बार छोटे चुनाव भी बड़े संदेश दे जाते हैं। विधानसभा उपचुनावों को लंबे समय तक केवल रिक्त सीटों को भरने की औपचारिक प्रक्रिया माना जाता रहा है। सामान्य धारणा यही रही कि जिस राज्य में जिस दल की सरकार होती है, प्रशासनिक बढ़त, संगठनात्मक शक्ति और सत्ता के प्रभाव के कारण वही दल उपचुनाव आसानी से जीत जाता है। इसी कारण उपचुनावों के परिणामों को व्यापक राजनीतिक संकेतक के रूप में कम ही देखा जाता था, किंतु पिछले कुछ वर्षों में यह धारणा तेजी से बदली है। अब उपचुनाव केवल एक सीट का फैसला नहीं करते, बल्कि जनता के तत्कालीन मनोभाव, सरकार के प्रति संतोष-असंतोष, संगठन की मजबूती, नेतृत्व की स्वीकार्यता और भविष्य की राजनीतिक दिशा के संकेत भी देते हैं। 

बिहार के बांकीपुर, मध्य प्रदेश के दतिया और गुजरात के मांझलपुर विधानसभा उपचुनावों ने भी यही संदेश दिया है। तीन सीटों में से दो पर भाजपा की हार और केवल एक पर जीत ने राजनीतिक विश्लेषकों को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या ये केवल स्थानीय परिस्थितियों का परिणाम हैं, अथवा भाजपा के सामने उभर रही नई राजनीतिक चुनौतियों का प्रारंभिक संकेत? उपचुनाव सत्ता परिवर्तन का जनादेश नहीं होते, किंतु वे जनता के बदलते मानस की पहली आहट अवश्य होते हैं और यही कारण है कि इन परिणामों को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है।

सबसे अधिक चर्चा बिहार की बांकीपुर सीट की रही। यह सीट केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं थी, बल्कि भाजपा की राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती थी। लगभग तीन दशक से यह भाजपा का अभेद्य दुर्ग रहा। पहले भाजपाध्यक्ष नितिन नवीन के पिता और बाद में स्वयं नितिन नवीन लगातार यहां विजय प्राप्त करते रहे। नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य बनने के बाद यह सीट रिक्त हुई और भाजपा को अटूट विश्वास था कि उसका यह गढ़ सुरक्षित रहेगा, किंतु जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने न केवल भाजपा का यह किला ध्वस्त कर दिया, बल्कि बिहार की राजनीति में नए विकल्प की संभावनाओं को भी मजबूत कर दिया। 

यह परिणाम केवल भाजपा की हार नहीं बल्कि उसकी रणनीतिक चूक का भी परिणाम माना जा रहा है। उम्मीदवार चयन में अंतिम समय तक बना भ्रम, स्थानीय कार्यकर्ताओं की असंतुष्टि और अत्यधिक आत्मविश्वास ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया। लंबे समय तक किसी सीट पर लगातार जीत कभी-कभी संगठन में आत्मसंतोष पैदा कर देती है। यही स्थिति बांकीपुर में दिखाई दी। भाजपा ने शायद मान लिया था कि उसका पारंपरिक वोट बैंक और संगठनात्मक नेटवर्क किसी भी परिस्थिति में जीत सुनिश्चित कर देगा, जबकि मतदाता पहले की तुलना में अधिक सजग और स्वतंत्र निर्णय लेने वाला बन चुका है। 

बांकीपुर का परिणाम प्रशांत किशोर के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। चुनावी रणनीतिकार के रूप में अनेक दलों को सफलता दिलाने वाले प्रशांत किशोर पहली बार स्वयं चुनावी परीक्षा में उतरे और सफल हुए, हालांकि विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी पूरी तरह विफल रही थी, किंतु इस विजय ने सिद्ध कर दिया कि यदि कोई दल लगातार जनता के बीच बना रहे और स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाए, तो वह स्थापित राजनीतिक समीकरणों को चुनौती दे सकता है। यह जीत बिहार में तीसरे राजनीतिक विकल्प की संभावनाओं को भी बल देती है।

दूसरी ओर मध्य प्रदेश की दतिया सीट भाजपा के लिए और अधिक चिंता का विषय है। भाजपा की यह हार केवल विपक्ष की सफलता नहीं, बल्कि भाजपा संगठन के भीतर असंतोष की अभिव्यक्ति भी मानी जा रही है। पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटे जाने के बाद उनके समर्थकों की नाराजगी चुनाव अभियान के दौरान लगातार चर्चा में रही। चुनावी राजनीति में उम्मीदवार केवल पार्टी का प्रतिनिधि नहीं होता, बल्कि स्थानीय संगठन की भावनाओं का केंद्र भी होता है। जब कार्यकर्ता स्वयं उत्साहहीन हो जाएं या भीतरघात की स्थिति उत्पन्न हो जाए, तो मजबूत संगठन भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाता। 

दतिया का परिणाम इसी सत्य की पुष्टि करता है। मध्य प्रदेश भाजपा लंबे समय तक शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में अत्यंत मजबूत संगठनात्मक ढांचे के लिए जानी जाती रही। संगठन, सरकार और जनता के बीच संवाद की जो परंपरा विकसित हुई थी, नेतृत्व परिवर्तन के बाद उसे उसी प्रभावशीलता से बनाए रखना नई सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है। उपचुनावों ने संकेत दिया है कि केवल सत्ता में होना पर्याप्त नहीं, संगठन की एकजुटता और स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता भी उतनी ही आवश्यक है।

गुजरात के मांझलपुर में भाजपा ने जीत दर्ज कर अपनी संगठनात्मक क्षमता का प्रदर्शन अवश्य किया, किंतु मतों के अंतर में आया परिवर्तन संकेत देता है कि वहां भी विपक्ष धीरे-धीरे अपनी जमीन मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। यद्यपि गुजरात में भाजपा की स्थिति अभी भी सुदृढ़ है, फिर भी चुनावी आंकड़े बताते हैं कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्मसंतोष उचित नहीं हो सकता। इन उपचुनावों की चर्चा का एक महत्वपूर्ण पक्ष ‘जेन-जी आंदोलन’ भी रहा। चुनाव 30 जुलाई को ऐसे समय हुए, जब प्रतियोगी परीक्षा, पेपर लीक, रोजगार, अवसरों की कमी, प्रशासनिक जवाबदेही इत्यादि युवाओं से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में थे। 

निश्चित रूप से यह कहना कठिन होगा कि केवल इसी आंदोलन ने चुनाव परिणामों को प्रभावित किया, क्योंकि प्रत्येक उपचुनाव में स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार की लोकप्रियता और संगठनात्मक स्थिति कहीं अधिक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि युवाओं के बीच बढ़ती असंतुष्टि का व्यापक राजनीतिक वातावरण पर प्रभाव पड़ता है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

संबंधित समाचार